Gandhi Research Foundation

Articles - भारत में अनशन का पहला प्रयोग (अहमदाबाद मिल-मजदूर सत्याग्रह के संदर्भ में)

‘खोज गॉंधीजी की’ के महात्मा गॉंधी ने साबरमती नदी के किनारे आश्रम की स्थापना की और अहमदाबाद को कर्मभूमि के रूप में चुना| अहमदाबाद में और अहमदाबाद से गॉंधीजी ने कई ऐतिहासिक सत्याग्रह किए तथा कई ऐतिहासिक संस्थाओं की स्थापना भी की है| सन् १९१८ में अहमदाबाद में गॉंधीजी ने मिल-मजदूर आंदोलन को एक अनोखी पद्धति से अंजाम दिया| यह इतिहास की पहली ही घटना थी कि किसी आंदोलन को अनशन के माध्यम से सफल किया गया हो| जनवरी २०१८ में अहमदाबाद सत्याग्रह की शताब्दी वर्ष आ रही है| आइए, इस अवसर पर सौ साल पहले घटी घटना के पीछे गॉंधीजी की कल्पना और कार्य-प्रणाली को जानते हैं|- सम्पादक

गुजरात क्षेत्र में अहमदाबाद पहले से ही सबसे महत्त्वपूर्ण शहर बना रहा| समय की अवधि में, अहमदाबाद ने खुद को कपड़ा उद्योग के रूप में स्थापित किया और ‘ईस्ट के मैनचेस्टर’ का उपनाम अर्जित किया| श्रमिकों के अधिकार, नागरिक अधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिए यह सिविल अवज्ञा के कई अभियानों का केंद्र था|

सन् १९१७ की बरसात में जब अहमदाबाद में भयंकर प्लेग फैला हुआ था, तब मजदूर अहमदाबाद छोड़कर चले न जाय, इसके लिए अहमदाबाद स्थित मिल-मालिकों द्वारा उन्हें वेतन के ७० से ८० फीसदी के बराबर प्लेग बोनस दिया गया था| प्लेग बंद हो जाने के बाद भी उस समय हो रहे युरोप के महायुद्ध के कारण बढ़नेवाली सख्त महंगाई की वजह से वह बोनस जारी रहा| बाद में जब मालिकों ने बोनस बंद करने की नोटिस निकाली, तब बुनाई विभागवाले मजदूरों में खलबली मची और वे अनुसूया बहन से मिलकर यह मॉंग करने लगे कि प्लेग बोनस के बजाय महंगाई की वृद्धि कम से कम ५० फीसदी मिलनी चाहिए| स्थिति दिन-दिन गंभीर रूप धारण करती जा रही थी|

गॉंधीजी की मुंबई यात्रा के दौरान वहॉं सेठ अंबालाल साराभाई से उनकी भेंट हुई| अंबालाल साराभाई ने अपने पास के कुछ कागज-पत्र दिखाकर गॉंधीजी से कहा कि अहमदाबाद के मिल-मजदूरों में बोनस के बारे में असंतोष है और डर है कि कहीं वे हड़ताल न कर दें| यदि ऐसा हुआ, तो उसका नतीजा अच्छा न होगा| इसलिए उन्होंने गॉंधीजी को सलाह दी कि वे इस सवाल को अपने हाथ में लें| अंबालाल साराभाई ने जो भय जाहिर किया, वह गॉंधीजी को गंभीर मालूम हुआ| उन्होंने सोचा ‘यदि सचमुच हालत ऐसी ही है, तब तो सारे अहमदाबाद शहर की शांति खतरे में पड़ सकती है|’१ अतएव गॉंधीजी ने निश्चय किया कि वे इस संकट को टालने की भरसक कोशिश करेंगे|

गॉंधीजी ने अहमदाबाद पहुँचकर मजदूरों और मिल-मालिकों की स्थिति और दृष्टि को समझना शुरू किया| हालत दिन-ब-दिन नाजुक होती जा रही थी| सरकार के पास भी सारा मामला पहुँच चुका था| सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मिल-मालिकों और प्रशासन के अधिकारियों को भी यह अहसास हो गया था कि इस गंभीर मामले में केवल गॉंधीजी ही हैं जिनके द्वारा इस स्थिति का हल निकाला जा सकता है| इस सिलसिले में अहमदाबाद के तत्कालीन कलेक्टर ने गॉंधीजी को एक खत लिखा था जिसमें उन्होंने दर्शाया कि बोनस के प्रश्न को लेकर मिल-मालिकों और मजदूरों के दरमियान एक बहुत ही गंभीर हालत पैदा हो जाने का अंदेशा है| मालिक लोग मिलें बंद करने की धमकी दे रहे हैं, इससे लोगों को बहुत तकलीफ और दुःख होने की आशंका है| ... मुझे पता चला है कि अगर मिल-मालिक किसी की सलाह पर ध्यान देंगे, तो वह आपकी ही सलाह होगी|२

गॉंधीजी कलेक्टर, मिल-मालिक और मजदूर सबसे मिले| सबके साथ उन्होंने सलाह-मशविरा किया| अंत में दोनों पक्षों ने यह स्वीकार किया कि इस झगड़े का फैसला पंचों द्वारा कराया जाए| पंचों में मालिकों की ओर से सेठ अंबालालभाई, सेठ जगाभाई दलपतभाई और सेठ चंदुलाल एवं मजदूरों की ओर से गॉंधीजी, वल्लभभाई पटेल और शंकरलाल बैंकर और अध्यक्ष के स्थान पर कलेक्टर साहब नियुक्त किए गए| इसके बाद कुछ मिलों में गलतफहमी से मजदूरों ने हड़ताल कर दी| मजदूरों को भूल बता दी गई, तो वे उसे सुधारने को तैयार हो गए| परंतु मालिकों ने कहा कि मजदूरों ने पंच मुकर्रर हो जाने पर भी हड़ताल कर दी, इसलिए अब हम पंच की बात रद्द करते हैं| इसी के साथ उन्होंने यह निश्चय किया कि जो मजदूर वेतन की २० फीसदी वृद्धि पर रहना न चाहते हों उन्हें निकाल दिया जाय| बुनाई विभागवालों ने इतनी वृद्धि मंजूर नहीं की, तो मालिकों ने उनका लॉक आउट (कामबंदी) शुरू कर दिया| इस संकट को टालने के लिए गॉंधीजी ने अथक परिश्रम किया; लेकिन मिल-मालिक मजदूरों की गलती पर ही जोर देते रहे और खुद जरा भी टस से मस न हुए| पंचों ने मालिकों और मजदूरों का हित सोचकर और तमाम परिस्थिति की जांच करके तय किया कि ३५ फीसदी वृद्धि उचित है| मजदूरों को इस प्रकार की सलाह देने से पहले पंच ने मालिकों को अपनी इस राय का समाचार देकर सूचित किया कि इस मामले में उन्हें कुछ कहना हो तो कहें| परंतु मालिकों ने अपना विचार नहीं बताया| इसलिए मजदूरों को ३५ फीसदी वृद्धि मॉंगने की सलाह दी गई| इसे उन्होंने मान लिया और निश्चय किया कि जब तक ३५ फीसदी वृद्धि न मिले, तब तक काम पर न जाएं| इस प्रकार लड़ाई शुरू हुई| गॉंधीजी ने रोज पत्रिकाएं निकालकर और मजदूरों की सभा में वह पत्रिका सुनाकर और उस पर विवेचन करके मजदूरों को टेक, एकता, हिम्मत, मजदूरी की प्रतिष्ठा, पूंजी से श्रम के अधिक महत्त्व और प्रतिज्ञा की पवित्रता और गंभीरता की शिक्षा देना शुरू कर दिया| और इस प्रकार लड़ाई को धार्मिक स्वरूप देने के उपाय करने लगे|

मजदूरों के साथ नजदीक से जुड़ने के लिए गॉंधीजी ने भिन्न-भिन्न उपायों से सजीव संबंध बढ़ाने का प्रयास किया ताकि उनमें घुलने-मिलने की कोशिश की जाय| इसके लिए निम्न तरीके आजमाए थे| १) मजदूरों के घर-घर जाकर उनकी समूची हालत के बारे में पूछताछ करने, उनकी रहन-सहन में कोई कमी हो तो उसे सुधारने, संकट में उन्हें सहायता और सलाह देने तथा उनके सुख-दुःख में भरसक हाथ बंटाने की कोशिश करना| २) लड़ाई के दरमियान अपने रुख और रवैये के बारे में मजदूरों को कुछ सलाह-सूचना प्राप्त करनी हो, तो उसका ऐसा प्रबंध करना जिससे वह उन्हें तुरंत प्राप्त हो सके| ३) रोज एक नियत स्थान पर मजदूरों की आम सभा करके उनको लड़ाई के सिद्धांत और उसका रहस्य समझाना|

४) मजदूरों के लिए ‘सुबोध पत्रिकाएं’ निकालना, ताकि लड़ाई के ये सिद्धांत और इनका रहस्य उनके दिल में सदा के लिए अंकित हो जाय; उन्हें सरल और उच्च कोटि का साहित्य हमेशा मिलता रहे|

गॉंधीजी की कार्य-प्रणाली अद्वितीय थी उनके साथ रहने वाले एवं सत्याग्रह में सम्मिलित होने वाले सभी लोगों को वे सामाजिक शिक्षा प्रदान करते थे| चाहे वे अनुयायी हों या अनुग्रही दोनों को शिक्षा की अनुभूति प्राप्त होती थी| सत्याग्रह की पद्धति बदला लेने के लिए नहीं किंतु बदलाव लाने के लिए है यह गॉंधीजी ने सिद्ध कर दिखाया| इसलिए वे कहते हैंै कि आप मुझे सत्याग्रह की दशा में अपनी क्रियाशीलताएँ बंद कर देने के लिए कहें तो वह मेरे जीवन को समाप्त कर देने के समान होगा|३

गॉंधीजी लोगों का प्रबोधन कर ही रहे थे, लेकिन स्थिति में अचानक बदलाव आया| अब तक मिल-मालिकों ने ‘लॉक आउट’ का ऐलान कर रखा था, इसलिए मजदूर किसी भी प्रकार काम पर जा ही न सकते थे| उसके बाद ‘लॉक आउट’ को रद्द कर दिया और कहा कि जो मजदूर २० प्रति सैकड़ा भत्ता लेकर काम पर आने को तैयार हों, उनके लिए मिलें खुली हैं| इसका असर यह हुआ कि कच्चे दिल के मजदूर काम पर चले गए| इन्हीं दिनों गॉंधीजी के पास यह शिकायत आई कि कुछ ज्यादा उत्साही मजदूर कच्चे-पोचे मजदूरों को डरा-धमकाकर काम पर जाने से रोकते हैं| गॉंधीजी इस चीज को कभी सह नहीं सकते थे| वे तो शुरू से कहते आए थे कि मजदूरों के हृदय को उनकी भावनाओं को, प्रभावित करके उन्हें अपनी आन पर अड़े रहने को कहो; जोर-जबरदस्ती या जुल्म करके नहीं| दूसरे दिन शुद्ध प्रामाणिकता से छलकती हुई एक पत्रिका निकाली गईः ‘मजदूरों की लड़ाई का सारा आधार उनकी न्यायोचित मांग और न्यायपूर्ण कार्य पर है| अगर मांग अनुचित है, तो मजदूर कभी जीत नहीं सकते| मांग के उचित होने पर भी अगर उसकी पूर्ति के लिए वे अन्याय का उपयोग करेंगे, झूठ बोलेंगे, दंगा-फसाद मचायेंगे, दूसरों को दबायेंगे या आलस से काम लेंगे, और इस तरह परेशान होंगे, तो भी अंत में जीत नहीं पायेंगे|४ मूल बात यह है कि हम सत्य पर अडिग हों, साधन शुद्धि पर हमारा भरोसा हो और व्यापक लोकहित पर हमारा बराबर ध्यान लगा रहे| गॉंधीजी अपने जीवन में साधन शुद्धि के प्रति संवेदनशील रहे, और यह सत्याग्रह का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है| शुद्ध साधन लोगों के हृदय को छूता है| आहिस्ता-आहिस्ता लोग अपने आपको उस साधन में समायोजित करते हैंै, क्योंकि शुद्ध साधन केवल बाह्य परख को नहीं छूता बल्कि अंदरूनी अहसास को स्पर्श करता है| यह केवल अपने सहयोगियों पर ही काम करता है ऐसा नहीं है बल्कि यह विरोधियों पर भी उनती ही असरकारकता से कार्य करता है| अंत में शुद्ध साध्य की प्राप्ति होती है| यहॉं परिवर्तन का सिद्धांत कार्य करता है जिससे शाश्वत परिवर्तन को फलीभूत किया जा सकता है|

इस आंदोलन के करीब बाईस दिन बीत गए थे| किसी भी तरह का कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा था| मजदूरों को खाने का टोटा पड़ने लगा, गंभीर स्थिति वाले मजदूरों के लिए कुछ काम ढूंढा गया| एक पत्रिका में गॉंधीजी ने मजदूरों को वचन दिया था कि, इस लड़ाई में जिन्हें भूखों मरने की नौबत आ जायगी और जिन्हें कोई काम नहीं मिल सकेगा, उन्हें ओढ़ाकर हम ओढेंगे और खिलाकर हम खायेंगे| थोड़े ही दिनों में इन वचनों के पालन करने का अवसर आ गया| गॉंधीजी के कानों पर आलोचना की बातें आईं कि, गॉंधीजी और अनसूयाबहन को क्या? उनके लिए मोटर आने-जाने को और अच्छा खाने-पीने को है| परंतु हमारे तो प्राण निकले जा रहे हैं| यह सुनकर गॉंधीजी का हृदय विदीर्ण हो गया| तेईसवें दिन सुबह जब सभा में गए, तब पहले से ही दुःखी हुए हृदय और अपनी करुणार्द दृष्टि से उन्होंने क्या देखा? वे कहते हैं कि अपने मुख पर झलकते हुए अटल आत्म-निश्चय की भावना से हमेशा नजर आनेवाले एकाध हजार आदमी देखे| एक क्षण में अंतर का संकल्प हो गया और हजार सभाजनों से उन्होंने कह दिया कि तुम अपनी प्रतिज्ञा से विचलित हो जाओ, यह मुझसे क्षणभर भी बरदाश्त नहीं हो सकता| ‘‘जब तक तुम्हें ३५ प्रतिशत वृद्धि न मिले या तुम सब हार न जाओ, तब तक मैं न भोजन करूंगा और न मोटर काम में लूंगा|’’५ इस प्रतिज्ञा का असर इतना तो प्रबल हुआ कि जो मजदूर सभा में नहीं आए थे, वे भी मजबूत बन गए| मिल-मालिकों पर भी गॉंधीजी के इस उग्र निश्चय का जबरदस्त प्रभाव पड़ा| यद्यपि उनका खयाल था कि हम एक बार मजदूरों की बात मान लेंगे, तो वे सिर पर चढ़ जाएंगे, फिर भी बहुत से मालिकों के दिल में गॉंधीजी के प्रति प्रेम और पूज्य भाव था| वे आकर कहने लगे कि, ‘इस बार हम आपकी खातिर मजदूरों को ३५ फीसदी दे देते हैं|’ गॉंधीजी ऐसा करने से साफ मना करते और कहते मुझ पर दया करके नहीं, परंतु मजदूरों की प्रतिज्ञा का आदर करके, उनके साथ न्याय करने के लिए ३५ फीसदी दीजिए| फिर भी मेरे उपवास से मालिकों में दबाव पड़ रहा है तो यह उपवास में दोष है| लेकिन एक तरफ दस हजार मजदूरों की प्रतिज्ञा के टूटने से होनेवाले अधःपतन को रोकने की बात थी और दूसरी ओर मालिकों पर पड़नेवाले दबाव का दोष आता था| यह दोष उन्होंने सिर पर ले लिया और मानो मालिकों के अपराधी हों, इस तरह गरीब बनकर उनके साथ समझौते की चर्चा करने लगे| वे हमेशा यह मानते थे कि ‘‘यदि हम न्याय चाहते हैं तो अपने प्रतिद्वन्द्वी को भी न्याय देना चाहिए| सत्याग्रही का यही प्रथम कर्तव्य है|’’६ उपवास के चौथे दिन मिल-मालिकों और मजदूरों के बीच सुखद समझौता हुआ|

अनशन के माध्यम से सत्याग्रह को सफल करने का यह पहला प्रयोग था, इससे यह साबित हुआ कि शुद्ध अनशन के माध्यम से भी कोई समस्या का समाधान प्राप्त किया जा सकता है| गॉंधीजी ने उपवास को सत्याग्रह के शस्त्रभंडार का एक महाशक्तिशाली शस्त्र बनाया| उस हथियार को वे पवित्र उद्देश्यों के काम में लाते थे| इससे अहिंसक पद्धति में एक और साधन का इजाफा हुआ और यह यकीन दिलाया की परिवर्तन लाने के लिए अहिंसक साधन बेहद असरकारक और शाश्वत होते हैं| वे मानते थे कि सर्वोत्कृष्ट कार्य को सिद्ध करने के लिए भी हिंसात्मक पद्धति का प्रयोग करने का में कट्टर विरोधी हूँ्| ...मैंने अनुभव से यह सिद्ध किया है कि शाश्वत कल्याण असत्य और हिंसा में से कभी निर्माण नहीं कर सकते| गॉंधीजी नये प्रयोगों से परिपूर्ण जीवन व्यतीत करते रहे, वे हमारे लिए ऐसे क्षेत्र के प्रयोगों की देन छोड़ गए हैं जो अब तक अज्ञात था|

अहमदाबाद में मिल-मालिकों और मजदूरों में गॉंधीजी के नेतृत्व में एक छोटी किंतु दोनों पक्षों में जो मिठास कायम रही और उसके जो जबरदस्त परिणाम हुए हैं उन्हें देखते हुए महत्त्व की लड़ाई हो गई| इसके परिणाम बहुत सुंदर हुए हैंै, इस लड़ाई में पंच की मध्यस्थता से दोनों पक्षों के झगड़ोंे को निपटा लेने के सिद्धांत का जो बीजारोपण हुआ, उसे गॉंधीजी ने जतन करके पोषित किया और उसमें मिल-मालिक संघ और मजूर महाजन संघ ने अच्छा साथ दिया| इसके परिणाम स्वरूप ही अहमदाबाद का मजूर महाजन संघ हिंदुस्तान में एक अद्वितीय संस्था बन गई| आज मजदूरों के सामने अमुक वेतन वृद्धि या अमुक सुविधाएं प्राप्त करने का ही ध्येय नहीं रहा, परंतु मजदूर यह समझने लगे हैं कि जैसे पूंजी धन है, वैसे मजदूरी भी धन है, बल्कि उससे अधिक कीमती धन है| और इस समझ में मिलों के प्रबंध तक में मालिकों के साथ समान भाग रखने की भावना का उदय हुआ|

सन्दर्भ -

१) एक धर्मयुद्ध, महादेवभाई देसाई, पृ. ४; २) एक धर्मयुद्ध, महादेवभाई देसाई, पृ. ५;

३) सत्याग्रह और विश्व शांति, रंगनाथ दिवाकर; ४) एक धर्मयुद्ध, महादेवभाई देसाई, पृ. सं. २४; ५) सरदार वल्लभभाई, नरहरि परीख, पृ. सं. १३४; ६) सत्याग्रह, श्रीरामनाथ पृ. सं. २०; ७) लोकशाहि साची अने भ्रामक (गुज.), गॉंधीजी, पृ. सं. ४०.

Back to Articles


Address
Gandhi Teerth, Jain Hills, PO Box 118,
Jalgaon - 425 001 (Maharashtra), India
 
Contact Info
+91 257 2260033, 2264801;
+91 257 2261133
© Gandhi Research Foundation Site enabled by : Jain Irrigation Systems Ltd