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Articles - महिला शान्ति-सेना और शान्ति-सैनिक

न्या. चन्द्रशेखर धर्माधिकारी अपनी आगवी शैली के माध्यम से युवा पीढ़ी में गॉंधीजी के विचारों को प्रस्थापित करने के लिये जाने जाते है| महिला सशक्तीकरण के संदर्भ में आपके विचार गॉंधीजी और दादा धर्माधिकारीजी के सर्वोदय समाज की बुनियाद पर खड़े होते है| महिला शांति सेना और शांति सैनिक विषयक आपका यह लेख पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे है|- सम्पादक

महात्मा गॉंधी ने सन् १९३८ में शान्ति-सेना की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा था: कुछ दिन पहले मैंने पीस ब्रिगेड अर्थात शान्ति-सेना की कल्पना रखी थी| इस सेना के लोग जान पर खेलकर, जान की बाजी लगाकर कार्य करेंगे, खासकर साम्प्रदायिक फसादों और जातीय दंगों के वक्त! यद्यपि यह कल्पना महत्त्वाकांक्षी लगेगी, लेकिन शान्तिमय तथा अहिंसक प्रतिकार की शक्ति के लिए ऐसी सेना आवश्यक है जो पुलिस और मिलिट्री की आवश्यकता को महसूस ही न होने दे| गॉंधीजी ने सन् १९४६ में आयोजित शान्ति-सम्मेलन में इसका पुनरुच्चार किया था|

७ अप्रैल, १९४६ को हरिजन में शान्ति-सेना के स्वरुप को स्पष्ट करते हुए गॉंधीजी ने लिखा था - शान्ति-सेना नैमित्तिक नहीं, एक स्थायी कल्पना है| शान्ति-सैनिक मरीजों की सेवा करने का प्रशिक्षण लेगा, लोगों को खतरों से उबारने का प्रशिक्षण लेगा और स्वयं को खतरे में डालकर भी उन स्थानों की निगरानी करेगा, जहॉं चोरों और डकैतों का आतंक होगा और उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देगा| शान्ति सैनिक को अहिंसा के लिए प्राणोत्सर्ग करने की कला सीखनी होगी|

महात्मा गॉंधी द्वारा प्रस्तुत शान्ति-सेना की इस अवधारणा को हमें साकार करना है| लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए यह जरूरी है कि जिस समस्या को हम हल करना चाहते हैं, उसे गहराई तक जाकर समझने की कोशिश करें|

आज जो चारों तरफ हिंसा-प्रतिहिंसा दिखायी पड़ रही है, वह हिंसा के आधार पर विकसित वर्तमान आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना की ही फलश्रुति है| इसलिए हमें समाज में शान्ति-स्थापना के लिए अशान्ति की सतह पर दिखायी दे रहे कारणों के निराकरण की योजना बनाने के साथ-साथ बुनियाद से अहिंसा की एक नयी व्यवस्था और सांस्कृति विकसित करने की कोशिश करनी होगी| इसके लिए हमें कुछ विशेष मुद्दों पर काम करना होगा| हमारी अगली पीढ़ी को युद्ध की वेदना और दु:ख से मुक्ति मिले, इसके लिए हमें बुनियादी परिवर्तन लाना होगा; अपनी मान्यताओं और मूल्यों में परिवर्तन लाना होगा| समाज में पारस्परिकता बढ़े, सामाजिक समन्वय और सहयोग बढ़े, न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक आचऱण का अभ्यास बढ़े, मानवीय अधिकार, सहिष्णुता और एकता की बुनियाद पर शान्ति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकें, ऐसी कोशिश हमें करनी होगी| इसके लिए हमें बच्चों में ही नहीं, बल्कि पूरे समाज की मानसिकता में बदलाव लाना होगा| समाज में यह विश्‍वास विकसित करना होगा कि समस्याओं का हल हिंसा, युद्ध और फौज की शैली से नहीं हो सकता, अहिंसक प्रक्रिया से ही हो सकता है| महात्मा गॉंधी की शहादत के बाद जनरल मैकआर्थर ने कहा था - गॉंधीजी ने जो विचार प्रकट किया, उसी के द्वारा दुनिया के सवाल हल होंगे, युद्ध से नहींं| महात्मा गॉंधी ने जीवनभर अहिंसा के सामाजिक मूल्य विकसित करने के प्रयोग किये और हमें एक नयी दिशा बतायी| हमें उस दिशा में आगे बढ़ना है| महिला शान्ति-सैनिकों के लिए, विशेष तौर पर उनकी अपनी तैयारी की दृष्टि से मैं कहना चाहता हूँ कि गॉंव में संघर्ष की परिस्थिति पैदा न हो, इस ओर ध्यान देना होगा| आपस में समझौता और समाधान कराने का प्रयास करें, शान्ति स्थापित करे| इसके लिए -

१) हर महिला शान्ति-सैनिक को खादी की एक ड्रेस बनवानी चाहिए| खादी अहिंसा के आर्थिक विचार-दर्शन की प्रतीक है| शोषणरहित वस्तु ही स्वदेशी होती है, इस अर्थ में खादी-ग्रामोद्योग द्वारा उत्पादित वस्तुएँ ही स्वदेशी होती हैं|

२) हर शान्ति-सैनिक को गहराई से यह समझना होगा कि अहिंसा-संस्कृति की बुनियाद भोग पर नहीं, त्याग पर आधारित होगी| तभी समाज में समत्व, समदर्शिता, समवर्तन, समन्वय और अद्वैत एवं आस्तिकता की संस्कृति का विकास होगा|

३) हर महिला शान्ति-सैनिक को यह बात अच्छी तरह समझनी होगी कि उसे निर्भय, निवैर और निष्पक्ष रहना है और स्वयं में इतना आत्मविश्‍वास विकसित करना है ताकि वह स्वरक्षित बने| स्वरक्षित व्यक्ती ही सुरक्षित होता है|

४) पुरुषों ने बलात्कार का हथकंडा इसलिए अपनाया ताकि स्त्रियों के मन में भय और आतंक बना रहे तथा स्त्रियॉं उनकी गुलामी से मुक्त न हो सकें| महिला शान्ति-सैनिकों को यह समझना होगा कि आबरु शारिरिक नहीं, मानसिक होती है| बलात्कार और अत्याचार से स्त्री की आबरु नहीं जाती| स्त्री को डरकर जीने की आदत छोड़नी होगी| मुक्ति के लिए पूरी तरह निर्भय होना होगा|

५) व्यसन-मुक्ति, शान्ति-सैनिक का एक प्रमुख कार्य होना चाहिए| यह मात्र नैतिक प्रश्‍न नहीं है| व्यक्ति, परिवार और समाज जीवन को अहिंसक और शान्तिमय बनाने के लिए व्यसन-मुक्ति अनिवार्य है| व्यसन के कारण गरीबों की कमाई का आधे से अधिक शराब आदि में खर्च होता है| इसी के कारण स्त्रियों पर अत्याचार बढ़ते है| व्यसनों का व्यापार गरीब के खिलाफ पूँजीवादी समाज द्वारा रचा गया एक षड्यंत्र है, ताकि उसकी गरीबी और बदहाली कभी समाप्त ही न हो| व्यसन अशान्ति का भी कारण है|

६) वर्तमान समाज, देश और दुनिया में पूँजीवाद का षड़यंत्र गरीब आदमी के पेट से जुड़ा है| हमें पूँजीवाद की अर्थ-रचना को बदलकर श्रम-आधारित सृजनात्मक अर्थ-रचना खड़ी करनी होगी| कृषि और उस पर आधारित खादी-ग्रामोद्योग इस दिशा में आगे बढ़ने के महत्त्वपूर्ण माध्यम होंगे| इसके लिए उत्पादक परिश्रम स्थापित करनी होगी|

७) जाति, धर्म, पंथ, सम्प्रदाय के भेदों को मिटाने और समाज में परस्पर सौहार्द विकसित करने के लिए निरंतर महिला शान्ति-सैनिक को काम करना होगा|

८) मनोरंजन के नहीं, संजीवन के कार्यक्रमों द्वारा समाज में परस्पर सौहार्द, सहयोग और आपसदारी बढ़ाने का काम करना चाहिए| यह काम हर प्रकार के दबाव के खिलाफ भावनात्मक विद्रोह के रुप में होगा|

९) बच्चों में अहिंसक संस्कृति के संस्कार पैदा करने होंगे| उनके बीच लड़ाई-झगड़े के नहीं, सहयोग के, प्रेम के अवसर उपलब्ध कराने होंगे| इसी दृष्टि से उनके शिक्षण, खेल-कूद, नृत्य, संगीत आदि के कार्यक्रम तैयार करने होंगे| उनके खिलौने भी ऐसे ही होने चाहिए जो हिंसक प्रवृत्ति जगाने के बदले, शान्ति की संस्कृति के पोषक हों|

१०) महिला शान्ति-सैनिकों को दहेज के बाजार में जानेवालों को रोकना होगा| बाल-विवाह न हो, इसके लिए भी माहौल बनाना होगा| यद्यपि देश में दहेज और बाल-विवाह रोकने के कानून हैं, लेकिन उनके अनुकूल सामाजिक माहौल नहीं बन पाया है| और, जिस कानून को आम लोगों की स्वीकृति और समर्थन नहीं होता, वह कानून बनता जरुर है, लेकिन टिकता नहीं, लुढ़क जाता है| शादियों में होनेवाले खर्च पर बंधन डालकर शादी सुलभ, सस्ती और आसान बने, ऐसा माहौल बनाना होगा; वरना अप्रत्यक्ष रुप से दहेज का बाजार पनपेगा और स्त्री की दोयम भूमिका कभी समाप्त ही नहीं होंगी| दहेज और शादी के भारी खर्च के कारण पुत्री के जन्म का स्वागत नहीं होता है| और, जिसके जन्म का स्वागत नहीं होता, उसकेे मरण का भी दु:ख नहीं होता| ऐसे में स्त्री सशक्तीकरण की बात भी कोई मायने नहीं रखती|

११) गॉंधीजी के कथनानुसार, मरीजों की सेवा करने हेतु फर्स्टएड का प्रशिक्षण ही नहीं, घरों में, देहातों में संतान का जन्म सुविधापूर्वक हो सके, इन सब कार्यों का प्रशिक्षण लेकर इन महिला शान्ति-सैनिकों को बेअर फुट नर्स या आया बनने की क्षमता प्राप्त करनी होगी, ताकि घर तक ही नहीं, बल्कि चूल्हे तक भी शान्ति-सैनिक पहुँच सकें|

हमारे संकल्प होंगे

१) ऐसी प्रथाओं का त्याग करना, जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों|

२) सारा चराचर एक परिवार बने और उसमें रहनेवाले सारे जीवनधरियों तथा निसर्ग और समस्त सृष्टि से रिश्ता कायम हों|

३) ग्राम का अर्थ है, ऐसा क्षेत्र जिसके निवासियों में परस्पराभिमुख और पारस्परिकता हो|

४) समाज को कोई भी व्यक्ति कोई-न-कोई समाजोपयोगी परिश्रम किये बगैर नहीं रहेगा| परिश्रम उत्पादक होगा, लेकिन उत्पादन सिर्फ बाजार के लिए नहीं होगा; दुकान के लिए नहीं, मकान के लिए होगा| पड़ोसी की आवश्यकता की पूर्ति को प्राथमिकता दी जायेगी| हमारा अपना जीवन स्वावलम्बी होगा और वितरण का आधार सहोपभोग और सहभाग होगा|

५) सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार तख्त, तिजोरी या तलवार नहीं होंगे| सिर्फ खरीददार को, हड़पने वालों को या छीनने वालों को वस्तु उपलब्ध नहीं होगी| वह जरूरतमंद को मिलेगी| सत्ता, सम्पत्ति और शस्त्र का आधिपत्य समाप्त होगा|

६) धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, जाति या स्त्री-पुरुष भिन्नता पर आधारित नागरिकता निषिद्ध तथा लोकद्रोही मानी जाएगी|

७) स्त्री-पुरुष के समतुल्य और समकक्ष होगी| दोनों के सहजीवन के संवादी मानव का प्रादुर्भाव होगा| दोनों की भिन्नता परस्परपूरक और पोषक मानी जाएगी|

८) हमारा विश्‍वास लोकतंत्र पर है| ग्रामस्वराज्य उसकी नींव है, यह भी हमारा विश्‍वास है| इसकी बुनियादी वोट है, जो नागरिक का सतीत्व है| वह खरीदा या बेचा नहीं जाएगा, न ही धर्म, जाति आदि के आधार पर हड़पा जायेगा, क्योंकि लोकतंत्र का अधिष्ठान लोक-सम्मति है| वोट इसका प्रतीक है| वह सामाजिक शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है| लोकतंत्र में सत्ता की राजनीति उत्तरोत्तर क्षीण होगी| लोकनीति बलिष्ठ होगी| उसके लिए नागरिक के पराक्रम और अभिक्रम का विकास करना आवश्यक है|

९) साधारणत: हमारी नीति राज्य के साथ सहयोग की होगी| परन्तु जिस राजनीति का रुख लोकनीति के प्रतिकूल प्रतीत होगा, वहॉं संवैधानिक, शान्तिमय साधनों से इसका प्रतिकार करना हर नागरिक का कर्तव्य होगा|

१०) परिवर्तन तथा शान्ति स्थापित करने की प्रक्रिया में सभी संवैधानिक तथा शान्तिमय साधनों का प्रयोग करने में हमारा विश्‍वास है| शस्त्रप्रयोग तथा किसी भी हिंसक साधन को हम निषिद्ध मानते हैं| इसके लिए शस्त्रनिरपेक्ष वीरता का विकास करने के लिए प्रशिक्षण का प्रबंध किया जाएगा|

११) मूलभूत सम्पत्ति पृथ्वी के गर्भ में है और पर्यावरण एवं जलाशयों से उसका संवर्धन होता है| उसके विवेकपूर्ण उपयोग से उस सम्पत्ति का उत्कर्ष किया जाएगा| सारा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, संयोजन जीवन-केन्द्रित होगा और मनुष्य उसकी केन्द्रीय विभूति माना जायेगा| मानवीय विकास के लिए अन्य जीवनधारी, वनस्पति तथा सृष्टि के सह-विकास का दर्शन हमारा आधारभूत दर्शन होगा| यही विकास और उत्पादन की प्रक्रिया का भी आधारभूत तत्त्व होगा|

१२) अस्पृश्यता, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, पंथ-भेद का जीवन में स्थान नहीं होगा| स्त्री-पुरुष समानता में हमारा विश्‍वास है और सभी प्रकार के शोषण और विषमता के प्रति हमारा विरोध है|

१३) मूलभूत संवैधानिक अधिकार के साथ संविधान में निर्देशित नागरिक के मूल कर्तव्य का पालन करना हमारा कर्तव्य होगा|

१४) शान्तिसेना का विश्‍वास वीरवृत्ति पर है, वैरवृत्ति पर नहीं, और इस वीरवृत्ति का अधिष्ठान अहिंसा होगी; हिंसा नहीं|

१५) इन संकल्पों के आधार पर शान्ति-सैनिक, समाज में संघर्ष की स्थिति पैदा ही न हो, इस पर ध्यान देंगी और अपनी जान पर खेलकर शान्ति प्रस्थापित करने की भरसक कोशिश करेंगी| यह शान्ति-सैनिक का व्रत है और कर्तव्य भी है|

- न्या. चन्द्रशेखर धर्माधिकारी

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