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Articles - महात्मा गॉंधी और पर्यावरण - ५ जून २०१४ विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष...

‘पर्यावरण’ शब्द की निष्पत्ति परि+आवरण इन दो शब्दों के योग से होती है, जिसका अभिप्राय एक ऐसी परिवृत्ति से है जो मानव को चारों ओर से उसे आवृत्त करती हुयी उसके जीवन और क्रियाओं को सम्पूर्णता में प्रभावित करती है| इसमें जलमण्डल, स्थलमण्डल एवं वायुमण्डल के समस्त भौतिक एवं रासायनिक तत्त्व समाहित हैं, क्योंकि पर्यावरण भौतिक और जैविक दोनों तत्त्वों से मिलकर बना है| अत: पर्यावरण एक अविभाज्य समष्टि है जिसका निर्माण भौतिक एवं जैविक घटकों के पारस्परिक क्रियाशील तन्त्रों से होता है| सम्पूर्ण पृथ्वी पर मानव के साथ-साथ अनेक जीवजन्तु एवं वनस्पतियों का वास है| जैविक विविधता के इन घटकों में पारस्परिक क्रियाशीलता न हो तो दोनों पक्ष अजैविक और जैविक एक-दूसरे के लिए अर्थशून्य हो जायेंगे| प्रकृति ने इस प्रकार जीवन के मूलभूत तत्त्वों की संरचना की है कि यदि सभी जैविक तत्त्व अपनी आवश्यकतानुसार अजैविक (भौतिक) तत्त्वों का उपभोग करते रहें तो पर्यावरणीय व्यवस्था में संतुलन बना रहता है| किन्तु जब किन्हीं कारणों से इनमें असंतुलन होता है तो वही पर्यावरण प्रदूषण को जन्म देता है| यह प्रदूषण मनुष्य के क्रिया-कलापों से उत्पन्न अवशिष्ट उत्पादों के रूप में पदार्थों तथा ऊर्जा के विमोचन से उद्भूत हानिकारक तत्त्वों के कारण होता है|

पर्यावरण की वर्तमान स्थिति एवं प्रभाव

प्राचीन वैदिक काल तक पर्यावरण प्रदूषित नहीं था क्योंकि ॠषि-मुनि, संत महात्मा तथा लोग अधिकांशत: सात्विक प्रकृति के थे, उनकी आवश्यकतायें सीमित थीं, उन्हें अभीष्ट वस्तुयें प्रकृति से ही प्राप्त हो जातीं थीं| इसलिये उन्होंने प्रकृति के साथ कभी छेड़छाड़ नहीं की और प्रकृति तथा उसके घटकों का संतुलन हमेशा बने रहने कर कारण कोई प्रदूषण नहीं था| किन्तु आज हमारा सम्पूर्ण पर्यावरण प्रदूषित हो गया है| इस संकट के कारण जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर एवं पेड़-पौधे सभी आज अपने अस्तित्व के खतरे से डरे व सहमे हुए हैं| आखिर ऐसा क्यों है? इंसान क्यों वातावरण की महामारी का दंश झेल रहा है? उत्तर हैयह सभी पर्यावरण के विनाश के कारण हो रहा है, जिसका जनक मनुष्य स्वयं है|

आधुनिक मानव समाज, विज्ञान और तकनीकी से सुसज्जित है और इसी वैज्ञानिक और तकनीकी विकास के दुष्परिणामों से हमारा पर्यावरण असंतुलित हो रहा है| आज विज्ञान वरदान के बजाय अभिशाप बन गया है| जबतक विज्ञान को नीति और मनुष्यहृदय की उदात्त भावनाओं से नहीं जोड़ा जायेगा, तबतक वह मानव जाति के लिये अभिशाप और विनाशकारी ही सिद्ध होगा| आज हमारी व्यावसायिक बुद्धि ने प्रकृति और मानव के सम्बन्धों को तार-तार कर दिया है| नदी का जल, बहती प्राणवायु, अन्न उत्पादक भूमि सभी प्रदूषित हो चुके हैं| कहीं भी कुछ पल ठहरने के लिए स्थान नहीं है|

पर्यावरण प्रदूषित क्यों?

प्रश्न उठता है कि पर्यावरण प्रदूषित होता कैसे है? इसका स्पष्ट उत्तर है हमारे दोषपूर्ण रहन-सहन से| एक अनुमान के आधार पर इस सम-विषम समन्वित भूग्रह में सम्भवत: डेढ़ करोड़ वर्ष पूर्व मानवीय सृष्टि का सूत्रपात हुआ| मानव की जीवन यात्रा जिस समय प्रारम्भ हुई होगी, निश्चित ही उस समय प्रकृति से उसका सीधा और परस्परापेक्षी सम्बन्ध रहा होगा| पर्यावरण का वह तत्कालीन स्वरूप नितान्त आकर्षक तथा आह्लादकारी रहा होगा| क्योंकि उस समय प्रकृति को हमनें अपनी शाश्वत संस्कृति में स्थान दिया था| भारतीय संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ पर आधारित संस्कृति रही है| हमारे मंत्रद्रष्टा ॠषियों ने जीवनदायिनी ऊषा, पृथ्वी, जल, वायु, सूर्य, वन प्रभृति विविध प्राकृतिक शक्तियों को देव मानकर अन्तर्भावना से अभ्यर्थना की जिसका निहितार्थ है कि ये सभी तत्त्व अपने दिव्यगुणों के प्रकाशन से पर्यावरण को शुद्ध एवं जीवनानुकूल बनाते हैंै| परन्तु जैसे-जैसे मानव का विकास हुआ, उसकी आवश्यकताएँ बढ़ीं और उसने प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ शुरू कर दी, परिणामत: पर्यावरण की समस्याएं उत्पन्न होने लगीं| वायुमण्डल में विभिन्न प्रकार की गैसें एक निश्चित अनुपात में रहती हैं लेकिन मानव प्रणीत औद्योगीकरण एवं अन्य साधनों से उत्पन्न दूषण उनमें असंतुलन पैदा कर उन्हें प्रदूषित कर देते हैं| उद्योगोंे से निकलने वाली कार्बनडाईआक्साइड, मीथेन तथा नाइट्रस आक्साइड का बढ़ता स्तर वायुमंडल में असंतुलन की स्थिति पैदा कर दिया है| इस प्रदूषण की समस्या इस हद तक विकृत हो गयी है कि कई स्थानों पर तेजाबी वर्षा हो रही है| जिसका दुष्प्रभाव जीव-जन्तुओं, भूमि, वनस्पतियों पर स्पष्ट देखा जा सकता है| कल-कारखानों से निकले अपद्रव्य धुआँ, गैस, कूड़ा-कचरा, वाहन विस्तार, वनविनाश, जनसंख्याविस्फोट आदि प्रदूषण के महत्त्वपूर्ण कारक हैं| इनसे पर्यावरण की कलुषता इस सीमा तक बढ़ गई है कि सम्प्रति स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, खाद्यअन्न एवं निवास योग्य भूमि भी अत्यन्त दुर्लभ होती जा रही है| ग्रीन हाउस प्रभाव भी कार्बनडाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा का परिणाम है जो भूगर्भ से उत्सर्जित होने वाली तापीय ऊर्जा को वायुमण्डल से बाहर जाने से रोकती है जिससे पृथ्वी पर सहन करने वाली गरमाहट बनी रहती है| वायु प्रदूषण से ही ओजोन परत का क्षरण हो रहा है| ओजोन परत वायुमण्डल और पृथ्वी के बीच एक ऐसी झिल्ली है जो पृथ्वी की रक्षा करती है| इसको हानि पहुंचाना उसी प्रकार संकटकारी है, जिस प्रकार गर्भस्थ शिशु की झिल्ली से छेड़छाड़ करना| यह ओजोन परत सूर्य से निकलने वाली पराबैगनी किरणों का ९९ प्रतिशत अवशोषण कर लेती है तथा पेड़-पौधे तथा जीव-जन्तुओं को भस्म होने से बचाती है| किन्तु आज इस ओजोन की परत का लगातार क्षरण हो रहा है जो बहुत बड़े संकट का सूचक है| प्रदूषित पर्यावरण के कारण ही सारा विश्व ग्लोबल वार्मिंग के दौर से गुजर रहा है| पूरे ब्रह्माण्ड का तापमान सन् १९०० से ही १ डिग्री फारनेहाइट बढ़ गया है| इस असंतुलन ने एक महाविनाश की विभीषिका हम सबके समक्ष प्रस्तुत कर दी है| इसका ताजा उदाहरण उत्तरांचल के केदारनाथ परिक्षेत्र में हुई भीषण तबाही तथा आये दिन आ रही सुनामी है|

हमारे पर्यावरण के मूलभूत तत्त्व

साधारणतया यह माना जाता है कि- जल, वायु, पृथ्वी और वनस्पतियां पर्यावरण के प्रमुख घटक हैं क्योंकि इनके बिना जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है और इनका प्रदूषण ही पर्यावरण प्रदूषण है| जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है| वेदों में कहा गया है कि ‘‘अप्स्वन्तरमृतम अप्सुभेषजम्’’१ अर्थात् शुद्ध जल में अमृत तत्त्व होता है और उसमें औषधि का निवास होता है| वायु को भेषज२ तथा जीवन का आधार कहा गया है| आक्सीजन के बिना एक क्षण के लिये भी जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती| किन्तु हमारी वर्तमान जीवन पद्धति ने वायु को प्रदूषित कर दिया है| वनस्पतियॉं भारत वर्ष की अमूल्य निधि हैं| वेदों में इन्हें प्राण कहा गया है|३ मत्स्यपुराण में वृक्ष की उपमा देते हुये कहा गया है कि- ‘दस पुत्र समो द्रुम:’ अर्थात् जनहित की दृष्टि से एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर है| फिर भी वृक्षों को हम काटते जा रहे हैं| वनस्पतियों के क्षरण का दुष्परिणााम ही है कि आज भूमिक्षरण तथा भूस्खलन तथा भूकम्प जैसी प्राकृतिक विपदायें आ रही हैं| निरीक्षण बताते हैं कि स्वतंत्रता के बाद देश में लगभग ४० लाख हेक्टेयर भूमि से वनों का क्षरण हो गया है| हमारे वन क्षेत्र लगभग ३.८% रह गये हैं| फलत: हमारी सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियॉं प्रभावित हुई हैं|

वेदों में वायुमण्डल की शुद्धि के लिए द्यावा पृथ्वी के संरक्षण पर बहुत जोर दिया गया है| वेदों के अनेक मंत्रों मे द्युलोक को पिता और पृथ्वी को माता कहा गया है| अथर्ववेद में भूमि को माता तथा स्वयं को इसका पुत्र बतलाया गया है- ‘‘माता भ्ूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:|४’’ उसे अन्न, वनस्पति एवं औषधि की उत्पादक कहा गया है| विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के अनुसार कीटनाशक एवं जहरीली दवाओं के प्रयोग के कारण पृथ्वी के प्रदूषण से कम से कम पांच लाख किस्म के प्राणी हर वर्ष मिट जाते हैं| वैदिक ॠषि ध्वनिप्रदूषण के विषय में भी सजग थे- ‘भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देवा:|’ ध्वनि भी मानव जीवन का एक सामान्य लक्षण है जो प्रदूषित होने पर मानवस्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है| इस प्रकार द्युलोक से लेकर पृथ्वी, जल, अन्तरिक्ष आदि सभी के प्रदूषित हो जाने के कारण चार प्रकार के प्रदूषण हमारे समक्ष हैं जिनका निवारण अत्यन्त आवश्यक है, वे हैं वायु-प्रदूषण, जल-प्रदूषण, भूमि-प्रदूषण एवं ध्वनि-प्रदूषण|

महात्मा गॉंधी द्वारा पर्यावरण संरक्षण हेतु बताये गये उपाय

गॉंधीजी के समय में पर्यावरण और पारिस्थितिकी की समस्या उतनी गम्भीर और प्रमुख नहीं थी| इसलिये गॉंधीजी ने ऐसा कोई ठोस पर्यावरणीय सिद्धान्त या दर्शन नहीं दिया जो आज के पर्यावरण या पारिस्थितिकी को लक्ष्य कर किया गया हो किन्तु वह मानव और प्रकृति के साथ उसके सहसम्बन्धों से भलीभांति परिचित थे| आधुनिक विद्वानों ने उन्हें पर्यावरण का दूत५ कहा है| गॉंधीजी उस समय विकसित हो रही औद्योगिक सभ्यता को लेकर बहुत चिन्तित थे| उनका उद्देश्य तो भारत को उपभोक्तावाद की भयानक दौड़ के प्रति सावधान करना था| एतद् सम्बन्धी प्रश्नों को उन्होंनेे अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ जो १९०९ में प्रकाशित हुई थी, प्रमुखता से उठाया है| इस पुस्तक की पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता द्वारा घोर निन्दा की गयी थी जो स्वयं पर्यावरण प्रदूषण के लिये विशेष रूप से जिम्मेदार है| उन्होंने पर्यावरण संरक्षण हेतु अहिंसावादी नीतिशास्त्र का संदेश दिया| उनका कहना था कि हमारे जीवन का पर्यावरण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है| भारतीय संस्कृति तो प्रकृति की जीवन्तता की पक्षधर रही है| भारतीय धर्मशास्त्रों में मनुष्य के उन कर्तव्यों को करणीय बताया गया है जो जीवित पदार्थों, पशु-पक्षी, जल-थल, ग्रह-नक्षत्र सबके प्रति हैंै| मनुष्य का यह परम कर्तव्य है कि वह प्रकृति की आज्ञा के बिना उससे कुुछ न ले| अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में गॉंधीजी ने कहा है कि ‘मन की वृत्तियां चंचल हैं| उसका मन बेकार की दौड़धूप किया करता है| उसका शरीर जैसेजैसे ज्यादा देते जांय, वैसेवैसे ज्यादा मांगता जाता है| ज्यादा लेकर भी सुखी नहीं होता| भोग भोगने से भोग की इच्छा बढ़ती है| इसीलिये हमारे पुरुखों ने भोग की हद बांध दी| बहुत सोच कर उन्होंने देखा कि सुखदु:ख तो मन के कारण हैं|’६ हमारे पूर्वजों ने अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखा था, इस लिये वे खुश थे| कोई मनुष्य मात्र इसलिये सुखी नहीं होता कि वह धनी है या एक व्यक्ति केवल इस लिये दु:खी नहीं होता कि वह गरीब है|

गॉंधीजी के अनुसार वास्तव में मानवीय मूल्य सभी जीवित प्राणी में अन्तर्निहित हैं जिनका आधार पर्यावरण है| यह आधार कुछ और नहीं अपितु आध्यात्मिक है| इसलिए प्रकृति को हमें आत्मा या ‘वासुदेव: सर्वमिति’ के रूप में देखना होगा| जिस प्रकार हम सॉंस लेने में किसी नैतिक दबाव का अनुभव नहीं करते, उसी प्रकार यदि हम अपनी आत्मा का समस्त प्राणिजगत् में विस्तार कर लें तो हम बिना किसी दबाव के स्वयं ही प्रकृति की सुरक्षा कर सकेंगे| गॉंधीजी हमेशा कहते थे कि अपनी आवश्यकताओं को कम करो| हमारे भोग के लिये प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है७, आवश्यकता है विवेक पूर्वक उसे भोगने की| मैं सृष्टि का उपभोक्ता हूं और सृष्टि मेरी उपभोग्य हैे, यह धारणा गलत है| मनुष्य को अपनी आवश्यकतायें अनावश्यक रूप से बढ़ाते जाने के बजाय संयम से काम लेना चाहिये| गॉंधीजी ने ट्रस्टीशिप की जो बात की उसका यही मतलब था कि प्रकृति या ईश्वर से हमें जो भी मिला है शारीरिक शक्ति, बुद्धि या क्षमता उसके हम मालिक नहीं, ट्रस्टी हैं| उन शक्तियों का उपयोग हम अपने लिये उतना ही करें जितना जीवन धारण के लिये आवश्यक हो| अपरिग्रह या असंग्रह का उनका सिद्धान्त भी हमें आवश्यकता से अधिक वस्तुओं के न रखने की शिक्षा देता है| संयम और अपरिग्रह सनातन मूल्य हैं| आज मनुष्य संयम को नहीं भोग को अपना आदर्श मान रहा है| आज का मनुष्य अत्यधिक भोग के कारण मानसिक असंतुलन, अपराध, शोषण वृत्ति और हिंसा जैसी बुराइयों का शिकार हो रहा है| संसार के सभी धर्मों ने अपरिग्रह अथवा संचय की वृत्ति न रखने को प्रधानता दी है| गॉंधीजी की प्रसिद्ध उक्ति है कि ‘प्रकृति में सबके भरणपोषण की पर्याप्त गुंजाइश है पर किसी एक भी व्यक्ति के लोभ या लालच की पूर्ति के लिये पृथ्वी के पूरे संसाधन भी पर्याप्त नहीें हैं|’८

वे हमेशा ईशावास्योपनिषद् के ‘ईशावास्यमिदं सर्व यात्किंचित्जगत्यां जगत्’, इस मन्त्र को भारतीय संस्कृति का आधार मानते थे| गॉंधीजी के अनुसार मनुष्य सृष्टि से स्वतन्त्र कोई घटक नहीं है| वह सृष्टि का अंग है| दोनों परस्पर अवलम्बित हैं| मनुष्य और मनुष्य के बीच तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच संघर्ष सृष्टि के नियमों के विरुद्ध है| परस्पर सहयोग से ही जीवन चल सकता है| सूक्ष्मता से देखें तो गॉंधीजी के जीवन सूत्र वस्तुत: पर्यावरण संरक्षण के सूत्र हेैं १. संघर्ष और होड़ नहीं सहयोग; २. भोग नहीं संयम; ३. उत्पादक शरीर श्रम जीवन का आधार; ४. स्वावलम्बन ५. केन्द्रीकरण नहीं विकेन्द्रीकरण तथा ६. कर्तव्य भावना| गॉंधीजी के अनुसार पर्यावरण संकट को दूर करने के लिये हमें एक नये जीवन दर्शन का निर्माण करना होगा| भोग विलास और वैभव के वीभत्स प्रदर्शन के बदले संयमित एवं नियंत्रित जीवन शैली का वरण करना होगा| अत: गॉंधीजी के आदर्शों को अपने जीवन में उतार कर हम इस पृथ्वी को पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त कर सकते हैं|

सन्दर्भ:

1) ॠग्वेद, १.२३.२१ २) वही १०.१३७.३, ३) ऐतिह्य ब्राह्मण, २.४, ४) अथर्ववेद १२.१.१२, ५) Mahatma Gandhi: An Apostle of Applied Human Ecology, T. N. Khoshoo, New Delhi, TERI, p.9, ६) मेरे सपनों का भारत, पृ. ५९, ७) सर्वोदय पृ.१६, ८) शाश्वत शान्ति की खोज, बुनियादी शिक्षण, डॉ. अरुण दवे, गुजरात विद्यापीठ, पृ.१५|

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