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Articles - ग्रामीण पुनर्निर्माण पर प्रो. ब्रोमले रे का व्याख्यान

प्रो. ब्रोमले रे, वॉशिंगटन (युएसए) शहर में स्थित अल्बानी यूनिवर्सिटी के वैश्वीकरण और अन्तर्राष्ट्रीय अभ्यास की योजना तथा शहरी आवास और सामुदायिक सेवा के अभ्यासक्रम से जुड़े हैं| प्रो. रे नेहरू फुलब्राईट फेलोशिप लेकर छह माह के लिये भारत में अध्ययन के लिये आये हैं और उसी के तहत गॉंधी तीर्थ पधारे थे|

२४ दिसम्बर २०१६ को गॉंधी तीर्थ पर प्रो. रे का History of the Idea of Rural Reconstructionविषय पर एक व्याख्यान आयोजित किया गया था| प्रो. रे ने भारत के गॉंवों को लेकर अपनी बात रखी| अपने व्याख्यान के दौरान प्रो. रे ने रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रति देखने का एक अलग दृष्टिकोण प्रदान किया| उन्होंने कहा कि रवीन्द्रनाथ टैगोर का नजरिया कला के प्रति उत्कृष्ट रहा, कला केवल कुछ खास पहलू पर ही सीमित नहीं है| वे मानते थे कि कला जीवन के हर एक पहलू में होती है| हम जिस कार्य के साथ जुड़े हैं वह भी एक कला है| इस दृष्टि से हमारा व्यवसाय हमारी कला को प्रदर्शित करता है| अगर हम कृषि के साथ जुड़े हैंै तो उनसे सम्बन्धित कार्य करने में हमारी कला है, चाहे वह हल चलाना हो, या फसल काटना हो, हर गतिविधि को साकार करने में कला महत्त्वपूर्ण है| यही शैली सभी क्षेत्र में लागू होती है| शिक्षा देना व लेना, खाना बनाना, संगीत के साधन निर्माण करना, मिट्टी के बरतन बनाना, शौचालय की सफाई करना, गाय का दूध निकालना हर कार्य हमारी कला का बेमिसाल नमूना है|

गॉंधीजी का नजरिया रचनात्मक कार्य का रहा, उनके माध्यम से पुनर्निर्माण की कल्पना को साकार करने के लिए सुव्यवस्थित आयोजन होना चाहिये और वे आयोजन रचनात्मक कार्य के द्वारा ही किया जा सकता है| शराब बंदी, महिला सशक्तीकरण, अस्पृश्यता निवारण जैसे रचनात्मक कार्यक्रम से समाज नवरचना का कार्य सरलता से हो सकता है|

आजादी से पहले हमारी प्राथमिकता थी स्वतंत्रता और जब स्वतंत्रता हासिल कर ली तब हमारी प्राथमिकता में आमूल परिवर्तन आया| प्राकृतिक आपदा के सामने डटे रहने की तैयारी के लिए हमें बड़ी-बड़ी योजनायें जैसे-बड़े बॉंध बनाना, हाईड्रो पावर का निर्माण करना आदि| साथ-साथ हमारी सुरक्षा की गारंटी को मुहैया कराना, हमारे पड़ोशी देशों से सामना करने के लिए सैन्य-शक्ति को बढ़ाना, अधिक मात्रा में आजीविका उत्पन्न करने के लिए बड़े औद्योगिक संयन्त्रों का निर्माण करना हमारी प्राथमिकता रही| पर शायद यह भूल गये की व्यक्ति को खड़ा करने के लिए समाज की बुनियाद को मजबूत करना चाहिये| इतिहासकार धरमपालजी के विचार को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी समाज अपने स्वत्व में ही अपनी नियति को पहचान और पा सकता है| आज भी स्वदेशी व्यवस्थाओं पर देश-समाज को खड़ा करने के प्रयास हो रहे हैं|

महात्मा गॉंधी और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, इन दोनों के प्रयोगोंे को स्पष्ट करते हुये प्रो. रे ने बताया की गॉंव की बुनियाद में जो चार चीजें सबसे अहम् थीं उनमें विज्ञान, आध्यात्मिकता, कला और सामाजिक अर्थशास्त्र शामिल था| उक्त कार्यक्रम में फाउण्डेशन के कार्यकर्ता तथा समाज कार्य स्नातकोत्तर अभ्यासक्रम के छात्र उपस्थित थे|

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