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Articles - गॉंधी हत्या का सच

महात्मा गॉंधी की हत्या का प्रश्‍न आज एक बार पुन: चर्चा में है| तथाकथित हिन्दुत्ववादियों ने उनके हत्यारे नथूराम गोडसे को महिमामंडित करना शुरू कर दिया है| गोडसे का मन्दिर बनाने के लिये बड़े शहरों में स्थान ढूंढा जा रहा है| क्या यह विचारों का दिवालियापन नहीं है? प्रस्तुत है गॉंधी हत्या के कारणों की पड़ताल करता यह संक्षिप्त लेख - सम्पादक

३० जनवरी को हम गॉंधीजी की पुण्यतिथि मनाते हैं| यह इतिहास की वही तारीख है जिस तारीख को भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गॉंधी की एक हिन्दू मतान्धवादी नथूराम गोडसे ने गोली मारकर नृशंस हत्या कर दी थी| गँाधीजी जैसे महात्मा का इस आदमी ने खून क्यों किया, इसके पक्ष और विपक्ष में अनेक दलीलेंें दी जाती हैं| राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के तथाकथित ठेकेदार नथूराम गोडसे द्वारा गॉंधीजी की हत्या को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं| सदी के सबसे श्रेेष्ठ मानव राष्ट्रपिता महात्मा गॉंधी के हत्यारे नथूराम गोडसे को आज तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों द्वारा राष्ट्रभक्त कह कर महिमामंडित किया जा रहा है और उसकी प्रतिमा स्थापित करने के लिए हर बड़े शहर में जमीन की तलाश की जा रही है| यह प्रचारित किया जा रहा है कि वह बहुत बड़ा विद्वान और राष्ट्रभक्त था, और गॉंधी की हत्या कर उसने राष्ट्र को बचा लिया| यह अत्यन्त शर्मनाक है| यह स्पष्ट रूप से हत्या के उदात्तीकरण की प्रवृत्ति का द्योतक है, ङ्गिर चाहे वह महापुरुषों की प्रत्यक्ष हत्या हो या उनका चरित्रहनन हो|

गोडसे के अनुयायियों द्वारा गॉंधीवध जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है| अपने कथन के समर्थन में वे शब्दकोश का उदाहरण देते हैं जिसमें खूऩ, हत्या, वध को समानार्थी माना गया है| तो क्या हम कह सकते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने आसुरी शक्तियों के प्रतीक रावण का खून किया था, शायद नहीं| उन्होंने रावण का वध किया था| कृष्ण ने कंस का वध किया था| वध तो दुर्जनों और राक्षसों का होता है और इसे धर्मकृत्य माना जाता है| अंग्रेजी में गांधीजी के खून के लिए ‘असेसिनेशन’ शब्द का प्रयोग हुआ है| असेसिनेशन का अर्थ है विश्‍वासघात पूर्वक किया गया भीषण खून| ऐसे खून द्वारा मनुष्य और उसके विचार दोनों की हमेशा के लिये हत्या कर दी जाती है| इसीलिए तो बर्नार्ड शॉ ने कहा है कि खून करना सेंसरशिप का अन्तिम मार्ग है| नथूराम गोडसे एक व्यक्ति नहीं एक आसुरी प्रवृत्ति का प्रतिनिधि था| अत: गोडसे ने गॉंधीजी की नृशंस हत्या की थी, वध नहीं|

प्रश्‍न है कि गोडसे जैसे व्यक्तियों का महिमामंडन कर हम कब तक गांधी मूल्यों क़ी हत्या करते रहेंगे? गांधी की मृत्यु हुये कई साल हो गय़े लेकिन उनकी उत्तरक्रिया आज भी चल रही है, इससे बड़े दु:ख की बात और क्या हो सकती है?

क्या यह तथ्य किसी से छिपा है कि ३० जनवरी, १९४८ के पहले गॉंधीजी की हत्या के सात विफल प्रयास किये गये थे जिनमें २ दक्षिण अफ्रीका१ और ५ भारत में हुये थे| भारत में एक घटना को छोड़कर, बाकी सभी प्रयास महाराष्ट्र में और पूना के ही हिन्दुत्ववादियों द्वारा किये गये जिनमें से तीन में नथूराम गोडसे स्वयं शामिल था|

गॉंधीजी की हत्या के पांच प्रयासों में प्रथम प्रयास २५ जून, १९३४ को किया गया था जब पूना में गॉंधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के लिए जा रहे थे| उनकी मोटर पर बम फेंका गया किन्तु गॉंधीजी चूंकि पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये| प्रश्‍न उठता है कि उस समय गॉंधीजी की हत्या का क्या उद्देश्य था? १९३४ में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज थी ही नहीं, तो फिर उस समय ५५ करोड़ रुपयों का तो सवाल ही पैदा नहीं होता?

गॉंधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास १९४४ में तब किया गया जब जुलाई १९४४ में गॉंधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये थे| उस समय पूना से २० युवकों का एक दल जिसका नेता नाथूराम गोडसे था, बस लेकर पंचगनी पहुंचा| नथूराम शाम को प्रार्थना सभा में हाथ में छूरा लेकर गॉंधीजी की तरफ लपका| पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के युवक ने नथूराम को पकड़ लिया| उस समय पाकिस्तान बनने की कल्पना खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी नहीं थी| फिर क्यों नथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या का प्रयास किया?

गॉंधीजी की हत्या का तीसरा प्रयास दो महीने बाद सितम्बर में वर्धा में किया गया था| गांधीजी, मुहम्मद अली जिन्ना से बातचीत करने के लिए बम्बई जाने वाले थे किन्तु किन्हीं कारणों से नहीं जा सके| पूना से एक गुट वर्धा पहुंचा जिसका नेतृत्व नथूराम कर रहा था| उस गुट के ग.ल. थने नाम के व्यक्ति के पास से छूरा बरामद किया गया था| इस घटना के सम्बन्ध में गॉंधी जी के निजी सचिव प्यारेलाल जी ने लिखा है|२ उस समय भी गॉंधी की हत्या का कोई कारण नहीं था| गांधीजी की हत्या का चौथा प्रयास २९ जून, १९४६ को किया गया था जब गांधीजी विशेष ट्रेन से बम्बई से पूना जा रहे थे| उस समय नेरल और कर्जत स्टेशनों के बीच में रेल पटरी पर बड़ा पत्थर रखा गया था| उस रात को ड्राइवर की सूझ-बूझ के कारण गांधीजी बच गये|३ दूसरे दिन, ३० जून की प्रार्थना-सभा में गांधीजी ने पिछले दिन की घटना का उल्लेख करते हुए कहा : भगवान की कृपा से ही मैं आज आप लोगों के बीच में हूं| यह सातवीं बार है जब मौत के मुंह में जाते जाते बचा हूंं|४ नथूराम गोडसे ने अपनी ‘अग्रणी’ नामक मराठी पत्रिका जिसका नाम बाद में परिवर्तित होकर ‘हिन्दू राष्ट्र’ हो गया था, में गांधीजी की १२५ वर्ष जीने की इच्छा जाहिर करने पर लिखा- मगर आपको १२५ वर्ष जीने कौन देगा? गांधीजी की हत्या से डेढ़ वर्ष पहले नथूराम का लिखा यह वाक्य यह साबित करता है कि वह गांधीजी की हत्या के लिए बहुत पहले से प्रयासरत था| हत्या का पांचवां प्रयास २० जनवरी, १९४८ को हुआ जब मदनलाल पाहवा ने गांधीजी पर प्रार्थना सभा में बम फेंका और ३० जनवरी, १९४८ के दिन नथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी|

अत: ३० जनवरी के पहले हत्या के जितने प्रयास हुये उनमें पाकिस्तान के बनने या ५५ करोड़ रूपये देने की बात सर्वथा असत् और मनगढ़न्त है| वस्तुत: गॉंधीजी की हत्या नथूराम की एक सोची समझी साजिश थी|

नथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर गांधीजी की हत्या क्यों की, इस सन्दर्भ में तथाकथित हिन्दुत्ववादी तीन पुस्तकोंनथूराम की पन्नास कोटीचे बली, उसके भाई गोपाल गोडसे की गांधी हत्या आणि मी, और मी नथूराम गोडसे बोलतोय (नाटक) का हवाला देते हुयेे तीन दलीलें देते हैं

गॉंधी मुसलमानों तथा पाकिस्तान बनने के हिमायती थे|

गॉंधी ने ५५ करोड़ रुपये पाकिस्तान को दिलवाने के लिये उपवास किया तथा

गॉंधी की हत्या करनेवाले देशभक्त तथा प्रामाणिक व्यक्ति थे|

अनेक इतिहासकार और पत्रकार भी ऐसा ही मानते हैं| किन्तु यदि आप प्यारेलाल लिखित ‘द लास्ट फेज’, गांधी हत्या का केस जिसकी अदालत में चला था, पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी. डी. खोसला की १९६३ में लिखी पुस्तक, ‘दी मर्डर आफ महात्मा एण्ड अदर केसेस फ्राम ए जज्स नोट बुक’, तथा बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट ईनामदार के संस्मरण, और गोडसे बन्धुओं का प्रतिवाद करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें पढ़ें तो आपको यह स्पष्ट हो जायेगा कि गॉंधीजी की हत्या उपर्युक्त कारणों से नहीं बल्कि जानबूझ की गयी हत्या थी|

पहली दलील पर बिचार करें तो यह कहना सर्वथा असत्य है कि गॉंधीजी देश विभाजन या पाकिस्तान बनने देना चाहते थे| उन्होंने स्पष्ट कहा था कि यदि कांग्रेस देश का विभाजन चाहती है तो ऐसा केवल हमारी लाश पर सम्भव होगा| जब तक मैं जिन्दा हूं मैं कभी भी देश का विभाजन नहीं होने दूंगा|५

अबुल कलाम आजाद लिखते हैं कि जब मैं गॉंधीजी से बात करने के बाद लार्ड माउण्ट बेटन से मिला तो उन्होंने कहा कि यदि कांग्रेस गॉंधीजी का मशवरा मानती है तो देश विभाजन को रोका जा सकता है| और यदि कांग्रेस ऐसा कोई कदम उठाती है तो यह मुस्लिम लीग और जिन्ना को भी स्वीकार्य होगा| किन्तु दुर्भाग्य से यह बात आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल ऐसा नहीं चाहते थे| बल्कि यह कहना उचित होगा कि इन नेताओं ने गॉंधीजी को अपना मशवरा वापस लेने के लिये बाध्य किया|६ अत: यह कहना कि गांधीजी मुसलमानों या पाकिस्तान बनने के हिमायती थे, सरासर गलत है| उन्हें कभी द्विराष्ट्रवाद मान्य नहीं था| वे पााकिस्तान निर्माण के एक सख्त विरोधी थे|

दूसरी दलील के अनुसार गॉंधीजी की हत्या करने वाले यह दावा करते हैं कि ५५ करोड़ रुपये की घटना से उत्तेेजित होकर गांधीजी की हत्या का षड्यंत्र रचा गया था| किन्तु यह बात भी तथ्यों से सर्वथा परे है| अब ५५ करोड़ रुपयों के बारे में एक और हकीकत जान लें| देश विभाजन के बाद भारत सरकार की कुल सम्पत्ति और नकद रकमों का, जनसंख्या के आधार पर, बंटवारा किया गया था| उसके अनुसार पाकिस्तान को कुल ७५ करोड़ रुपये देना तय था| उसमें से २० करोड़ रुपये दे दिये गये थे, ५५ करोड़ रुपये देना शेष था| कश्मीर पर हमला करने वाले पाकिस्तान को यदि ५५ करोड़ रुपये दिये गये, तो उसे वह सेना के लिए खर्च करेगा, यह कहकर ५५ करोड़ रुपये भारत सरकार ने रोक लिए थे| लार्ड माउण्ट बेटन का कहना था कि यह रकम पाकिस्तान की है, अतः उन्हें दे दी जानी चाहिए| इस बात की जानकारी गांधीजी को हुई तो उन्होंने ५५ करोड़ रुपये पाकिस्तान को दे देने की माउण्ट बेटन की बात का समर्थन किया| किन्तु १३ जनवरी, १९४८ कोे किया जाने वाला अनशन उस ५५ करोड़ रुपये के लिये नहीं था| यह धनराशि तो पाकिस्तान को १२ जनवरी को ही दे दी गयी थी| यदि उस राशि को पाकिस्तान को देने के लिये उनका अनशन होता तो १२ जनवरी के पहले होता जबकि अनशन की घोषणा उन्होंने १२ जनवरी की शाम प्रार्थना सभा में की थी कि वह १३ तारीख से अनशन पर बैठेंगे|७

यदि यह मान भी लिया जाय कि अनशन ५५ करोड़ रुपये के लिये था तो दिये जाने के बाद उसे खत्म हो जाना चाहिये था जबकि उनका अनशन १८ जनवऱी, १९४८ तक चला| वह अनशन इस लिये चलता रहा कि वह ५५ करोड़ रुपये के लिये किया ही नहीं गया था| वस्तुत: जनवरी माह के प्रथम सप्ताह में एक मौलाना ने आकर गांधीजी से कहा था कि पाकिस्तान का विरोध करने वाले हमारे जैसे राष्ट्रवादी मुसलमान पाकिस्तान जा नहीं सकते, और हिन्दू सम्प्रदायवादी हमें यहॉं जीने नहीं देते| हमारे लिए तो यहॉं नरक से भी बदतर स्थिति है| आप कलकत्ता में उपवास कर सकते हैं, पर दिल्ली में नहीं कर सकते? गांधीजी मौलाना की बात सुनकर दु:खी हो गये थे| दिल्ली में शान्ति-स्थापना के लिए अनेक प्रयास होने के बावजूद भी शान्ति स्थापित नहीं हुई| अन्त में १३ जनवरी से गांधीजी ने साम्प्रदायिक शान्ति स्थापना के लिये उपवास आरम्भ कर दिया| उन्होंने कहा था, मैं हिन्दू, सिख और मुसलमानों में दिली दोस्ती देखने के लिये तरस रहा हूं| कल तो ऐसी दोस्ती थी| आज उसका अस्तित्व नहीं है| यह ऐसी बात है जिसको कोई हिन्दुस्तानी देशभक्त जो इस नाम के लायक है, ...मेरा उपवास कल सुबह पहले खाने के बाद शुरू होगा|८ ५५ करोड़ रुपयों का सवाल तो संयोगवश उसी समय प्रस्तुत हो गया था| गांधीजी ने अपनी प्रार्थना-सभा में उपवास का हेतु स्पष्ट रूप से घोषित किया था| गॉंधीजी लिखते हैं कि, उपवास का अर्सा अनिश्‍चित है, और जब मुझे यकीन हो जायेगा कि सब कौमों के दिल मिल गये हैं, और वह बाहर के दबाव के कारण नहीं, मगर अपनाअपना धर्म समझने के कारण, तब मेरा उपवास छूटेगा|९ उनके अनशन पर कई लोगों ने आपत्ति भी उठाई थी कि वह केवल मुसलमानों के हित के लिये किया गया था| किन्तु यह गलत है| गॉंधीजी अपनी पूरी जिंदगी यही कहते रहे कि केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि जो भी अल्पसंख्यक हों, उनके हितों की रक्षा के लिए बहुसंख्यकों को हमेशा खड़े रहना चाहिये| यह अनशन एक प्रकार से मुसलमानों के विरोध में भी था क्योंकि उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हिन्दू और सिख भाइयों के लिये खड़ा रहना चाहिये|१० उसके बाद उनका उपवास समाप्त कराने के लिए हिन्दुत्ववादियों सहित तमाम सम्बन्धित पक्षों ने शान्ति की अपील पर हस्ताक्षर किये थे| अत: इस सम्बन्ध में तथ्य को गलत ढंग से दुनियां के सामने रखा गया| वह अनशन ५५ करोड़ रुपये के लिये नहीं अपितु देश में शान्तिस्थापना के लिए किया गया था|

तीसरा तर्क यह दिया जाता है कि गांधीजी के हत्यारे प्रामाणिक देशभक्त और बहादुर थे| ‘मी नाथूराम गोडसे बोलतोय’ नाटक में नाथूराम की ऐसी ही छवि उभारने की कोशिश की गयी है| जो लोग असत्य तथा अर्धसत्य का सहारा लेते हैं क्या उनको प्रामाणिक और बहादुर कहा जा सकता है? इन लोगों ने गांधीजी की हत्या का असली कारण बताने का साहस किया होता या हत्या के किये गये पिछले निष्फल प्रयासों की जिम्मेदारी भी कबूल की होती, तो भी कुछ भिन्न बात होती| एक अहिंसानिष्ठ निशस्त्र व्यक्ति की हत्या करना कोई बहादुरी नहीं, कोरी नपुंसकता है| हिंसा बुजदिलों का मार्ग है, शूरवीरों का नहीं| अपनी निष्फलता और हताशा में ही हिन्दुत्ववादियों ने गांधीजी की हत्या की थी| नाथूराम ने गॉंधीजी की हत्या करने के प्रयास अधिकतर प्रार्थना-सभाओं में ही किये| क्या कायर के अलावा अन्य कोई ऐसे समय में किसी की हत्या कर सकता है| हजारों लोगों की उपस्थिति वाली, गॉंधीजी की प्रार्थना-सभा में बम फेंकने में भी इन लोगों को शर्म नहीं आयी| जिन लोगों के लिए निर्दोष व्यक्तियों की जान की कोई कीमत नहीं, उनको क्या प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त कहा जा सकता है? वह गोपाल गोडसे जिसे देशभक्त कहा जाता है, उसने जेल से छूटने के लिए भारत सरकार को एक दो बार नहीं, २२ बार अर्जी दी थी और ऐसे लोग अपने को शूरवीर कहते हैं| अत: एक निःशस्त्र इन्सान की प्रार्थना के समय हत्या करने वाले व्यक्ति को क्या कभी भी प्रामाणिक, बहादुर और देशभक्त माना जा सकता है? नहीं|

अत: हिन्दुत्ववादियों द्वारा गॉंधीजी की हत्या के पीछे जो दलीलें दी जाती हैं वह कहीं भी नहीं ठहरती| इसमें कोई शक नहीं कि नथूराम गोडसे ने गॉंधीजी की हत्या सोचसमझ कर ठंडे दिल से किया था क्योंकि वह धर्मजनूनी थी| बहुसंख्यक हिन्दुओें को धर्म जुनूनी नहीं होना चाहिये| जब बहुसंख्यकों की धर्मान्धता आक्रामक हो जाती है, तब सारी सुव्यवस्था और राष्ट्रीय भावना खत्म हो जाती है| गॉंधी के खिलाफ इस प्रकार का दुष्प्रचार एक प्रकार से भारत और भारतीयता का खून है| इस तरह गॉंधी नहीं मिटेगा; परन्तु भारत की प्रतिष्ठा तो मिट्टी में मिली जाएगी| ऐसे लोग राष्ट्रप्रेमी नहीं होते, वे द्वेष से अंधे बन जाते हैं| वे भारतीय आत्मा को ही भूल चुके हैं| धर्मान्धता के कारण उन्हें अंधत्व प्राप्त हो गया है| उनकी समस्त संवेदनाएँ खत्म हो गई हैं|

वे यह भी नहीं समझते कि भारतभूमि में से ही नहीं, बल्कि विश्‍व में से गॉंधी का नाम, या विचार पोंछकर मिटाया नहीं जा सकेगा| कुछ बीज ऐेसे होते हैं, जो हृदय में, रग-रग में, रक्त में घुलमिल जाते हैं| कितने ही भयंकर तूफानी बादल आएँ, आँधियॉं आयें, पत्ते और डालियॉं गिर जाएँ, बीजांकुर मूल से उखड़ कर गिर नहीं जाते| बीज जीवन्त ही रहते हैं| मिट्टी में दबे रहने से दिखते नहीं हैं| वर्षा होने पर, मौसम बदलने पर अंकुरित हो जाते हैं| उनमें नई-नई कोंपले फूटती हैं और फिर वृक्ष बनकर वह पुन: फैलता है|

‘इसी प्रकार गॉंधी भारत के गरीब, गॉंव-देहात में रहनेवालों के हृदयों में, हाड़-मॉंस मेंे बसा हुआ है, जाग रहा है| किसी की द्वेषमूलक करनी या षडयंत्रों से उस बीज को कुछ नहीं होनेवाला| प्रहार करनेवाले प्रहार करते ही रहेंगे; पर गॉंधी का प्रभाव कम नहीं होगा| गॉंधी का चारित्र्य पुस्तक में नहीं है, वह हृदय पर उत्कीर्ण है| क्योंकि आखिर गॉंधी का जीवन ही उनका संदेश था| असत्य पर आधारित कलुषित व विकृत इतिहास नए सिरे से, चाहे जैसा, लिखने के महत्त्वाकांक्षी लोग उसे चाहे जितना प्रयत्न करें, उनके यथार्थ चरित्र को मिटा नहीं सकेंगे| किन्तु सवाल यह है कि तब तक सज्जन सोते रहेंगे क्या? क्या दुर्जनों को ही सक्रिय होने देना है? अब्राहम लिंकन के कथनानुसार जब आवाज उठाने की और कृति करने की आवश्यकता हो तब जो चुप्पी साथ लेते हैं, वे भीरु होते हैं| मार्टिन ल्ाूूथर किंग ने भी कहा था कि दुर्जनों के बुरे कर्मों की अपेक्षा सज्जनों का मौन अधिक खतरनाक (घातक) होता है| इसी को मौन समर्थन कहते हैं| सज्जनों का मौन ही राक्षस की शक्ति होती है| उसकी अपनी कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं होती| हमें यह मौन तोड़ना होगा| सामान्यजनों और सज्जनों का सक्रिय होना जरूरी है, अन्यथा गुजरात की एक कहावत के अनुसार सज्जन एक दूसरे से मात्र श्मशान में ही मिलेंगे और महात्मा गॉंधी की हत्या इसी प्रकार दिन-प्रतिदिन होती रहेगी’११|

सन्दर्भ -

१) गॉंधीजीनी दक्षिण अफ्रीकानी लड़त, भाग२, चन्दू लाल भग्गूभाई दलाल, प्रका. परीक्षित लाल लल्लूभाई मजमूदार, १९५७ पृ. ५; तथा दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास, मो. क. गॉंधी, पृ. १८९; २) महात्मा गॉंंधी : पूर्णाहुति : प्रथम खण्ड, पृष्ठ ११४; ३) Mahatma Gandhi, The Last Phase, by Pyarelal, Navjeevan Publishing house - Volume - 1st, 1956 - P. 244, सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय, खण्ड ८४ पृ ३८१; ४) सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय, खण्ड ८४ पृ ३८१; ५) India Wins Freedom by Maulana Abul Kalam Azad, Orient Longmans, New Delhi, 1959, P. 186; 6) Ibid, P. 187; 7) In his prayer discourse on the evening of January 12th, 1948, Gandhi announced his decision to fast from 13th, for an indeterminate period, to bring about a reunion of hearts of all communities. Mahatma, D. G. Tendulkar, Vol. VIII, p.246, published by the Director Publication Division Ministry of Information, Government of India, 1990 ; ८) सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय खण्ड ९० पृ. ३९०; ९) सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय खण्ड ९० पृ. ३९०; १०) His fast was against the Muslim too in the sense that it should enable them to stand up to their hindu and Sikh brethern. Mahatma, D. G. Tendulkar, Vol. VIII, p.251; ११) न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर धर्माधिकारी का चिन्तन, २३.१२.२०१४|

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