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Articles - भगत सिंह को बचाने के लिये गॉंधी ने क्या किया?

सभी पीढ़ियों के सभी महान व्यक्ति मानव के विकास के लिये हमेशा चिन्तित रहे हैं| किन्तु मानव का विकास कैसे किया जाय यह एक दुर्जेय प्रश्न उनके सामने रहा है| लक्ष्य के एक रहते हुए भी उसे प्राप्त करने के साधन अलग-अलग हो सकते हैं, और ये अन्तर कई बार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एक दूसरे के विरोधी जैसे प्रतीत होते हैं| देश के दो महापुरुष महात्मा गॉंधी और भगत सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ| दोनों का लक्ष्य अंग्रेजों की दासता से भारत को आजादी दिलाना था किन्तु दोनों के साधन में अन्तर था| एक का साधन अहिंसा के मार्ग का था तो दूसरे को आजादी के लिये क्रान्ति से गुरेज़ नहीं था| परिणाम यह हुआ कि भगत सिंह को महात्मा गॉंधी के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में चित्रित किया गया| २३ मार्च १९३१ को सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी| किन्तु उसके बाद अनेक लोगों ने माना कि यदि गॉंधीजी चाहे होते तो भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी रुक सकती थी| क्या गॉंधीजी ने इस सन्दर्भ में कोई प्रयास नहीं किया? इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढता प्रस्तुत है ‘भगत सिंह रीविजिटेड: हिस्टोरियोग्राफी. आइडियालजी एण्ड बायोग्राफी ऍाफ दी ग्रेट मार्टर भगत सिंह’ के लेखक डॉ. चन्दर पाल सिंह* के लेख का उनकी अनुमति से किया गया संक्षिप्त हिन्दी अनुवाद- सम्पादक

२३ मार्च १९३१ को लाखों भारतीयों की आशाओं पर तुषारापात हो गया जब तीन क्रान्तिकारियों- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी हो गयी| भारतीयों को यह पूरा विश्वास था कि महात्मा गॉंधी उन्हें फांसी पर चढ़ने से बचा लेंगे| किन्तु ऐसा नहीं हो पाया और गॉंधीजी के आलोचकोंें को उनके ऊपर आक्रमण का मौका मिल गया| तीनों देशभक्तों की फांसी के बाद गॉंधीजी को भारी विरोध का सामना करना पड़ा| १९३१ में हुए कांग्रेस के करांची सेशन में ‘गॉंधी वापस जाओ’, गॉंधी मुर्दाबाद, गॉंधी की संधि-नीति ने ही भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाया, ‘भगत सिंह अमर रहे’१ आदि नारे लगाये गये तथा उन्हें काले झंडे दिखाए गये| ऐसा माना गया कि गॉंधीजी ने भगत सिंह की फांसी रोकवाने के लिये आधे मन से प्रयास किया तथा इस सन्दर्भ में उन्होंने जो कुछ कहा और जो कुछ किया, उसमें अन्तर था और ऐसा कर उन्होंने भारत की जनता को गुमराह किया|

भगत सिंह के करीबी क्रान्तिकारी साथी और गॉंधी के कटु आलोचक२ यशपाल लिखते हैं कि ‘गॉंधी ने निषेध के लिये जनता पर सरकार के दबाव को नैतिक माना किन्तु भगत सिंह को फांसी से बचाने के लिये ब्रिटिश सरकार पर दबाव को अनैतिक माना३| भगत सिंह की फांसी के मुद्दे पर कम्युनिस्ट लेखक क्रान्तिकारी मन्मथनाथ गुप्ता ने भी भगत सिंह की फांसी को लेकर गॉंधी पर आक्रमण किया| भगत सिंह का जीवन चरित लिखने वाले जी. एस. गोयल (१९६९) भी भगत सिंह की फांसी के लिये गॉंधी को जिम्मेदार मानते हैं| ए. जी. नूरानी लिखते हैं कि गॉंधी, भगत सिंह का जीवन बचा सकते थे किन्तु उन्होंने अन्त तक ऐसा कुछ नहीं किया|

गॉंधी के आलोचकों ने यह समझने में भूल की कि यदि गॉंधी, भगत सिंह आदि देशभक्तों को बचाये होते तो उन्हें राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा लाभ प्राप्त हुआ होता| वे यह जानते थे कि यदि वह भगत सिंह की फांसी रुकवाने में असफल हुए तो देश की जनता विशेषकर युवा और खुद कांग्रेसी इससे नाराज हो सकते हैं| वह यह भी जानते थे कि क्रान्तिकारियों को यदि फांसी हो गयी तो निश्चित रूप से क्रान्तिकारियों की प्रसिद्धि बढ़ेगी, उनके क्रान्तिकारी हिंसा के आदर्श को सराहना मिलेगी और अहिंसा पर आधारित उनके ‘स्वराज’ आन्दोलन को धक्का लगेगा| यदि गॉंधीजी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी से बचा लिया होता तो यह हिंसा पर अहिंसा की विजय और क्रान्तिकारियों पर उनकी नैतिक विजय मानी जाती|

भगत सिंह के मामले में गॉंधी के पक्ष को देश की आजादी के लिये हिंसक साधनों के प्रयोग जिसके वे कतई खिलाफ थे, के सन्दर्भ में भी देखना चाहिये| गॉंधीजी का हिंसा की निरर्थकता और अहिंसा की सार्थकता में दृढ़ विश्वास था| वे हमेशा मानते थे कि साध्य (स्वराज्य) से साधन अधिक महत्त्वपूर्ण है| सन् १९०८ से ही उन्होंने क्रान्तिकारी गतिविधियों के विषय में अपनी एक स्थिर सोच बना ली थी| राजनैतिक हिंसा के पीछे देशभक्ति के आवेग होते हैं, इसमें उन्हें कोई सन्देह नहीं था किन्तु इस तरह की देशभक्ति को वे गुमराह होना मानते थे| सन् १९०९ में गॉंधीजी ने लिखा, ‘आजादी के सन्दर्भ में जो किसी की हत्या करता है वह निश्चय ही राष्ट्र के लिये करता है किन्तु जब भी इस तरह की हत्यायें हुई हैं, उनसे देश का फायदा कम, नुकसान अधिक हुआ है|४ उन्होंने सान्डर्स की हत्या को कायरता पूर्ण माना किन्तु हत्या के लिये उकसाने के लिये सरकार को जिम्मेदार माना| उनके अनुसार यह सरकार की कार्य-प्रणाली का दोष था| इसके लिये लोगों को नहीं बल्कि प्रणाली को ठीक करने की जरूरत है| उनका मानना था कि किसी भी देश की स्वतन्त्रता के लिये एकान्तिक दृष्टिकोण जरूरी नहीं है भले ही वह वीरतापूर्ण क्यों न हो|५ गॉंधी सभी प्रकार की हिंसा के विरुद्ध थे, भले ही वह हिंसा कानून द्वारा उचित क्यों न ठहराई गयी हो जैसे- फांसी अथवा मौत की सजा| ७ मार्च १९३१ को दिल्ली की एक सार्वजनिक सभा में उन्होंने कहा था कि मैं किसी की भी फांसी के लिये कतई सहमत नहीं हूं, चाहे वह भगत सिंह जैसा बहादुर व्यक्ति हो या उनसे बहुत छोटा क्यों न हो|६ गॉंधीजी ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ाये जाने के तीन दिन बाद कांग्रेस के करांची सेशन में अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा था कि ‘आप जानते हैं कि किसी हत्यारे, चोर या डाकू की हिंसा हमारे धर्म के विरुद्ध है| इसलिये आपके मन में ऐसा कोई संदेह नहीं होना चाहिये कि मैंने भगत सिंह को बचाने का कोई प्रयत्न नहीं किया| लेकिन मैं चाहता हूं कि भगत सिंह ने जो गलतियां की, आप भी उन्हें जानें| अपने लक्ष्य को पाने के लिये जो साधन उन्होंने अपनाया, वह गलत और व्यर्थ था| मैं अपने नौजवान बच्चों से एक पिता के रूप में कहना चाहूंगा कि हिंसा आपको तबाही की ओर ले जायेगी|७

एक भ्रामक प्रचार यह भी किया गया है कि गॉंधी, भगत सिंह को फांसी से बचाने में केवल कुछ हफ्ते पहले ही दिलचस्पी लिये| ४ मई १९३०, गिरफ्तार किये जाने के एक दिन पहले, गॉंधीजी ने वाइसराय को लिखे एक पत्र में लाहोर कान्स्पिरेसी केस में एक विशेष अदालत गठित करने के सरकार के फैसले के लिये उनकी कड़ी आलोचना की थी| उन्होंने लिखा कि ‘न्यायालय की सामान्य प्रक्रिया को भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों के केस में अपनाकर आपने विलम्बित कानून का छोटा रास्ता अपनाया है| मैं इसे यदि छद्म फौजी कानून कहूं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये|८ ३१ जनवरी १९३१ को उन्होंने फांसी के सन्दभर्र् में इलाहाबाद में कहा था ‘जिसे सजाये मौत हुई हो उसे फांसी नहीं देना चाहिये| मेरा व्यक्तिगत धर्म यह कहता है| २३ मार्च १९३१ को घटित तनावपूर्ण घटनाओं को देखें तो इसके पहले ११ फरवरी १९३१ को प्रीवी कौंसिल में विशेष अपील की याचिका की बर्खास्तगी के बाद यह लगभग स्पष्ट हो गया था कि तीनों क्रान्तिकारियों का जीवन बिना वाइसराय के हस्तक्षेप के नहीं बचाया जा सकता| गॉंधी के ऊपर इस बात का बड़ा दबाव था कि वे भगत सिंह की फांसी रोकने के लिये लार्ड इरविन को उनकी मीटिंग के दौरान राजी करें| गॉंधी-इरविन वार्ता १७ फरवरी १९३१ को प्रारम्भ हुई और ५ मार्च तक गॉंधी- इरविन पैक्ट के आने तक चली| गॉंधी ने भगत सिंह के सवाल को पूर्व शर्त बनाये बिना बात-चीत प्रारम्भ की और उनकी बातचीत निर्णायक दौर में पहुंच चुकी थी|

गॉंधीजी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा कि ‘कांग्रेस वर्किंग कमेटी इस बात के लिये राजी थी कि भगत सिंह के मामले को संघर्ष विराम का उदाहरण नहीं बनाया जायेगा| इसलिये मैं इस मुद्दे को समझौते से अलग रखा था|’ गॉंधीजी ने भगत सिंह के विषय में लाडर्र् इरविन से दिनांक १८ फरवरी १९३१ को बात-चीत की| गॉंधी लिखते हैं कि मैंने उनसे कहा कि इससे हम जिस विषय पर चर्चा कर रहे हैं, उससे कोई लेना देना नहीं है, और इस अवसर पर यह कहना अनुचित भी होगा किन्तु यदि वर्तमान वातावरण को अच्छा बनाना है तो भगत सिंह की फांसी की सजा का निलम्बन आवश्यक है| वाइसराय ने इसे बहुत पसंद किया| उन्होंने कहा कि मुझे खुशी है कि आपने इस बात को मेरे सामने इस रूप में रखा| फांसी को रोकना बहुत कठिन कार्य है लेकिन निलम्बन पर विचार सम्भव है| लार्ड इरविन ने अपने राज्य सचिव को फांसी को रोकने के सन्दभर्र् में अपनी रिपोर्ट को भेज दिया था| महात्मा गॉंधी ने भगत सिंह की फांसी की सजा के रद्दोबदल के लिये कोई दलील नहीं दी यद्यपि वह किसी भी रूप में किसी की जान लेने के विरुद्ध थे| किन्तु उन्होंने उस परिस्थिति में फांसी को टालने के लिये अवश्य कहा था|९ गॉंधी-इरविन के बीच जो बात हुई थी उसमेंे यह स्पष्ट था कि गॉंधीजी ने फांसी के निलम्बन या टालने की बात की थी लेकिन सजा के रद्दोबदल या फांसी को रोकने की बात नहीं की थी| गॉंधीजी की इस बात पर काफी अलोचना भी हुई थी| क्या गॉंधी केवल सजा को टालना चाहते थे? ऐसा वह क्यों करना चाहते थे?

वास्तव में कानूनन (जैसा कि वाइसराय ने स्वयं स्वीकार किया था) प्रीवी कौंसिल के निर्णय के बाद वाइसराय के लिये फांसी की सजा बदलने या रोकने का कोई अवसर नहीं रह गया था| कांग्रेस के नेताओं ने उन कानूनी पक्षों को पहले ही संज्ञान में लिया था जो गॉंधी जी ने सी. विजयराघवाचारी को २९ अप्रैल १९३१ को लिखे अपने पत्र में लिखा था| उन्होंने लिखा कि ‘अभियुक्तों को जो दोषी करार दिया गया उसके कानूनी पहलुओं पर बड़ी बारीकी से तेगबहादुर सप्रू जैसे प्रभावशाली विधिवेत्ताओं ने वाइसराय के साथ चर्चा की थी| लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ|१० इसलिये गॉंधीजी ने फांसी की सजा रोकने के लिये नहीं बल्कि उसके निलम्बन के लिये कहा|

गॉंधीजी की योजना थी कि यदि फांसी की सजा का निलम्बन हो जाता है और यह लम्बा खिंचता है तो उचित अवसर देखकर अपने पक्ष में वातावरण तैयार होने पर सजा में छूट या दंडित क्रांतिकारियों को छो़ड़ने लिये निवेदन किया जायेगा| इसे विलम्बित करने के पीछे यह भी उद्देश्य था कि इस बीच यदि भगत सिंह को बचा लिया जाता है तो शेष क्रान्तिकारियों से हिंसा त्यागने की जमानत ले ली जायेगी| गॉंधीजी को आशा थी कि यह जमानत ब्रिटिश सरकार को भगत सिंह सहित सभी क्रान्तिकारियों को छुड़वाने के लिये सौदेबाजी के आधार के रूप में कार्य करेगी| गॉंधीजी दूसरी बार इस विषय में लार्ड इरविन से १९ मार्च १९३१ को करांची सेशन में मिले जब वे गॉंधी-इरविन पैक्ट के नोटिफिकेशन की चर्चा करने वहां गये थे| इरविन ने महात्मा गॉंधी के साथ उनकी बात-चीत को रिपोर्ट में रिकार्ड किया है, ‘गॉंधीजी जब जा रहे थे तब जाते-जाते उन्होंने कहा कि भगत सिंह के मामले का संज्ञान लीजिये क्योंकि मैंने अखबारों में यह पढ़ा है कि २४ मार्च को उन्हें फांंसी दे दी जायेगी|’’ मैंने उन्हें बताया कि मैंने भगत सिंह के मामले पर बड़ी चिन्ता और सावधानी से विचार किया है किन्तु उनकी फांसी को रोकने या रद्द करने के लिये मुझेे एक भी आधार नहीं मिला| फांसी की तारीख के सम्बन्ध में कांग्रेस के अधिवेशन तक उसे स्थगित करने पर मैंने विचार किया था किन्तु कुछ कारणों से जानबूझ कर उसे अस्वीकृत कर दिया|

२० मार्च, १९३१ को ब्रिटिश सरकार के गृह सचिव हर्बर्ट इमर्सन से इस विषय में गॉंधीजी की काफी लम्बी बात-चीत हुई| सरकार ने इस प्रश्न पर गम्भीरता से विचार किया कि फांसी देने का काम करांची कांग्रेस अधिवेशन से पहले समाप्त कर लिया जाय या बाद में| क्योंकि सरकार को दोनों में कठिनाई थी| सरकार ने विचार किया कि फांसी का स्थगन एक तो अभियुक्तों के साथ अनुचित होगा दूसरे गॉंधीजी के साथ भी अनुचित होगा क्योंकि तब उन्हें भी ऐसा लग सकता है कि सरकार फांसी की सजा रोकने पर विचार कर रही थी, जब कि ऐसा नहीं था| वह इस बात पर राजी हो गये कि दो विकल्पों में से इंतजार करना अच्छा नहीं होगा, यद्यपि उन्होंने कहा कि यदि फांसी की सजा को रोका गया होता तो यह तीसरा विकल्प अच्छा होता|११

गॉंधीजी के पास तीनों क्रान्तिकारियों को बचाने का एक अन्तिम उपाय यह था कि वह आसिफ अली को जेल में भेजकर भगत सिंह और साथियों से यह लिखित आश्वासन लेते कि अब उनका क्रान्तिकारी दल हिंसा त्याग देगा| यह माना जा रहा था कि इस कदम से गॉंधीजी द्वारा भगत सिंह और साथियों को बचाने में उनके हाथ मजबूत होंगे|१२ यह बात आसिफ अली ने ‘२७ मार्च १९३१ के भविष्य’(पत्र) में कहा है| वे लिखते हैं, ‘मैं पंजाब सरकार की अनुमति से दिल्ली से लाहोर इस इरादे के साथ आया कि मैं भगत सिंह से इस आशय का एक पत्र ले पाऊंगा कि रिवाल्यूशनरी पार्टी अपने क्रान्तिकारियों को हिंसक आन्दोलन को तब तक रोकने के लिये कहेगी जब तक यह आशा है कि महात्मा गॉंधी के अहिंसा आन्दोलन से आजादी प्राप्त हो जायेगी| मैंने भगत सिंह से मिलने के सभी उपाय आजमाया पर सफलता नहीं मिली|१३

घटना के १८ वर्ष बाद आसिफ अली जो उस समय उड़ीसा के राज्यपाल थे, उन्होंने भगत सिंह को बचाने के अपने असफल प्रयासों के विषय में लिखा, ‘‘जब गॉंधी-इरविन पैक्ट पर बात-चीत चल रही थी, तब गॉंधीजी पर भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी को सुरक्षित रोकने का बहुत बड़ा दबाव था| यह गॉंधीजी के अहिंसा सिद्धान्त के अनुरूप नहीं था कि वह एक हत्या के दोषी को बचाने के लिये इसे अपने आत्म-सम्मान का प्रश्न बनाते| इसलिये जो भी सम्भव था, उन्होंने उस बाबत लाडर्र् इरविन से बात की| लार्ड इरविन जिसके पास इस सन्दर्भ में अन्तिम अधिकार था, अन्त तक कोई भी निर्णय लेने में हिचकिचाते रहे|’’१४ सम्भवत: गॉंधीजी वाइसराय लार्ड इरविन के मन में चल रहे द्वन्द्व को समझ रहे थे, इसलिये भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने की अपनी मुहिम को उन्होंने दुगुना कर दिया|

‘न्यूज क्रोनिकल’ लन्दन के राबर्ट बर्नेस१५ ने २१ मार्च १९३१ की डायरी में नोट किया था कि ‘गॉंधीजी ने करांची कांग्रेस में जाने में एक दिन और विलम्ब मात्र इसी लिये किया क्योंकि वह वाइसराय से इस विषय पर पुन: बात-चीत करना चाह रहे थे|१६ वह भगत सिंह और साथियों को बचाने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते थे| २१ मार्च को पुन: गॉंधीजी वाइसराय से मिले और फिर फांसी को रोकने के लिये पुनर्विचार करने का निवेदन किया|१७ पुन: गॉंधीजी इसी मामले में २२ मार्च को भी इरविन से मिले|१८ वाइसराय ने गॉंधी के निवेदन पर पुनर्विचार करने का आश्वासन दिया| कुछ आशा की किरण देखकर गॉंधीजी ने २३ मार्च को सुबह पुन: एक व्यक्तिगत पत्र वाइसराय को लिखा|१९ अपने इस अन्तिम पत्र में उन्होंने वाइसराय को ‘प्रिय मित्र’ सम्बोधन देते हुए फांसी रोकने के लिये जनता की भावनाओं, आन्तरिक शान्ति का हवाला, क्रान्तिकारियों द्वारा हिंसा त्यागने का आश्वासन, उनकी खुद की स्थिति, सम्भावित न्यायिक त्रुटियों तथा इरविन के ईसाई भावनाओं को दृष्टिगत रखते हुए विचार करने को कहा, लेकिन गॉंधीजी के इस प्रयास का कोई परिणाम नहीं निकला और उसी शाम ७ बजे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी| जब उन्हें यह समाचार मिला तो गॉंधीजी स्तब्ध रह गये, उन्हें बहुत बड़ा धक्का लगा|

अरुणा आसिफ अली, जो आशिफ अली के साथ जेल में भगत सिंह से मिलने जाते हुए उनके साथ थीं, फांसी की सजा कम करने के लिये हो रहे प्रयासों की नजदीकी पर्यवेक्षक थीं| घटनाओं को याद करते वह लिखती हैं कि ‘एक बार तो लार्ड इरविन ने गॉंधीजी की हिमायत को लगभग मान लिया था किन्तु उस समय पंजाब के गवर्नर ने ऐसा करने पर इस्तीफा देने की धमकी दे डाली|२० इस बात का समर्थन राबर्ट बर्नेज तथा सी. एस. वेणू ने भी किया है|२१ ‘फ्री प्रेस’ ने एक टेलीग्राम में लिखा, फ्री प्रेस को विश्वस्त सूत्रों से यह पता चला है कि यद्यपि लार्ड इरविन भगत सिंह आदि को फांसी दिये जाने के पक्ष में नहीं थे किन्तु पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों ने लार्ड इरविन को फांसी की सजा को कम करने पर सामूहिक इस्तीफा देने की धमकी दे डाली|२२ सान्डर्स की हत्या और क्रान्तिकारियों की अन्य गतिविधियों ने पंजाब के अंग्रेज प्रशासनिक अधिकारियों के सामने एक चुनौती रख दी थी और इसके साथ भगत सिंह की बढ़ती लोकप्रियता ने उनके घावों पर नमक डाल दिया था| वे विरोधी आन्दोलन के खिलाफ किए जाने वाले किसी भी समझौते के विरोध में थे| उस समय की इन्टेलिजेन्स रिपोर्ट के अनुसार गॉंधी इरविन-पैक्ट ने सरकार का दिल तोड़ दिया क्योंकि उन्हें संघर्ष विराम में उन्हें सरकार के स्तर पर दृढ़ता की कमी के सबूत मिले|२३ तीनों को करांची सेशन से पहले ही फांसी देने के पंजाब सरकार के फैसले के सामने इरविन कोई तर्क नहीं दे सके| जब पंजाब के अधिकारियों ने इरविन को दुविधा में देखा तो सामूहिक इस्तीफे की चाल चली| इन्टेलिजेन्स ने १५ अप्रैल १९३१ के पहले के १५ दिनों की रिपोर्ट में लिखा कि ‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि यदि फांसी की सजा हो जाती है तो इससे सरकार के नुमाइंदों को बहुत अधिक बल मिलेगा’|२४

अत: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी ब्रिटिश सरकार की नौकरशाही विशेषकर पंजाब की, विजय थी न कि गॉंधीजी की हार| तीनों क्रान्तिकारियों द्वारा दया की भीख मांगने से इनकार करने से और उल्टे मिलिट्री स्टाइल में फांसी पर लटकाने की उनकी मांग ने महात्मा गॉंधी के काम को और मुश्किल बना दिया| वाइसराय अन्त तक कोई निर्णय नहीं ले पाये थे किन्तु आखिरकार पंजाब के अंग्रेज अधिकारियों के दबाव के आगे उन्हें झुकना पड़ा| जतिन्दर सान्याल जो अपने क्रान्तिकारी साथियों की गतिविधियों पर करबी नजर रखे हुए थे, का विचार है कि सम्भवत: लार्ड इरविन इस मुद्दे पर जनता के दृष्टिकोण से प्रभावित हो गये थे, विशेषकर महात्मा गॉंधी के निवेदन से| किन्तु यूरोप का आई. सी एस. वर्ग जो उन दिनों भारत में शक्ति का वास्तविक केन्द्र था, वह फांसी के रोकने या उसके किसी भी रूप में रद्दोबदल के खिलाफ था|२५

भगत सिंह और साथियों को फांसी से बचाने के गॉंधी के प्रयासों की उनके नजदीकी पट्टाभि सीतारमैया, मीराबेन, (मेडेलिन स्लेड), आसिफ अली, अरुणा आसिफ अली ने प्रसंशा की है| प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता वी. एन. दत्ता इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि ‘सभी समकालीन साक्ष्यों और लार्ड इरविन तथा गॉंधी के बीच हुए पत्राचारों से यह स्पष्ट है कि गॉंधी, भगत सिंह और साथियों को मन से बचाना चाहते थे और इसीलिये वे इरविन से लगातार उन्हें फांसी न देने की अपील करते रहे|

अपने शोधपत्र ’ढहश एुशर्लीींळेपी ेष चरीलह १९३१, ॠरपवहळ रपव खीुळप’ में अमित कुमार गुप्ता ने भगत सिंह को बचाने के लिये गॉंधी की नीतियों की गहन समीक्षा की है| वे लिखते हैं कि क्यों गॉंधीजी ने फांसी रोकने की जगह केवल भगत सिंह की फांसी के स्थगन के लिये कहा| यदि हम गॉंधी के साथ न्याय करते हुए सोचें तो फरवरी १९३१ में प्रीवी कौंसिल के आदेश के तहत महज सजा को रोकने की अपील करना स्वयं में एक सफलता थी| सबके बावजूद भगत सिंह की देशभक्ति पर किसी को कोई संदेह नहीं था| फैसले के लिये न्यायिक अधिकरण ने जो आधार लिया वह था राजनीतिक अपराध और पूर्वनियोजित हत्या का| किसी ने भगत सिंह के इस कृत्य को कानूनी रूप से सही नहीं कहा क्योंकि भगत सिंह और उनके साथी ऐसा करने वाले पहले व्यक्ति थे| गॉंधी चूंकि स्वयं एक वकील थे, इसलिये उन्होंने कानूनी बाध्यताओं और पहलुओं को अच्छी प्रकार समझ लिया था| फांसी को रोकने का एक ही रास्ता था- सरकार पर राजनैतिक दबाव| जनता की भावनाओं का दबाव तो पहले से ही था क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो गॉंधी और इरविन के बीच संवाद के लिये कोई मौका ही नहीं था| गॉंधी, जैसा कि स्वयं उन्होंने कहा था, फांसी निलम्बन को गॉंधी-इरविन समझौते के लिये आवश्यक शर्त बनाया जा सकता था किन्तु ऐसा करने के लिये वह स्वयं अनिच्छुक थे| उनकी इस अनिच्छा को उस गॉंधी-इरविन ऐतिहासिक समझौते के आलोक में समझा सकता है जो किसी राष्ट्र के जीवन में बड़ी मुश्किल से आता है| एक राष्ट्र के भाग्य को किसी एक व्यक्ति के भाग्य के लिये दाव पर नहीं लगाया जा सकता| इसके अलावा, गॉंधी उनके द्वारा उद्घोषित अहिंसा के प्रति श्रद्धा के खिलाफ हिंसा को कैसे तरजीह देते|

इस लिये इस समकालीन बिन्दु पर गॉंधी की आलोचना सर्वथा अनुचित है| वास्तव में जब गॉंधी को परिस्थितियों के द्वारा दबाव बनाना अतार्किक लगा तब उन्होंने जनता की भावनाओें का दबाव बनाया| शायद उन्होंने यह सोचा हो कि यदि वह किसी भी प्रकार से फांसी की सजा का निलम्बन सुरक्षित करा भी लेते तो, ब्रिटिश सरकार के लिये उसे क्रियान्वित करवा पाना बहुत मुश्किल हो जाता| उन्हें अंदेशा था कि उनके सजा-निलम्बन के

निर्दोष निवेदन को युद्ध-विराम संधि के लिये पक्षपातपूर्ण माना जा सकता है|२६

इसके अलावा, भगत सिंह को बचाया जा सकता था या नहीं, इस प्रश्न पर पुनरावलोकन को भगत सिंह के उनके स्वयं के परिप्रेक्ष्य में भी किया जा सकता है| क्या शहादत के आदर्श जोे लम्बे से उनके मन में थे, उससे वे अपनेआप को वंचित रखते? क्या अहिंसा के मुकाबले हिंसा की हार के रूप में एक प्रकार से क्रान्तिकारी दल के आदर्शों की सांकेतिक हार नहीं होती? गॉंधीजी, भगत सिंह को शहादत देनेवाले के रूप में जानते थे| यदि गॉंधीजी, भगत सिंह को शहादत देने से रोकते तो वह आज देशभक्तों की जिस आकाशगंगा के जाजल्वमान सितारे के रूप में चमक रहें हैं, क्या चमकते होते शायद इन सभी प्रश्नों के आलोक में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने २० मार्च १९३१ को पंजाब गवर्नर को ‘दया याचिका’ लिखकर उन्हें बचाने के सभी सम्भावित दरवाजों को बन्द कर दिया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि ‘आपकी अदालत के फैसले के अनुसार हमने युद्ध छेड़ा है और इसलिये हम युद्धबन्दी हैं| हम उसी प्रकार युद्धबन्दी के रूप में व्यवहार किये जाने के पक्ष में हैं, इसलिये हम दावा करते हैं कि हमें फांसी देने के बदले गोली मार दी जाय|’२७

सन्दर्भ :

१) डी. जी. तेन्दुलकर, महात्मा: लाइफ ऑफ मोहनदास करमचन्द गॉंधी, अंक -३, १९३०-३४, प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, १९६१ पृ. ७४, २) यशपाल‘गॉंधीवाद की शव-परीक्षा’, ३) यशपाल, सिंहावलोकन, (इलाहाबाद : लोकभारती, २००५) पृ. ४०४-४०५, ४) कम्प्लीट वर्क्स ऑफ महात्मा गॉंधी, खंड १०, पृ. ११२, ५) वही, खंड ३८, पृ. २७४-२७६, ६) वही, खंड ४५, पृ. २७३, ७) वही, खंड ४५, पृ. ३४९, ८) वही खंड ४३, पृ. ३९१, ९) वही, खंड ४५, पृ. १९६-१९७, १०) वही, खंड ४६, पृ. ५१-५२, ११) राष्ट्रीय अभिलेखागार, होम पोलिटिकल फाइल, ३३.१ के. डब्ल्यू, १९३१, १२) महादेव भाई की डायरी, पृ. १७१ (मेनस्ट्रीम, ६, अप्रैल, १९९६, पृ.३० में अनिल नौरिया द्वारा उद्धृत्), १३) भविष्य, इलाहाबाद, २७ मार्च १९३१, स्नेहलता सहगल द्वारा अनुवाद,

पृ. २९३-९४, १४) कामनवील, पूना, २३ मार्च १९४९, १५) राबर्ट बर्नेस, एक ज्येष्ठ पत्रकार थे और डायरी लिखते थे जिसमें मुख्य भारतीय नेताओं तथा ब्रिटिश सरकार पर उच्च पदों पर आसीन लोगों की बातों को लिखते थे| ‘उनकी डायरी’, १९३२ में प्रकाशित, १६) राबर्ट बर्नेस, नेकेड फकीर (नंगा फकीर), न्यूयार्क, हेनरी हाल्ट एण्ड कम्पनी १९३२, पृ. २१३, १७) कम्प्लीट वर्क्स ऑफ महात्मा गॉंधी, खंड ४५, पृ. ३२०

ए डीटेल्ड क्रोनोलोजी, सी. बी. देसाई, गॉंधी पीस फाउण्डेशन, १९७१, पृ. ८७,

१८) गॉंधी १९१५-१९४८, ए डीटेल्ड क्रोनोलोजी, १९) सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय, खण्ड ४५, भारत सरकार १९७१, पृ. ३५३-५४ (पत्र नीचे दिया गया है), २०) अरुना आसिफ अली, फ्रैगमेन्ट्स फ्राम दी पास्ट, पैट्रियट प्रकाशन, न्यू दिल्ली, १९८९ पृ. १०२, २१) होमेज टु मार्टर्स, शहीद अर्द्ध शताब्दी समारोह समिति, १९८१, हिन्दी खण्ड,

पृ. ८५-८६; राबर्ट बर्नेस, नेकेड फकीर (नंगा फकीर), न्यूयार्क, हेनरी हल्ट

एण्ड कम्पनी १९३२, पृ. २११-२१२, सी. एस. वेणू सरदार भगत सिंह, माइक्रोफिल्म, भारतीय अभिलेखागार, पृ. ४८, २२) भविष्य, ९ अप्रैल १९३१ (हिन्दी से अंग्रेेजी में अनुवादित), २३) टेरेरीज्म इन इंडिया, १९१७-१९३६, पृ. ४२, २४) भारतीय अभिलेखागार, होम पोलिटिकल फाइल, १८.६. १९३१, २५) जतिन्दरनाथ सान्याल, वही पृ. ७४, २६) अमित कुमार गुप्ता, दि इक्जीक्यूशन ऑफ मार्च १९३१, गॉंधी एण्ड इरविन, बेंगाल पास्ट एण्ड प्रजेन्ट, खण्ड-९०, जनवरी-जून १९७१, पृ. १११-११२, २७) शिव शर्मा, दी सेलेक्टेड राइटिंग्स आफ शहीद भगत सिंह, समाजवादी साहित्य सदन, कानपुर, १९९६

- डॉ. चन्दर पाल सिंह

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