Gandhi Research Foundation

Articles - गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष - श्रीमद् राजचन्द्

श्रीमद् राजचन्द्र रावजीभाई मेहता (१८६७-१९०१) एक कवि, दार्शनिक और विद्वान थे| महात्मा गॉंधी के जीवन पर जिन महापुरुषों का विशेष प्रभाव पड़ा था, श्रीमद् राजचन्द्र या रायचन्द भाई उनमें से प्रमुख थे| गॉंधीजी स्वीकार करते हैं कि ‘मैं धर्म के विषय में बहुत ही दिग्भ्रमित था| सोचता था कौन सा धर्म अच्छा है - ईसाई धर्म अथवा हिन्दू धर्म| मैंने अपनी कठिनाइयां व्यक्तिगत चर्चा तथा पत्र के माध्यम से रायचन्दभाई के सामने रखीं| उन्होंने हमारी धर्म सम्बन्धी सभी जिज्ञासाओं का सम्यक् समाधान किया|’ जब गॉंधीजी के ईसाई मित्र उन्हें बप्तिस्मा (इरिींळीा) पढ़ाने की कोशिशों में लगे हुये थे, रायचन्द भाई के विद्वतापूर्ण पत्रों ने ही अन्तिम रूप से हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा को दृढ़ किया| वे लिखते हैं कि आध्यात्मिक संकट के समय मैंने उनका सहारा लिया था किन्तु उन्हें धर्मगुरु के रूप में अपने हृदय में स्थान न दे सका| प्रस्तुत है पाठकों के समक्ष श्रीमद् राजचन्द्र और गॉंधीजी के सम्बन्धों तथा श्रीमद् राजचन्द्र के गॉंधीजी पर पड़े प्रभाव को दर्शाता यह लेख - सम्पादक

जीवन परिचय व प्रभाव-स्त्रोत

श्रीमद् राजचन्द्र रावजीभाई मेहता का जन्म सौराष्ट्र (गुजरात) के ववाणिया गांव में ९ नवम्बर १९६७ को पिता रावजी भाई औेर मां देवबा के परिवार में हुआ था| बचपन से उनमें वैराग्यप्रधान जैन सूत्रों तथा भावना में गहरी रुचि थी| आठ वर्ष की उम्र से ही वे कविता लिखना प्रारम्भ कर दिये थे| १८७४ में गांव के एक व्यक्ति अमीचन्दभाई की मृत्यु हुई तब राजचन्द्र ने मृत्यु क्या है, यह अपने दादा से जानना चाहा| दादाजी के उत्तर से असन्तुष्ट राजचन्द्र को जलती चिता देखकर जगत् की निस्सारता का बोध हुआ| मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें जातिस्मरण ज्ञान हो गया था| उनमें असाधारण स्मरण शक्ति थी| तेरह वर्ष की उम्र में वह अपने पिता की सोनेचांदी की दुकान पर बैठ कर व्यवसाय में उनका हाथ बंटाना प्रारम्भ कर दिये थे| दुकान पर भी गुजराती, संस्कृत, हिन्दी, प्राकृत भाषा का उनका अध्ययन सतत् चलता रहा| २२ जनवरी १८८७ को पहली बार उन्होंेंने शतावधान का प्रयोग कर सबको मन्त्रमुग्ध कर दिया| वैराग्य में उनकी रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही थी| उन्होंने गहन साधना की| व्यापार का त्याग कर वह दीक्षा लेना चाहते थे किन्तु अस्वस्थता और मां की आज्ञा न मिलने के कारण दीक्षा नहीं ले सके| कठिन साधना और उपवास से कारण लगातार स्वास्थ्य गिरते रहने के कारण १९०१ में उनकी मृत्यु हो गयी| ‘आत्मसिद्धि, मोक्षमाला, भावनाबोध’ उनकी प्रसिद्ध रचनायें हैं जिनका जैन तत्त्वज्ञान के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान है| वे एक कवि, दार्शनिक और विद्वान थे|

महात्मा गॉंधी के जीवन पर उनके विचारों का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा था| श्रीमद् राजचन्द्र, गॉंधीजी के आध्यात्मिक गुरु कहे जा सकते हैं क्योंकि अध्यात्म का पाठ उन्होंने श्रीमद् राजचन्द्र से ही पढ़ा था| इंग्लैण्ड से कानून की डिग्री लेकर गॉंधीजी जब १८९१ में भारत लौटे तब श्रीमद् राजचन्द्र के साथ उनकी पहली मुलाकात बम्बई में डॉ. फिरोजशाह मेहता के घर पर हुई| वे शतावधानी थे| गॉंधीजी लिखते हैं, ‘जिस चीज ने मुझे रायचन्द भाई की तरफ आकर्षित किया वह था उनका व्यापक शास्त्रज्ञान, उनका शुद्ध चारित्र्य और आत्म दशर्र्न करने का उनका उत्कट उत्साह|’१ गॉंधीजी लिखते हैं कि कविश्री (रायचन्द भाई) के जीवन और उनकी रचनाओं के सम्बन्ध में जितना विचार करता हूं, उतना ही मुझे लगता है कि वे अपने युग के सर्वश्रेष्ठ भारतीय थे| वस्तुत: मैं उनको धार्मिक बोध की दृष्टि से टालस्टाय से भी ऊंचा मानता हूं|२ गॉंधीजी स्वीकार करते हैं कि मैं धर्म के विषय में बहुत ही दिग्भ्रमित था| सोचता था कौन सा धर्म अच्छा है - ईसाई धर्म अथवा हिन्दू धर्म| मैंने अपनी कठिनाइयां रायचन्दभाई के सामने रखीं| मैंने पत्र व्यवहार किया| रायचन्द भाई के उत्तर से मुझे बड़ी शान्ति मिली| उन्होंने धीरज रखने और हिन्दूधर्म का गहरा अध्ययन करने की सलाह दी| उनके वाक्य का भावार्थ यह था कि, निष्पक्ष भाव से विचार करते हुये मुझे यह प्रतीति हुई है कि हिन्दूधर्म में जो सूक्ष्म और गूढ़ विचार हैं, आत्मा का निरीक्षण है, दया है, वह दूसरे धर्मों में नहीं है|३ महात्मा गॉंधी ने जिन सत्ताइस प्रश्‍नों४ को श्रीमद् राजचन्द्र से पूछा था उनका सिलसिलेवार उत्तर उन्होंने उन्हें भेजा था जब वह दक्षिण अफ्रीका में थे| प्रस्तुत है गॉंधीजी के सत्ताइस प्रश्‍न और श्रीमद् राजचन्द्र के उत्तर

प्रश्‍न १ : १) आत्मा क्या है? २) वह कुछ करता है? ३) और उसे कर्म दु:ख देते हैं या नहीं?

उत्तर : १) जैसे घटपटादि जड़ वस्तुएँ हैं, वैसे आत्मा ज्ञानस्वरूप वस्तु है| घटपटादि अनित्य हैं, क्योंकि वे एक स्वरूप से स्थिति करके त्रिकाल नहीं रह सकते| आत्मा एक स्वरूप से स्थिति करके त्रिकाल रह सकता है, इसलिये नित्य पदार्थ है| पदार्थ की उत्पत्ति किसी भी संयोग से नहीं हो सकती| क्योंकि जड़ के चाहे हजारों संयोग करें तो भी उससे चेतन की उत्पत्ति नहीं हो सकती| जो धर्म जिस पदार्थ में नहीं है, वह उत्पन्न नहीं हो सकता, ऐसा अनुभव सिद्ध है| ज्ञानस्वरूपता, आत्मा का मुख्य लक्षण है, और उसके अभाववाला मुख्य लक्षण जड़ का है| उन दोनों के ये अनादि सहज स्वभाव हैं|

सुखदु:ख आदि भोगना, उससे निवृत्त होना, विचार करना, प्रेरणा करना इत्यादि भाव जिसकी विद्यमानता से अनुभव में आते हैं, वह आत्मा मुख्य चेतन (ज्ञान) लक्षणवाला है; और उस भाव से (स्थिति से) वह सर्व काल रह सकनेवाला नित्य पदार्थ है, ऐसा मानने में कोई भी दोष या बाधा प्रतीत नहीं होती|

यह प्रश्‍न तथा आपके दूसरे कितने ही प्रश्‍न ऐसे हैं जिनमें विशेष लिखने तथा कहने और समझाने की आवश्यकता है| उन प्रश्‍नों के उत्तर वैसे स्वरूप में लिख पाना अभी कठिन है| इसलिये पहले ‘षड्दर्शनसमुच्चय’ ग्रन्थ आपको भेजा था, उसे पढ़ने और विचारने से कुछ अंशों में आपके प्रश्‍नों का समाधान हो सकता है|

२) ज्ञानदशा में, आत्मा निजभाव का अर्थात् ज्ञान, दर्शन और सहज समाधि परिणाम का कर्ता है| आत्मा अज्ञान दशा में क्रोध, मान, माया, लोभ इत्यादि प्रकृति का कर्ता है, और उस भाव के फल का भोक्ता होने से प्रसंगवशात् घटपटादि पदार्थ का निमित्त रूप से कर्ता है| यह जो पीछे उसकी दशा कही है, उसे जैन दर्शन ‘कर्म’ कहता है, वेदांत ‘भ्रांति’ कहता है, तथा दूसरे भी तदनुसारी ऐसे शब्द कहते हैं| वास्तविक विचार करने से आत्मा घटपटादि का तथा क्रोधादि का कर्ता नहीं हो सकता, मात्र निजस्वरूप ज्ञान परिणाम का ही कर्ता है, ऐसा स्पष्ट है|

३) अज्ञान भाव से किये हुए कर्म प्रारम्भ काल में बीजरूप होकर समय का योग पाकर वृक्ष और फलरूप परिणाम देते हैं; अर्थात् वे कर्म आत्मा को भोगने पड़ते हैं| जैसे अग्नि के स्पर्श से उष्णता का सम्बन्ध होता है, और उसका सहज वेदनारूप परिणाम होता है, वैसे आत्मा को क्रोधादि भाव के कर्ता रूप से जन्म, जरा, मरणादि वेदनारूप परिणाम होता है| इस पर आप विशेषरूप से विचार कीजियेगा, और तत्सम्बन्धी जो कोई प्रश्‍न हो उसे लिखियेगा|

प्रश्‍न २ : १) ईश्‍वर क्या है? २) क्या वह सचमुच जगतकर्ता है?

उत्तर : १) हम आप कर्मबंध में फंसे हुए जीव हैं| उस जीव का सहज स्वरूप अर्थात् कर्मरहित जो एक आत्म स्वरूप है, वह ईश्‍वरत्व है| जिसमें ज्ञानादि ऐश्‍वर्य हैं, जो आत्मा का सहज स्वरूप है, उसे ईश्‍वर कहना योग्य है| इसलिये जो ईश्‍वर है वह आत्मा का दूसरा पर्यायवाची नाम है| इसलिए कोई विशेष सत्तावाला पदार्थ ईश्‍वर है, ऐसा नहीं कहा जा सकता|

२) वह जगतकर्ता नहीं है, अर्थात् परमाणु, आकाश आदि पदार्थ नित्य हैं, वे किसी भी वस्तु से निर्मित होने योग्य नहीं हैं| कदाचित् ऐसा मानें कि वे ईश्‍वर से बने हैं, तो ईश्‍वर को चेतन रूप मानना पड़ेगा, जिससे परमाणु, आकाश इत्यादि कैसे उत्पन्न हो सकते हैं? क्योंकि चेतन से जड़ की उत्पत्ति होना सम्भव ही नहीं है| यदि ईश्‍वर को जड़ रूप स्वीकार किया जाय तो वह सहज ही अनैश्‍वर्यवान ठहरता है, तथा उससे जीवरूप चेतन पदार्थ की उत्पत्ति भी नहीं हो सकती| जड़चेतन उभयरूप ईश्‍वर मानें तो फिर जड़ चेतनरूप जगत् है, उसका ईश्‍वर ऐसा दूसरा नाम कहकर संतोष मानना, इसकी अपेक्षा जगत् को जगत् कहना, यह विशेष योग्य है| कदाचित परमाणु, आकाश आदि को नित्य मानें और ईश्‍वर को कर्मादि का फल देनेवाला मानें तो भी यह बात सिद्ध प्रतीत नहीं होती| इस विचार पर ‘षड्दर्शनसमुच्चय’ में अच्छे प्रमाण दिये गये हैं|

प्रश्‍न ३ : मोक्ष क्या है?

उत्तर : जिस क्रोधादि अज्ञान भाव में, देहादि में आत्मा प्रतिबंधित है, उससे सर्वथा निवृत्ति होना, मुक्त होना मोक्ष है|

प्रश्‍न ४ : मोक्ष मिलेगा या नहीं यह निश्‍चित रूप से इस देंह में ही जाना जा सकता है?

उत्तर : एक रस्सी के बहुत से बंधों से हाथ बॉंध दिया गया हो, उनमें से अनुक्रम से ज्योंज्यों बंध छोड़ने में आते हैं, त्यों-त्यों उस बंध के सम्बन्ध की निवृत्ति अनुभव में आती है| उसी प्रकार अज्ञानाभाव के परिणाम स्वरूप बंध का प्रसंग आत्मा से ज्यों-ज्यों छूटता है त्यों-त्यों मोक्ष का अनुभव होता जाता है; और जब उसकी अतीव अल्पता हो जाती है, तब सहज ही आत्मा में निजभाव प्रकाशित होकर अज्ञानभावरूप बंध से छूट जाने का स्पष्ट अनुभव होता है, अर्थात् मोक्षपद इस देह में भी अनुभव किया जा सकता है|

प्रश्‍न ५ : ऐसा पढ़ने में आया है कि मनुष्य देह छोड़कर कर्म के अनुसार जानवरों में जन्म लेता है, पत्थर भी होता है, वृक्ष भी होता है, क्या यह ठीक है?

उत्तर : देह छोड़ने के बाद उपार्जित कर्म के अनुसार जीव की गति होती है| इससे वह तिर्यंच (जानवर) भी होता है और पृथ्वीकाय अर्थात् पृथ्वीरूप शरीर धारणकर बाकी दूसरी चार इन्द्रियों के बिना कर्म भोगने का प्रसंग जीव को आता है; तथापि वह सर्वथा पत्थर अथवा पृथ्वी हो जाता है, ऐसा कुछ नहीं है| पत्थररूप काया धारण करता है और उसमें भी अव्यक्तरूप से जीव, जीवरूप ही होता है| दूसरी चार इन्द्रियों की वहॉं अव्यक्तता (अप्रगटता) होने से पृथ्वीकाय रूप जीव कहने योग्य है| अनुक्रम से उस कर्म को भोगकर जीव निवृत्त होता है, तब केवल पत्थर का दल परमाणु रूप से रहता है, परन्तु जीव के उसके सन्बन्ध को छोड़कर चले जाने से उसे आहारादि संज्ञा नहीं होती अर्थात् जीव केवल जड़ जैेसा पत्थर हो जाता है, ऐसा नहीं है| कर्म की विषमता से चार इन्द्रियों का प्रसंग अव्यक्त होकर केवल एक स्पर्शेन्द्रिय रूप से देह का प्रसंग जीव को जिस कर्म से होता है, उस कर्म को भोगते हुए वह पृथ्वी आदि में जन्म लेता है, परन्तु वह सर्वथा पृथ्वीरूप अथवा पत्थररूप नहीं हो जाता| जो देह है, वह जीव की वेशधारिता है, स्वरूपता नहीं है|

प्रश्‍न ६,७ : ५वें प्रश्‍न के उत्तर में छठें और सातवें प्रश्‍न का भी समाधान आ गया है कि केवल पत्थर या केवल पृथ्वी किसी कर्म का कर्ता नहीं है| उसमें आकर उत्पन्न हुआ जीव कर्म का कर्ता है, और वह भी दूध और पानी की तरह है| जैसे दूध पानी का संयोग होने पर भी दूधदूध है और पानी-पानी है, वैसे ही एकेन्द्रिय आदि कर्मबन्ध से जीव में पत्थरपन, जड़ता मालूम होती है, तो भी वह जीव अन्तर में तो जीवरूप ही है; और वहॉं भी वह आहार, भय आदि संज्ञापूर्वक है, जो अव्यक्त जैसी है|

प्रश्‍न ८ : १) आर्य धर्म क्या है? २) सबकी उत्पत्ति वेद में से ही है क्या?

उत्तर : १) आर्य धर्म एक व्यापक धर्म है| सभी अपने पक्ष को आर्य धर्म कहना चाहते हैं| जैन जैन को, बौद्ध बौद्ध को, वेदांती वेदांत को आर्य धर्म कहते हैं| तथापि ज्ञानीपुरुष तो जिससे आत्मा को निज स्वरूप की प्राप्ति हो, ऐसा जो आर्य (उत्तम) मार्ग है उसे आर्य धर्म कहते हैं, और यही योग्य है|

२) सबकी उत्पत्ति वेद से होना सम्भव नहीं है| वेद में जितना ज्ञान कहा है उससे हजारगुना आशयवाला ज्ञान श्री तीर्थंकरादि महात्माओं ने कहा है, ऐसा मैं मानता हूँ | अल्प वस्तु में से सम्पूर्ण वस्तु नहीं हो सकती; ऐसा होने से वेद से सबकी उत्पत्ति कहना योग्य नहीं है| वैष्णवादि सम्प्रदायों की उत्पत्ति उसके आश्रम से मानने में कोई आपत्ति नहीं है| जैन, बौद्ध के अन्तिम महावीरादि महात्मा के होने से पहले वेद का अस्तित्व था, और वे बहुत प्राचीन ग्रन्थ हैं| तथापि जो कुछ प्राचीन हो वही सम्पूर्ण हो या सत्य हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता, और जो बाद में उत्पन्न हुए हों वे अपूर्ण तथा असत्य हों, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता| बाकी वेद और जैनों का जगत् के सन्दर्भ में अभिप्राय है कि वह अनादि काल से चला आ रहा है| सर्व भाव अनादि हैं, मात्र रूपांतर होता है| केवल उत्पत्ति अथवा केवल नाश नहीं होता| वेद, जैन और अन्य सबके अभिप्राय अनादि हैं, ऐसा मानने में आपत्ति नहीं है, तो फिर विवाद कहां रहा|?

प्रश्‍न ९ : १) वेद किसने बनाये? वे अनादि हैं? २) यदि अनादि हों तो अनादि का अर्थ क्या?

उत्तर : १) बहुत काल पहले वेदों का होना सम्भव है| २) पुस्तकरूप से कोई भी शास्त्र अनादि नहीं है; उसमें कहे हुए अर्थ के अनुसार तो सब शास्त्र अनादि हैं; क्योंकि उसउस प्रकार का अभिप्राय भिन्न-भिन्न जीव भिन्नभिन्नरूप से कहते आये हैं; और ऐसी ही स्थिति सम्भव है; क्रोधादि भाव भी अनादि हैं, और क्षमादि भाव भी अनादि हैं; हिंसादि धर्म भी अनादि हैं, और अहिंसादि धर्म भी अनादि हैं| मात्र जीव के लिये हितकारी क्या है? इतना विचार करना कार्यरूप है| अनादि तो दोनों हैं| फिर कभी कम परिणाम में और कभी विशेष परिणाम में किसी का बल होता है|

प्रश्‍न १० : गीता किसने बनायी? ईश्‍वरकृत तो नहीं है? यदि वैसा हो तो उसका कोई प्रमाण है?

उत्तर : उपर्युक्त उत्तरों से कुछ समाधान हो सकने योग्य है कि ईश्‍वर का अर्थ ज्ञानी (सम्पूर्णज्ञानी) ऐसा करने से वह ईश्‍वरकृत हो सकती है, परन्तु नित्य, अक्रिय ऐसे आकाश की तरह व्यापक ईश्‍वर को स्वीकार करने पर वैसी पुस्तक आदि की उत्पत्ति होना सम्भव नहीं है, क्योंकि यह तो साधारण कार्य है कि जिसका कर्तृत्व आरंभपूर्वक होता है, वह अनादि नहीं होता|

गीता वेदव्यासजी की बनायी हुई पुस्तक मानी जाती है और श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वैसा बोध दिया था, इसलिये मुख्यरूप से कर्ता श्रीकृष्ण हैं, यह अनादि काल से चला आ रहा है| निष्क्रिय ईश्‍वर से भी उसकी उत्पत्ति हो, यह भी सम्भव नहीं है| सक्रिय अर्थात् किसी देहधारी से वह क्रिया हो सकती हैै, यह भी सम्भव नहीं| इसलिये सम्पूर्णज्ञानी वही ईश्‍वर है, और उसके द्वारा उपदिष्ट शास्त्र ईश्‍वरीय शास्त्र है, ऐसा मानने में कोई बाधा नहीं है|

प्रश्‍न ११ : पशु आदि के यज्ञ से जरा भी पुण्य है क्या?

उत्तर : पशु के वध से, होम से या जरा भी उसे दु:ख देना पाप ही है| वह फिर यज्ञ में करें या ईश्‍वर के धाम में बैठकर करें; परन्तु यज्ञ में जो दानादि क्रिया होती है, वह कुछ पुण्य हेतु है, तथापि हिंसा मिश्रित होने से वह भी अनुमोदन योग्य नहीं है|

प्रश्‍न १२ : जो धर्म उत्तम है, उसका प्रमाण मॉंगा जा सकता है क्या?

उत्तर : यदि प्रमाण के बिना किसी धर्म को उत्तम माना जाये तो फिर अर्थ, अनर्थ, धर्म, अधर्म सब उत्तम ही ठहरते हैं| प्रमाण से ही धर्म उत्तम या अनुत्तम मालूम होता है| जो धर्म संसारावस्था को परिक्षीण करने में सबसे उत्तम हो और निजस्वभाव में स्थिति कराने में योग्य हो, वही उत्तम और बलवान धर्म है|

प्रश्‍न १३ : क्या आप ईसाई धर्म के विषय में कुछ जानते हैं? यदि जानते हों तो अपने विचार बतलाइयेगा|

उत्तर : ईसाई धर्म के विषय में साधारण रूप से जानता हूँ| भरत खंड में महात्माओं ने जैसा धर्म का शोध किया है, विचारा है, वैसा धर्म किसी दूसरे देश मेंे विचारा नहीं गया है| उसमें (ईसाई धर्म में) जीव की सदा परतन्त्रता कही गयी है, और मोक्ष में भी वह दशा वैसी ही रखी है| जिसमें जीव के अनादि स्वरूप का विवेचन यथायोग्य नहीं है, कर्म सम्बन्धी व्यवस्था और उसकी निवृत्ति भी यथायोग्य नहीं है, उस धर्म के विषय में मेरा ऐसा अभिप्राय होना सम्भव नहीं है कि वह सर्वोत्तम धर्म है| ईसाई धर्म में जो मैंने ऊपर कहा उस प्रकार का यथायोग्य समाधान दिखाई नहीं देता| मतभेदवशात् ऐसा मैंने नहीं कहा है| अधिक पूछने योग्य लगे तो पूछियेगा, तो विशेष समाधान किया जा सकेगा|

प्रश्‍न १४ : वे ऐसा कहते हैं कि बाइबिल ईश्‍वर प्रेरित है, ईसा ईश्‍वर का अवतार है, उसका पुत्र है, और था|

उत्तर : यह बात तो श्रद्धा से मानी जा सकती है, परन्तु प्रमाण से सिद्ध नहीं है| जैसा गीता और वेद के ईश्‍वर प्रेरित होने के बारे में ऊपर लिखा है, वैसा ही बाइबिल के सम्बन्ध में भी माना जा सकता है| जो जन्म-मरण से मुक्त हुआ वह ईश्‍वर अवतार ले, यह संभव नहीं है; क्योंेकि रागद्वेषादि परिणाम ही जन्म के हेतु हैं| वह जिसे नहीं है, ऐसा ईश्‍वर अवतार धारण करे, यह यथार्थ प्रतीत नहीं होता| ईश्‍वर का पुत्र है, और था, इस बात का भी किसी रूपक के तौर पर विचार करें तो कदाचित् मेल बैठता है, नहीं तो प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है| मुक्त ईश्‍वर को पुत्र हो, यह किस तरह कहा जा सकता है? और कहें तो उसकी उत्पत्ति किस तरह कह सकते हैं? दोनों को अनादि मानें तो पिता-पुत्र सम्बन्ध किस तरह मेल खाता है, इत्यादि बातें विचारणीय हैं| इन पर विचार करने से मुझे ऐसा लगता है कि यह बात यथायोग्य नहीं है|

प्रश्‍न १५ : पुराने करार (जश्रव ढशीींराशपीं) में जो भविष्य कहा गया है, वह सब ईसा के विषय में सच सिद्ध हुआ है|

उत्तर : ऐसा यदि हो तो ऐसा भविष्य भी ईसा को ईश्‍वरावतार कहने में बलवान प्रमाण नहीं है; क्योंकि ज्योतिषादिक से भी महात्मा की उत्पत्ति बताया जाना सम्भव है| भले किसी ज्ञान से वैसी बात बतायी हो, परन्तु वैसे भविष्यवेत्ता सम्पूर्ण मोक्षमार्ग के ज्ञाता थे, यह बात जब तक यथास्थित प्रमाणरूप न हो, तब तक वह भविष्य इत्यादि एक श्रद्धाग्राह्य प्रमाण है, क्योंकि वह अन्य प्रमाणों से बाधित हो सकता है|

प्रश्‍न १६ : इसमें ईसामसीह के चमत्कार के विषय में लिखा है|

उत्तर : यदि कोई जीव शरीर में से सर्वथा चला गया हो, और उसी जीव को उसी काया में दाखिल किया हो, अथवा किसी दूसरे जीव को उसमें दाखिल किया हो, तो ऐसा संभव नहीं है; और यदि ऐसा हो तो फिर कर्मादि की व्यवस्था भी निष्फल हो जाती है| बाकी योगादि की सिद्धि से कितने ही चमत्कार उत्पन्न होते हैं, और वैसे कुछ चमत्कार ईसा के हों, तो यह एकदम मिथ्या है या असम्भव है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; वैसी सिद्धियॉं आत्मा के ऐश्‍वर्य के आगे अल्प हैं, आत्मा का ऐश्‍वर्य उससे अनन्तगुना महान है| इस विषय में समागम नें पूछना योग्य है|

प्रश्‍न १७ : भविष्य में कौन सा जन्म होगा, उसका इस भव में पता चलता है? अथवा पहले क्या थे, इसका पता चल सकता है?

उत्तर : यह हो सकता है| जिसका ज्ञान निर्मल हुआ हो उसे वैसा होना सम्भव है| जैसे बादल इत्यादि चिह्नों से बरसात का अनुमान होता है, वैसे इस जीव की इस भव की चेष्टा से उसके पूर्वकारण कैसे होने चाहिये, यह भी समझा जा सकता है| वह चेष्टा भविष्य में कैसे परिणाम को प्राप्त होगी, यह भी उसके स्वरूप से जाना जा सकता है| उसका विशेष विचार करने पर कैसा भव होना सम्भव है, तथा कैसा भव था, यह भी विचार में भलीभांति आ सकता है|

प्रश्‍न १८ : पुनर्जन्म तथा पूर्वजन्म का पता किसे चल सकता है?

उत्तर : इसका उत्तर ऊपर आ चुका है|

प्रश्‍न १९ : जिन मोक्षप्राप्त पुरुषों के नाम आप बताते हैं, वह किस आधार से?

उत्तर : इस प्रश्‍न को यदि मुझे खास तौर से लक्ष्य करके पूछते हैं तो उसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि जिनकी संसारदशा अत्यंत परिक्षीण हुई है, उनके वचन ऐसे होते हैं, ऐसी उनकी चेष्टा होती है, इत्यादि अंश से भी अपने आत्मा में अनुभव होता है, और उसके आश्रय से उनके मोक्ष के विषय में कहा जा सकता है; और प्राय: वह यथार्थ होता है, ऐसा मानने के प्रमाण भी शास्त्रादि से जाने जा सकते हैं|

प्रश्‍न २० : बुद्धदेव भी मोक्ष को प्राप्त नहीं हुए, यह आप किस आधार से कहते हैं?

उत्तर : उनके शास्त्र सिद्धांतों के आधार से| जिस प्रकार से उनके शास्त्रसिद्धांत हैं, उसी के अनुसार यदि उनका अभिप्राय हो तो वह अभिप्राय पूर्वापर विरुद्ध भी दिखायी देता है; और वह सम्पूर्ण ज्ञान का लक्षण नहीं है| यदि संपूर्ण ज्ञान न हो तो सम्पूर्ण राग-द्वेष का नाश होना संभव नहीं है| जहॉं सम्पूर्ण राग-द्वेष वैसा हो वहॉं संसार का होना सम्भव है| इसलिये, उन्हें संपूर्ण मोक्ष प्राप्त हुआ है, ऐसा नहीं कहा जा सकता| उनके कहे हुए शास्त्रों में जो अभिप्राय है उसके सिवाय उनका अभिप्राय दूसरा था, उसे दूसरी तरह जानना आपके लिये और हमारे लिये कठिन है; और वैसा होने पर भी यदि कहें कि बुद्धदेव का अभिप्राय दूसरा था तो उसे कारणपूर्वक कहने से प्रमाणभूत न हो, ऐसा कुछ नहीं है|

प्रश्‍न २१ : दुनियॉं की अन्तिम स्थिति क्या होगी?

उत्तर : सब जीवों की स्थिति सर्वथा मोक्षरूप से हो जाये अथवा इस दुनियॉं का सर्वथा नाश हो जाये, वैसा होना प्रमाणभूत नहीं लगता| ऐसे के ऐसे प्रवाह में उसकी स्थिति सम्भव है| कोई भाव रूपांतर पाकर क्षीण हो, तो कोई वर्धमान हो, परन्तु वह एक क्षेत्र में बढ़े तो दूसरे क्षेत्र में घटे, इत्यादि इस सृष्टि की स्थिति है| इससे और बहुत ही गहरे विचार में जाने से ऐसा सम्भव नहीं लगता कि इस सृष्टि का सर्वथा नाश हो जाए| सृष्टि अर्थात् एक यही पृथ्वी ऐसा अर्थ नहीं है|

प्रश्‍न २२ : इस अनीति में से सुनीति होगी क्या?

उत्तर : इस प्रश्‍न का उत्तर सुनकर जो जीव अनीति की इच्छा करता है, उसे यह उत्तर उपयोगी हो, ऐसा होने देना योग्य नहीं है| सर्व भाव अनादि हैं, नीति, अनीति; तथापि आप हम अनीति छोड़कर नीति स्वीकार करें, तो इसे स्वीकार किया जा सकता है और यही आत्मा के कर्तव्य हैं| सर्व जीव आश्रयी अनीति मिटकर नीति स्थापित हो, ऐसा वचन नहीं कहा जा सकता; क्योंकि एकान्त से वैसी स्थिति होना योग्य नहीं है|

प्रश्‍न २३ : दुनियॉं का प्रलय है?

उत्तर : प्रलय अर्थात् सर्वथा नाश, यह सम्भव नहीं है, क्योंकि पदार्थ का सर्वथा नाश नहीं होता| प्रलय अर्थात् सर्व पदार्थों का ईश्‍वरादि में लीन होना| परन्तु मुझे यह सम्भवित नहीं लगता| क्योंकि सर्व पदार्थ, सर्व जीव, ऐसे समपरिणाम को किस तरह प्राप्त हों कि ऐसा योग हो, और यदि वैसे समपरिणाम का प्रसंग आये तो फिर पुन: विषमता होना सम्भव नहीं है| यदि अव्यक्तरूप से जीव में विषमता हो और व्यक्तरूप से समता हो इस तरह प्रलय को स्वीकार करें तो भी देहादि सम्बन्ध के बिना विषमता किस आश्रय से रहे? देहादि सम्बन्ध मानें तो सबकी एकेन्द्रियता मानने का प्रसंग आये, और वैसा मानने से तो बिना कारण दूसरी गतियों का अस्वीकार समझा जाये| अत: सर्व जीव आश्रयी प्रलय सम्भव नहीं है|

प्रश्‍न २४ : अनपढ़ को भक्ति से ही मोक्ष मिल सकता है क्या?

उत्तर : भक्ति, ज्ञान का हेतु है| ज्ञान, मोक्ष का हेतु है| जिसे अक्षरज्ञान न हो जो अनपढ़ हो, तो उसे भक्ति प्राप्त होना असम्भव है, ऐसा नहीं है| जीव मात्र ज्ञानस्वभावी है| भक्ति के बल से ज्ञान निर्मल होता है जो मोक्ष का हेतु होता है| सम्पूर्ण ज्ञान की अभिव्यक्ति हुए बिना सर्वथा मोक्ष नहींं हो सकता; और जहॉं सम्पूर्ण ज्ञान हो वहॉं सर्व भाषाज्ञान समा जाता है जो मोक्ष का हेतु है तथा वह जिसे न हो उसे आत्मज्ञान नहीं होता, ऐसा कोई नियम नहीं है|

प्रश्‍न २५ : १) कृष्णावतार और रामावतार होने की बात क्या सच्ची है? यदि ऐसा हो तो वे क्या थे? वे साक्षात् ईश्‍वर थे या उसके अंश थे? २) उन्हें मानने से मोक्ष मिलता है क्या?

उत्तर : १) दोनों महात्मा पुरुष थे तथा आत्मा होने से वे ईश्‍वर थे| उनके सब आवरण दूर हो गये हों तो उनका सर्वथा मोक्ष भी मानने में विवाद नहीं है| कोई जीव ईश्‍वर का अंश है, ऐसा मुझे नहीं लगता| जीव को ईश्‍वर का अंश मानने से बंध-मोक्ष सब व्यर्थ हो जाते हैं, क्योंकि

ईश्‍वर ही अज्ञानादि का कर्ता हुआ; और अज्ञान आदि का जो कर्ता हो उसे फिर सहज ही अनैश्‍वर्यता प्राप्त होती है| जीव को ईश्‍वर का अंश

मानने के बाद पुरुषार्थ की अवधारणा व्यर्थ हो जायेगी| अत: जीव को ईश्‍वर के अंशरूप से स्वीकार करने की भी मेरी बुद्धि नहीं होती|

तो फिर श्रीकृष्ण या राम जैसे महात्माओं को वैसे योग में मानने की

बुद्धि कैसे हो? वे दोनों अव्यक्त ईश्‍वर थे, ऐसा मानने में बाधा

नहीं है| तथापि उनमें सम्पूर्ण ऐश्‍वर्य प्रगट हुआ था या नहीं यह बात विचारणीय है|

२) उन्हें मानने से मोक्ष मिलता है क्या? इसका उत्तर सहज है|

जीव के सर्व रागद्वेष और अज्ञान का अभाव अर्थात् उनसे छूटना

ही मोक्ष है| वह जिनके उपदेश से हो सके उन्हें मानकर और उनका

परमार्थ स्वरूप विचारकर, स्वात्मा में भी वैसी ही निष्ठा होकर उसी

महात्मा के आत्मा के आकार से (स्वरूप से) प्रतिष्ठान हो, तब मोक्ष होना सम्भव है| उपासना सर्वथा मोक्ष का हेतु नहीं बल्कि उसके साधन का हेतु है|

प्रश्‍न २६ : ब्रह्मा, विष्णु और महेश्‍वर कौन थे?

उत्तर : सृष्टि के हेतुरूप तीन गुणों (सत्व, रज, तम) को मानकर, उनके आश्रय से उन्हें यह रूप दिया हो तो यह बात मेल खा सकती है, परन्तु पुराणों में जिस प्रकार का उनका स्वरूप कहा है, उसे मानने में मेरा

विशेष झुकाव नहीं है| क्योंकि उनमें बहुत से रूपक उपदेश के लिये

कहे गये हैं| तथापि हमें भी उनका उपदेश के रूप में लाभ लेना

चाहिये और ब्रह्मादि के स्वरूप का सिद्धांत करने की जंजाल में

नहीं पड़ना चाहिये|

प्रश्‍न २७ : जब मुझे सर्प काटने आये तब मुझे उसे काटने देना चाहिए

या मार डालना चाहिए?

उत्तर : आप सर्प को काटने दें, ऐसा कहना उचित नहीं है| तथापि आपने यदि ऐसा जाना हो कि देह अनित्य है, तो फिर इस असारभूत देह के रक्षण के लिये, जिसे देह में प्रीति है, ऐसे सर्प को मारना आपके लिये कैसे योग्य हो सकता है? जिसे आत्महित की इच्छा हो, उसे तो वहॉं अपनी देह छोड़ देना ही योग्य है| कदाचित् आत्महित की जिसे इच्छा न हो, वह क्या करे? तो इसका उत्तर यही दिया जायेगा कि वह नरकादि में परिभ्रमण करे; अर्थात् सर्प को मारे ऐसा उपदेश कैसे कर सकते हैं? अनर्थवृत्ति हो तो मारने का उपदेश किया जा सकता है| वह तो हमें तुम्हें स्वप्न में भी न हो, यही इच्छा करने योग्य है|

सन्दर्भ -

१. आत्मकथा, महात्मा गॉंधी पृ. ७५; २. गॉंधीजी का पत्र पोलक को, प्रिटोरिया जेल, २६ नवम्बर १९०९; ३. आत्मकथा, पृ. ११९; ४. Shrimad Rajchandras reply to Gandhijis Questions (गुजराती से हिन्दी और अंग्रेजी अनुवाद, प्रकाशक - मनुभाई मोदी, श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम, अगास, प्रथम संस्करण - २००१; ब) सतीश शर्मा, गॉंधीज टीचर्स : राजचन्द्र रावजी भाई मेहता, गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद.

Back to Articles


Address
Gandhi Teerth, Jain Hills, PO Box 118,
Jalgaon - 425 001 (Maharashtra), India
 
Contact Info
+91 257 2260033, 2264801;
+91 257 2261133
© Gandhi Research Foundation Site enabled by : Jain Irrigation Systems Ltd