Gandhi Research Foundation

Articles - पास्कल एलन नाझरथ का व्याख्यान

दिनांक १ मार्च २०१७ को गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन एवं जलगॉंव के खानदेश एज्यूकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित मैनेजमेन्ट इन्स्टिट्यूट ऑफ रिसर्च के संयुक्त तत्त्वावधान में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया| इस विशेष व्याख्यान के लिए बेंगलोर से पास्कल एलन नाझरथ को आमन्त्रित किया गया था| नाझरथजी अपने जीवन के करीब ३५ साल विभिन्न देशों में भारतीय राजदूत के रूप में अपनी सेवायें अर्पित कर चुके हैं| १९९४ में सेवा निवृत्त होने के बाद आपने गॉंधी विचार को वैश्विक स्तर पर प्रस्थापित करने के लिए सर्वोदय इन्टरनेशनल ट्रस्ट की स्थापना की| श्रीमान नाझरथ एक उत्कृष्ट वक्ता व लेखक हैं| आपके द्वारा लिखित पुस्तक ‘गॉंधीजी का अनन्य नेतृत्व’ करीब १५ अन्तर्राष्ट्रीय भाषा एवं १२ भारतीय भाषाओं में अनुवादित हुई है| उम्र के ८२ साल में भी श्रीमान नाझरथ ने अपने आपको गॉंधी विचार प्रसार कार्य में प्रवृत्त रखा है|

महाविद्यालय में उनके व्याख्यान का विषय ‘२१ वीं शताब्दी में गॉंधीजी’ रहा| श्रीमान नाझरथ का परिचय जर्मनी के हाईडलबर्ग विश्वविद्यालय से आयी श्रीमती गीता धरमपाल ने दिया| परिचय में गीता धरमपाल ने नाझरथजी की पुस्तक में प्रस्तुत गॉंधी व्यंग-चित्रों को छात्रों के सामने अनोखे अंदाज में प्रस्तुत किया| श्रीमान नाझरथ ने अपने वक्तव्य में गॉंधीजी के ऐतिहासिक कार्यों जैसे-दक्षिण अफ्रीका और भारत में गॉंधीजी द्वारा किये गये सत्याग्रह की झलक दर्शायी| अपने विचार में गॉंधीजी के व्यवस्थापन की सिद्धियों को प्रस्तुत करते हुए श्रीमान नाझरथ ने कहा कि उनकी सिद्धि केवल दो शब्दों की नींव पर निर्मित हुई है और वह है सत्य और अहिंसा| इन्हीं दो शब्दों से सत्याग्रह की संकल्पना का जन्म हुआ|

मोहनदास गॉंधी जब दक्षिण अफ्रीका गये थे तब वे केवल एक अनुवादक के रूप में गये थे| दक्षिण अफ्रीका में बसी दो मुस्लिम पीढ़ी को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो गुजराती दस्तावेज को अंग्रेजी में अनुवाद कर स्थानीय वकील को समझा सके| दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने कई अत्याचारों का सामना किया, खास तौर पर पीटरमारित्सबर्ग में पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद भी मोहनदास को रेलवे कम्पार्टमेन्ट से बाहर फेंक दिया गया| तब उन्होंने ने सोचा मैं अगर हिन्दुस्तान वापस चला जाऊं तो मैं डरपोक कहलाऊंगा, मुझे अन्याय का सामना करते हुए मेरे अधिकार के लिए लड़ना होगा| और वे वहॉं पर रहकर अन्याय के खिलाफ लड़े| इस घटना ने मोहन के दिलो-दिमाग में सत्याग्रह के बीज बो दियेे|

उपरोक्त घटना को दर्शाते हुए श्रीमान नाझरथ ने कहा कि तब मोहनदास केवल २४ साल के थे| इस घटना के पीछे भगवद्गीता का प्रेरक बल था| भगवद्गीता से मोहन ने यह संदेश प्राप्त किया कि जहां कहीं भी अन्याय व अत्याचार दिखायी दे वहॉं पर आवाज़ उठाकर उसका सामना करने के लिए तैयार होना चाहिये| भगवद्गीता के इस संदेश को मोहन ने अपने जीवन में अंगीकृत किया| उन्होंने दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश अगर किसी से प्राप्त किया तो वह है ईसा मसीह| ईसा मसीह के जीवन से हम यह संदेश प्राप्त कर सकते हैं कि हमारे ऊपर कितने भी कष्ट आयें, कष्ट देनेवाले हमारे शत्रु को हमें प्यार और करुणा का संदेश देना चाहिये तथा शत्रु को माफ कर देना चाहिये| यदि कष्ट सहन करते हुए आप मृत्यु को प्राप्त करें तब भी आप अपने शत्रु को माफ करें| कृष्ण और क्राइस्ट के संदेश को गॉंधीजी ने अंगीकृत किया| अपने जीवन के कई महत्त्वपूर्ण अवसरों पर उन्होंने कई अत्याचार करने वाले लोगों के प्रति घृणा की जगह प्यार व अहिंसा के नजरिये से देखा है| गॉंधीजी और ईसा मसीह में एक साम्य था और वह है दोनों में अहिंसक प्रतिरोध की क्षमता| अहिंसक प्रतिरोध की शिक्षा उन्हें ईसा मसीह से मिली|

श्रीमान नाझरथ ने गॉंधीजी को प्यार के पैगम्बर के रूप में परिभाषित किया जिन्होंने क्रांति में भी क्रांतिकारी बदलाव किया|

उक्त कार्यक्रम में संस्थान के निदेशक डॉ. विवेक काटदरे, प्रबंधन विभाग के सभी अध्यापक, छात्र-छात्रायें, फाउण्डेशन के विनोद रापतवार तथा अश्विन झाला उपस्थित थे| कार्यक्रम का सूत्र-संचालन प्रबंधन अभ्यासक्रम की छात्राओं ने किया|

Back to Articles


Address
Gandhi Teerth, Jain Hills, PO Box 118,
Jalgaon - 425 001 (Maharashtra), India
 
Contact Info
+91 257 2260033, 2264801;
+91 257 2261133
© Gandhi Research Foundation Site enabled by : Jain Irrigation Systems Ltd