Gandhi Research Foundation

Articles - २ अक्टूबर और महात्मा गॉंधी

२ अक्टूबर (गॉंधी जयन्ती) पर गॉंधीजी को याद करना अब एक औपचारिकता मात्र रह गयी है| हमारे लिये वे अब बीते हुए इतिहास का एक प्रसंग मात्र बन कर रह गए हैं| आज गॉंधीजी के सिद्धान्त जैसे सत्य, अहिंसा, सादगी, अपरिग्रह, साध्य तथा साधन की शुद्धता आदि जो श्रेष्ठ विश्‍व की संकल्पना के मुख्य घटक हैं, उपेक्षित से पड़े हैं| उनमें से एक को भी यदि हम अपने जीवन में उतार पाने का संकल्प ले पाते तो उनके जन्मजयन्ती की हमारे लिये सार्थकता होती| गॉंधीजी ने अपने जीवन काल में अपना जन्म दिवस हमेशा की तरह उपवास, प्रार्थना और विशेष सूत कताई कर मनाया| उन्होंने बताया कि उपवास आत्म-शुद्धि के लिए है और कताई द्वारा मैं ईश्‍वरीय सृष्टि के सबसे दीन-हीन लोगों की सेवा में जीवन अपर्ण करने के अपने प्रण को दोहराता हूँ| वे अपना जन्मदिन चरखे के पुनर्जन्म के समारोह के रूप में परिवर्तित कर दिये थे| चरखा अहिंसा का द्योतक है| गॉंधीजी ने अपने जन्म दिवस पर विश्‍व के सभी भागों से आये बधाई सन्देशों, तारों और पत्रों को प्रकाशनार्थ जारी करने से इन्कार कर दिया था| वे आम जनता में सत्य और अहिंसा के प्रति, अविश्‍वास से दु:खी थे, इसलिये अपने जन्म दिन की उन्हें कोई खुशी नहीं थी| - सम्पादक

२ अक्टूबर १९३३ को जब ‘वर्ल्ड फेलोशिप आफ फेथ्स’ के आयोजकों ने गॉंधीजी से उनकी जयन्ती पर कुछ सन्देश देने का आग्रह किया तो गॉंधीजी ने कहा था कि ‘जो जीवन मैं जी रहा हूं, यदि इससे कोई सन्देश नहीं दे सका तो पेन से लिखकर कौन सा सन्देश भेज सकूंगा’|१ उनके इस कथन की प्रतिध्वनि ७ सितम्बर १९४७ को उनके द्वारा दिये गये ‘आमार जीवन आमार वानी’ इस सन्देश में भी सुनाई देती है जब गॉंधीजी कलकत्ता के बेलियाघाट में ३० दिन के प्रवास के बाद दिल्ली जाते समय लोगों के आग्रह पर दिये थे|

२ अक्टूबर १९४१ को गॉंधीजी ने अपना जन्मदिन एक सभा के माध्यम से मनाया| उन्होंने कहा था कि मैं अपनी जयन्ती को कोई महत्त्व नहीं देता| इसके बजाय इसे मैं चरखाजयन्ती कहता हूं| उस दिन सभा में उन्होंने कहा कि कोई काम चाहे जितना छोटा और तुच्छ हो, यदि वह सेवा-भाव से और लाभ की आशा न रखते हुए किया जाये तो ईश्‍वर की दृष्टि में बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है| उदाहरण के लिए अगर भंगी का काम नि:स्वार्थ भाव से और सेवावृत्ति से किया जाये तो वह बहुत अधिक मूल्यवान है| अन्त में उन्होंने लोगों से चरखे और कताई का विकास करने का अनुरोध किया|२

२ अक्तूबर, १९४४ को अपनी जन्मजयन्ती के दिन गॉंधीजी सेवाग्राम में थे| एक हिन्दू प्रतिनिधि के अनुसार उस दिन सुबह जब उनसे मिलकर मैंने पूछा कि इस शुभ दिन देश के लिए क्या वे कोई सन्देश देना चाहेंगे तो उत्तर में उन्होंने कहा: मैं ऐसे अवसरों पर सन्देश देने का आदी नहीं हूँ| गॉंधीजी ने हंसी के बीच कहा: मैं १२५ वर्ष जीना चाहता हूँ| लेकिन पर्णकुटी, पूना में मालवीयजी का जो तार आया उसमें उन्होंने मेरे शतायु होने की कामना करते हुए मेरी आयु में २५ वर्ष कम कर दिये|

बर्नाड शॉ का भी सन्देश आज प्राप्त हुआ| उन्होंने लिखा था कि वे गॉंधीजी को जन्म-दिन की शुभकामनाएँ नहीं देंगे| गॉंधीजी जोर से हँसे और बोले: यह हुई न कोई बात| कुछ साल पहले तक मुझे यही पता नहीं था कि मेरा भी जन्म-दिन होता है|

उसी दिन कस्तूरबा न्यास की बैठक३ में गॉंधीजी ने उपस्थित लोगों को स्मरण दिलाया कि आज की यह बैठक कोई सार्वजनिक सभा नहीं है| यह बैठक तो ‘कस्तूरबा गॉंधी राष्ट्रीय स्मारक निधि’ के न्यासियों और संग्रहकर्ताओं की बैठक है, जो एकत्र हुआ चन्दा मुझे समर्पित करने के लिए हो रही है| इस अवसर पर वर्धा और वर्धा से बाहर के बहुत सारे लोगोंें की उपस्थिति का कारण यह है कि वर्षों से सारे भारत के लोगों में मेरा जन्म-दिन भारतीय और अंग्रेजी, दोनों पंचांगों के अनुसार मनाने का रिवाज पड़ गया है| दोनों तिथियों के बीच पड़ने वाली अवधि को भी मेरे जन्मदिवस पर मनाये जानेवाले समारोह में शामिल कर लिया जाता है| इस बार लोगों को बहुत पहले से ही मालूम हो गया था कि मैं २ अक्टूबर को थैली स्वीकार करने के लिए सेवाग्राम आने वाला हूँ|

उन्होंने बताया कि ‘कस्तूरबा गॉंधी राष्ट्रीय स्मारक निधि’ के द्वारा एकत्र की जाने वाली धनराशि स्वर्गीया श्रीमती कस्तूरबा की स्मृति के अनुरूप किस प्रकार खर्च की जाये, इस मामले में न्यासियों का मार्ग-दर्शन करने की खातिर मैं अध्यक्ष बन गया| बुनियादी जिम्मेदारी तो न्यासियों की है, लेकिन सबसे ज्यादा जिम्मेदारी मुझ पर ही है| यह धन उन गॉंवों पर खर्च होना है जो शहरों के अंग नहीं हैं| जो गॉंव शहरों से जितने ज्यादा दूर और जितने ज्यादा गरीब हों उन पर इस राशि को खर्च करना उतना ही अच्छा रहेगा| बुनियादी तालीम के दायरे में समूचे समाज की शिक्षा शामिल है| इसकी शुरुआत बच्चों से होती है और बढ़ते-बढ़ते इसके अन्दर वयस्क और बूढ़े स्त्री-पुरुष भी आ जाते हैं| यह शिक्षा दस्तकारी, गॉंव की सफाई और बीमारियों की, खासतौर से पौष्टिकता की कमी से पैदा होनेवाली बीमारियों की, रोकथाम और उनके इलाज से सम्बन्धित चिकित्सा-सहायता के जरिये दी जानी होगी|

भारत के सात लाख गॉंवों में इन सुधारों को लागू करने का यह एक बृहत् कार्य है, उसको देखते ७५ लाख रुपये या एक करोड़ रुपये कुछ भी नहीं हैं| जिस क्षेत्र से जितना धन इकट्ठा होगा, उसका ७५ प्रतिशत उस क्षेत्र में ही खर्च किया जायेगा-लेकिन वहॉं के शहरों या कस्बों पर नहीं - और बाकी २५ प्रतिशत केन्द्रीय निधि में चला जायेगा और उसमें से कोई भी रकम शहरों में नहीं खर्च की जायेगी|

मेरी इच्छा है कि जहॉं तक हो सके, धन महिला कार्यकर्ताओं के जरिये खर्च किया जाये| यदि औरतें, खासतौर से बूढ़ी औरतें स्मारक-निधि के लक्ष्य को पूरा करने में आगे बढ़कर हिस्सा लेंगी तो दिवंगता की आत्मा को शान्ति प्राप्त होगी| यह निधि दिवंगता की स्मृति के प्रति लोगों के अत्युत्साह और प्रेम के फलस्वरूप एकत्र की जा सकी है| मैं चाहता हूँ कि आप इस बात का ध्यान रखें कि इस निधि का धन उस भावना के अनुरूप ढंग से ही खर्च किया जाये| जब तक मैं सशरीर आपके बीच हूँ तब तक मैं आपसे बहस करूँगा, झगडूँगा, लेकिन यह आपकी जिम्मेदारी है कि आप इस बात का खयाल रखें कि आपका काम इस तरह चले जिससे दिवंगत आत्मा को किसी प्रकार का असन्तोष न होने पाये|४

गॉंधीजी का ७८ वॉं एवं अन्तिम जन्म-दिवस

अक्टूबर, १९४७ की २ तारीख, गॉंधीजी का जन्म-दिवस उनके जीवनकाल में मनाया जानेवाला अन्तिम और ७८ वां जन्म-दिवस था| सुबह भोर होते ही उनके दल के लोग उन्हें अभिवादन करने आ गये| उन्होंने अपना जन्म-दिन हमेशा की तरह उपवास, प्रार्थना और विशेष कताई कर मनाया| उन्होंने बताया कि उपवास आत्म-शुद्धि के लिए है और कताई द्वारा मैं ईश्‍वरीय सृष्टि के सबसे दीन-हीन लोगों की सेवा में जीवन अपर्ण करने के अपने प्रण को दोहराता हूँ| मैंने अपने जन्म-दिवस समारोह को चरखे के पुनर्जन्म के समारोह के रूप में परिवर्तित कर दिया है| चरखा अहिंसा का द्योतक है| वह प्रतीक समाप्त हो गया मालूम पड़ता है| मगर इस आशा से कि शायद चरखे के सन्देश के प्रति निष्ठावान कुछ थोड़े से लोग जहॉंजहॉं हो सकते हैं, मैंने इन्हीं लोगों की खातिर चरखा जयन्ती का आयोजन आगे जारी रखने दिया|

साढ़े आठ बजे स्नान के बाद जब वे अपने कमरे में प्रविष्ट हुए, तो वहॉं कुछ अन्तरंग साथी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे जिनमें पण्डित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, गॉंधीजी के मेजबान घनश्याम दास बिड़ला और दिल्ली स्थित बिड़ला परिवार के समस्त सदस्यगण शामिल थे| मीराबहन ने गॉंधीजी के आसन के सामने रंग-बिरंगे फूलों से कलापूर्ण क्रॉस हे राम! और ‘ऊँं’ लिखकर खूबसूरती से सजाया था| एक संक्षिप्त प्रार्थना हुई, जिसमें सबनेे भाग लिया| उसके बाद उनका एक प्रिय अंग्रेजी भजन ‘आई सर्वे द वन्डर्स क्रॉस’ गाया गया| साथ ही उनका एक और प्रिय हिन्दी भजन - ‘हे गोविन्द राखो शरण’ का भी गायन हुआ|

सारे दिन राष्ट्रपिता को बधाई सन्देश देने वाले आगन्तुकों एवं मित्रों का तांता लगा रहा| इसी प्रकार राजदूतावासों के प्रतिनिधिगण भी गॉंधीजी के लिए शुभकामना-सन्देश लेकर आये| अन्त में लेडी माउंटबैटन अपने साथ गॉंधीजी के लिए लिखे गये पत्रों और तारों का पुलिन्दा लेकर आईं| गॉंधीजी ने सब लोगों से अनुरोध किया कि वे इस बात की प्रार्थना करें कि ईश्‍वर या तो इस दावानल को शान्त कर दे अथवा उन्हें उठा ले| मैं कतई नहीं चाहता कि भारत में मेरा एक और जन्मदिन होने पाये|

वे सरदार से बोले: मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया था कि जो ईश्‍वर ने मुझे इस सारे संत्रास का साक्षी बनने के लिए जीवित छोड़ रखा है? वे अपने आसपास हो रहे अग्निकाण्ड के बीच विवशता की भावना से जकड़े नजर आते थे| सरदार की पुत्री मणिबहन ने उस दिन अपनी पत्रिका में दु:ख प्रकट करते हुए लिखा : उनकी व्यथा असह्य थी| हम लोग उनके पास उत्साह के साथ गये थे, मगर बोझिल हृदय लेकर घर लौटे|

मुलाकातियों के चले जाने के बाद वे बड़बड़ाते हुए बोले, यदि प्रभुनाम की सर्वरोगहर प्रभावकारी शक्ति मुझमें व्याप्त नहीं हो जाती, तो मैं इस अस्थिपंजर को त्याग देना अधिक पसन्द करूंगा| एक भाई द्वारा दूसरे भाई की हत्या का सिलसिला जारी देखकर मेरी १२५ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा पूर्णतया जाती रही है| मैं इन हत्याओं का विवश साक्षी बनकर नहीं रहना चाहता|

आकाशवाणी पर गॉंधीजी का जन्मदिन मनाने के लिए एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित करने का आयोजन किया गया था| जब गॉंधीजी से यह पूछा गया कि क्या आप अपवाद-स्वरूप सिर्फ एक बार रेडियो का विशेष कार्यक्रम नहीं सुनेंगे, तो उन्होंने उत्तर दिया, नहीं, मुझे रेडियो के बजाय रेंटियॉं (चरखा) ज्यादा पसन्द हैं| चरखे की गुनगुनाहट अधिक मधुर है| उसमें मुझे मानवता का निस्तब्ध विषादपूर्ण संगीत सुनाई देता है|

प्रार्थना-सभा में भाषण

उस दिन प्रार्थना सभा में भाषण देते हुये गॉंधीजी ने कहा था कि आज तो मेरी जन्म-तिथि है| मैं तो कोई अपनी जन्म-तिथि इस तरह से मनाता नहीं हूँ| मैं तो कहता हूँ कि फांका करो, चरखा चलाओ, ईश्‍वर का भजन करो, यही जन्म-तिथि मनाने का मेरे खयाल में सच्चा तरीका है| मेरे लिए तो आज यह मातम मनाने का दिन है| मैं आज तक जिन्दा पड़ा हूँ, इसपर मुझको खुद आश्‍चर्य होता है, शर्म लगती है| मैं वही शख्स हूँ कि जिसकी जुबान से एक चीज निकलती थी कि ऐसा करो तो करोड़ों उसको मानते थे, पर आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है| हम तो बस हिन्दुस्तान में हिन्दू ही रहने देंगे और बाकी किसी को पीछे रहने की जरूरत नहीं है| आज तो ठीक है कि मुसलमानों को मार डालेंगे, कल पीछे क्या करोगे? पारसी, क्रिस्टी और अंग्रेजों का क्या होगा? आज तो हमारे पास ऐसे मुसलमान पड़े हैं, जो हमारे ही हैं, आज उनको भी मारने के लिए हम तैयार हो जाते हैं| किन्तु मैं तो जबसे हिन्दुस्तान आया हूँ, मैंने तो ऐसा ही कार्य किया कि जिससे हिन्दू, मुसलमान सब एक बन जायें| धर्म से एक नहीं, लेकिन सब मिलकर भाई-भाई होकर रहने लगें| लेकिन आज तो हम एक-दूसरे को दुश्मन की नजर से देखते हैं, ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहॉं है और मैं उसमें जिन्दा रहकर क्या करूँगा? आज मेरे से १२५ वर्ष, १०० वर्ष और ९० वर्ष की बात पीछे छूट गयी है| आज मैं ७९ वर्ष में तो पहुँच जाता हूँ, लेकिन वह भी मुझको चुभता है| मैं तो आप लोगों को, जो मुझको समझते हैं, उनसे कहूँगा कि हम यह हैवानियत छोड़ दें| मुझे इसकी परवाह नहीं कि पाकिस्तान में मुसलमान क्या करते हैं| मुसलमान वहॉं हिन्दुओं को मार डालें, उससे वे बड़े होते हैं, ऐसा नहीं वह तो जाहिल हो जाते हैं, हैवान हो जाते हैं तो क्या मैं उसका मुकाबला करूं, हैवान बन जाऊं, पशु बन जाऊं, जड़ बन जाऊं? मैं तो ऐसा करने से साफ इन्कार करूँगा और मैं आपसे भी कहूँगा कि आप भी इन्कार करें| अगर आप सचमुझ मेरी जन्म-तिथि को माननेवाले हैं तो आपका तो धर्म यह हो जाता है कि अबसे हम किसी को दीवाना बनने नहीं देंगे, हमारे दिल में अगर कोई गुस्सा हो तो हम उसको निकाल देंगे| इतनी चीज आप याद रख सकें तो मैं समझूँगा कि आपने काम ठीक किया है| बस इतना ही मैं आपसे कहना चाहता हूँ|

सन्दर्भ -

१. दिस वाज बापू, आर. के. प्रभु, पृ. १८; २. हिन्दू, ३१०१९४१;

३. गॉंधीजी ने कस्तूरबा गॉंधी स्मारक निधि के न्यासियों और संग्रहकर्ताओं की इस बैठक में हिन्दी में भाषण दिया था| न्यासियों की ओर से सरोजिनी नायडू ने गॉंधीजी को ८० लाख रुपये की एक थैली भेंट की थी; ४. हिन्दू ४.१०.१९४४.

Back to Articles


Address
Gandhi Teerth, Jain Hills, PO Box 118,
Jalgaon - 425 001 (Maharashtra), India
 
Contact Info
+91 257 2260033, 2264801;
+91 257 2261133
© Gandhi Research Foundation Site enabled by : Jain Irrigation Systems Ltd