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Articles - महिला उत्थान में गॉंधीजी का योगदान

जीवन के प्रत्येक क्रियाकलापों में स्त्रियों का प्रभुत्व सकारात्मक रहा है| आज की स्त्री भविष्य की अधिकारी हैं आज के विकास की धुरी है| किन्तु कहीं न कहीं समाज की असामाजिकता सामने आती है तब उनका अधिकतर शिकार स्त्रियॉं ही होती हैं| गॉंधीजी का लक्ष्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना रहा जहॉं शांति और आनन्द का वास हो| परन्तु यह तभी संभव है जबकि समाज का हर पुरुष एवं हर स्त्री समाज के प्रति अपने कर्तव्य एवं दायित्व को समझे| उन्होंने अपने जीवन के दौरान स्त्री उन्नति के अथक प्रयास किये| रचनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से, स्वदेशी के माध्यम से और स्वराज्य प्राप्त करने की एक शक्ति के रूप में महिलाओं को सम्मिलित किया| महिला उत्थान में गॉंधीजी के योगदान पर प्रकाश डालता यह लेख पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं|- सम्पादक

गॉंधीजी असाधारण रूप से महान पुरुष थे| वे केवल राजनीतिक नेता नहीं थे, वे उच्च कोटि के समाज सुधारक, सत्यशोधक, आध्यात्मिक साधक, अर्थशास्त्री, शिक्षाशास्त्री और लेखक तथा विचारक थे| उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाए रखी थी| जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके निजी दृष्टिकोण का कोई मुकाबला नहीं था| गॉंधीजी का दर्शन समग्र जीवन का दर्शन है|

गॉंधीजी ने एक आदर्श समाज की कल्पना की थी| ऐसा समाज जहॉं भाईचारा, सत्य, अहिंसा और प्रेम का वास हो| जहॉं सबकी उन्नति की बात कही गई है| एक स्वस्थ और सुव्यवस्थित समाज के लिए उस समाज में रहने वाले प्रत्येक स्त्री और पुरुष का अपना-अपना दायित्व एवं कर्तव्य है जो उस समाज को दृढ़ बनाता है| किन्तु इतिहास साक्षी है कि भारतीय समाज हजार वर्षोर्ंें से बहुत भीषण एवं अनगिनत कुरीतियों से जकड़ा पड़ा है| ये सामाजिक कुरीतियां भारतीय जनता को अपने चुंगल में जकड़े हुए है| पुरुष प्रधान समाज में नारी के व्यक्तित्व को बहुत सीमित कर दिया है| नारी को देवी मानकर उसकी आराधना तो की जाती है पर उसकी स्वतंत्रता के विषय पर एक प्रश्न चिह्न लगा दिया जाता है| गॉंधीजी कहते हैं कि ‘समस्त रूढ़ियॉं और सामाजिक नियम केवल पुरुषों द्वारा बनाए गए हैं और वे सभी स्त्रियों के विरुद्ध हैं| मगर, लंबी गुलामी एवं प्रताड़ना की वजह से स्त्रियॉं हीन भावना से ग्रासित हो गई हैं| उसने भी पुरुषों को अपने से श्रेष्ठ एवं अपना स्वामी मान लिया है और अपने आपको उसके रहमोकरम पर छोड़ दिया है|’१

गॉंधीजी स्त्री एवं पुरुष को समान अवसर देने के पक्ष में थे| उन्होंने लिखा है मैं स्त्री पुरुष की समानता में विश्वास रखता हूं| इसलिए स्त्रियों के लिए उन्हीं अधिकारों की कल्पना कर सकता हूं जो पुरुषों को प्राप्त है|२

परन्तु पुरुष प्रधान समाज सदा स्त्रियों पर अत्याचार करता आया है| उसे अबला कहकर उसका अपमान करता है आज भी पुरुष अपने को स्त्री से श्रेष्ठ समझता है| उसपर अपना अधिकार जमाता है, अपनी संपत्ति समझता है| यही भावना स्त्री-वर्ग में विद्रोह ला देती है| गॉंधीजी इस परिस्थिति से दुःखी थे| उन्होंने कहा कि पुरुष और स्त्री में आत्मा तो एक है, दोनों का दर्जा समान है, पर वे एक नहीं हैं| वे ऐसी अनुपम जोड़ी हैं जिसमें प्रत्येक एक दूसरे का पूरक है| वे एक दूसरे के लिए आश्रयरूप हैं| यहॉं तक कि एक के बिना दूसरे की हस्ती की कल्पना ही नहीं की जा सकती| इन तथ्यों से यह जरूरी निष्कर्ष निकलता है कि जिस बात से दोनों में से एक का भी दर्जा घटेगा उससे दोनों की बराबर बरबादी होगी|३

किसी भी सुदृढ़ एवं स्वस्थ समाज के लिए यह महत्त्वपूर्ण होता है कि उसमें स्त्रियों की सामान्य स्थिति क्या है? वे समाज की विभिन्न समस्याओं एवं अपने कर्तव्य तथा दायित्व के प्रति कितनी जागरूक हैं| क्योंकि एक समाज को स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर ही पूर्ण बनाते हैं| गॉंधीजी एक सफल द्रष्टा होने के कारण उन्होंने नारी की समस्या को समझा और इसके समाधान के सरल मार्ग निकाले| नारी की समस्या के सन्दर्भ में गॉंधीजी के विचारों एवं कार्यों को दो स्तर पर रखकर देखा जा सकता है- १) स्त्रियों के प्रति परम्परागत समस्याओं के सम्बन्ध में उनके विचार और २) राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में एवं राष्ट्रीय विकास के कार्यो में स्त्रियों की सहभागी बनाने की दिशा में उनके प्रयास|

स्त्रियों के सम्बन्ध में गॉंधीजी के दृष्टिकोण को उनके सामान्य जीवन-दर्शन के अंतर्गत रखकर ही ठीक तरह से समझा जा सकता है| उनका जीवन-दर्शन सत्य एवं अहिंसा पर आधारित है जिसमें किसी भी तरह के भेदभाव अथवा ऊँच-नीच की भावना के लिये कोई स्थान नहीं है| गॉंधीजी ने स्त्रियों की उन्नति को अपने रचनात्मक कार्यक्रम में शामिल किया| अहिंसा की नींव पर रची हुई समाज-व्यवस्था में स्त्री को अपने भाग्य का विधान करने का उतना ही अधिकार है जितना पुरुष को| मई १९१९ की सुरत की एक सभा में महिलाओं को सम्बोधित करते हुए गॉंधीजी ने कहा कि ‘हिन्दुस्तान में जिस हद तक पुरुष सांसारिक, धार्मिक और राजनीतिक मामलों में भाग लेते हैं, जब तक स्त्रियॉं उस हद तक भाग नहीं लेंगी तब तक हमें भारत भाग्योदय के दर्शन नहीं हो सकेंगे|’४ गॉंधीजी भारत में आने के साथ ही महिलाओं को राजनीति में प्रवेश का अवकाश प्राप्त हुआ, कांग्रेस के इतिहास में पहली बार ऐसी घटना हुई जहॉं कांग्रेस की स्थापना के ४० साल के बाद एक भारतीय महिला ने कांग्रेस का नेतृत्व किया| गॉंधीजी की प्रेरणा से सरोजिनी नायडू ने १९२५ के कानपुर कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया|

गॉंधीजी ने अपने आन्दोलन को सक्रिय और सफल बनाने के लिए स्त्री शक्ति को भी साथ मिलाया| ६ अप्रैल १९३० को गॉंधीजी ने दांडी में नमक कानून तोड़कर सत्याग्रह आरम्भ किया| महिलाओं के लिए सन्देश में उन्होंने कहा: मेरा विश्वास दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता जा रहा है कि स्वाधीनता की प्राप्ति में स्त्रियॉं पुरुषों से अधिक सहायक हो सकती हैं, क्योंकि अहिंसा का अर्थ वे पुरुषों से अधिक समझती हैं| यह इसलिए नहीं कि वे अबला हैं बल्कि इसलिए कि सच्चे त्याग और साहस की भावना उनमें पुरुषों से कहीं अधिक है|५ उन्होंने एक सफल द्रष्टा और व्यावहारिक होने के कारण राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में एवं राष्ट्रीय विकास के कार्यों में स्त्रियों को सहभागी बनाने की दिशा में जो प्रयास किये, वे अनुपम हैं|

महात्मा गॉंधी ने देश की स्वतंत्रता के लिए स्त्री शक्ति का आह्वान किया तो हजारों की संख्या में अमीर-गरीब, साक्षर-निरक्षर स्त्रियॉं देश के काम के लिए घरों से बाहर निकल पड़ीं| जो स्त्रियॉं कभी चौके, चूल्हे से बाहर नहीं निकली थीं, वे पुरानी मर्यादाओं पर विश्वास रखनेवाली बूढ़ी स्त्रियॉं सभी के सभी शक्ति और साहस लेकर अपार जन समुद्र में कूद पड़ीं| वे अनपढ़ होते हुए भी सत्याग्रहियों के बड़े-बड़े दल की कप्तानी करती थीं|

महिलाएं और स्वदेशी- व्रत

स्वतंत्रता आन्दोलन में जनसामान्य की राष्ट्रीय भावनाओं को जगाने के लिये गॉंधीजी ने खादी और चरखे को दो महत्त्वपूर्ण प्रभावी प्रतीकों के रूप में उपयोग किया| खादी और चरखा आत्मनिर्भरता के प्रतीक थे| उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे अपने तन से विदेशी वस्त्रों को उतार फेंके तथा खादी की साड़ी पहनें| गॉंधीजी ने १३ मई, १९१९ को स्वदेशी-व्रत पर पहला पत्रक लिखा| उसकी भूमिका में लिखा कि ‘स्वदेशी का आधार बहनों का है| मुझे आशा है कि हजारों-हजार बहनें विदेशी वस्त्रों का त्याग करके स्वदेशी का व्रत लेंगी| देश को बहनों से यह उम्मीद भी रखने का अधिकार है कि वे अपने बच्चों को स्वदेशी वस्त्र पहनाने लगेंगी|’६

असहयोग जैसे बड़े आन्दोलन को सफल बनाने का एक ही तरीका रहा और वह था स्वदेशी व्रत| विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार का ऐलान करने से पहले गॉंधीजी ने स्वावलंबन के प्रतीक रूपी चरखे की सामुदायिक पहचान बनायी| असहयोग आन्दोलन की सफलता ने यह सिद्ध कर दिखाया की स्वदेशी व्रत इस युग का महाव्रत है| इस महाव्रत को सफल करने में महिलाओं का बड़ा योगदान था| केवल एक अमोघ हथियार चरखे के माध्यम से बहनों ने असहयोग आन्दोलन को सफल किया था| ९ अक्तूबर, १९२० को बम्बई के भगिनी समाज ने मारवाड़ी विद्यालय के भवन में गॉंधीजी के ५२ वें जन्म-दिवस का उत्सव मनाया| उत्सव में महिलाएँ बड़ी संख्या में सम्मिलित हुई थीं| उसकी अध्यक्षता श्रीमती जाईजीबाई पेटिट ने की| श्रीमती पेटिट ने गुजराती में लिखा हुआ गॉंधीजी का सन्देश पढ़ा| सन्देश में उन्होंने कहा था, मैं नहीं समझ सका कि मेरे जन्म दिवस से महिलाओं का क्या सम्बन्ध है और भारतीय स्त्रियॉं मेरे किस गुण के कारण मुझे मानती हैं| इस सम्बन्ध में विचार करने पर मैं अनुभव करता हूं कि वे मेरे प्रेम के कारण ही मुझे मानती हैं| वे जानती हैं कि मैं हृदय से उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना चाहता हूं और उसकी रक्षा का सबसे आसान तरीका जो मैंने उन्हें बताया है, वह है स्वदेशी| स्वदेशी का प्रचार करने में स्त्रियॉं जितनी सहायक हो सकती हैं, उतने पुरुष नहीं|७

काका साहेब कालेलकर ने तो यहॉं तक कह दिया कि ‘राष्ट्रहित के अनेकानेक सवालों में स्त्री-दृष्टि की विशेष आवश्यकता है| घर चलाने में जो उच्च दृष्टि स्त्रियॉं रखती हैं वही दृष्टि अगर देश के महत्त्व के कामों में रखी जाय तो देश का भला होगा|’८ महात्मा गॉंधी ने स्वराज्य के अपने विश्वतोन्मुखी आन्दोलन में स्त्रियों को खींच लिया, उनमें आत्म-विश्वास पैदा किया और आखिरी दिनों में उन्होंने कस्तूरबा ट्रस्ट जैसी संस्था भी स्त्रीजन-उद्धार के लिए स्थापित कर दी|

स्त्री एवं अहिंसा

गॉंधीजी अहिंसा के पुजारी थे उनका मानना था कि स्त्री पुरुष से अधिक कारगर रूप से अहिंसा का पालन करती है| उन्होंने कहा कि स्त्री अहिंसा का अवतार है| अहिंसा का अर्थ है असीम और अनंत प्रेम, दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कष्ट सहने की अपार क्षमता| गॉंधीजी ने इतना तक कह दिया ‘अगर अहिंसा हमारे जीवन का ध्यानमंत्र है, तो कहना होगा कि देश का भविष्य स्त्रियों के हाथ में है|’९ गॉंधीजी के विचार से स्त्री की श्रद्धा के साथ पुरुष की श्रद्धा की कोई तुलना नहीं हो सकती| क्योंकि ‘स्त्री और पुरुष में चरित्र की दृष्टि से स्त्री का आसन ज्यादा ऊँचा है, आज भी वह त्याग, मूक तपस्या, नम्रता, श्रद्धा और ज्ञान की मूर्ति है|’१०

प्राचीन काल का इतिहास देखने से मालूम होता है कि किसी समय दुनियां में कहीं-कहीं स्त्री-प्रधान समाज व्यवस्था भी थी| बच्चे माता के नाम से जाने जाते थे| स्त्रियॉं राज्य भी करती थीं और युद्ध में लड़ती भी थीं| लेकिन स्त्री-प्रधान समाज व्यवस्था टिक न सकी| बच्चों की परवरिश का अपना मातृधर्म संभालने के लिए स्त्री ने बहुत त्याग किया| उसके साथ समाज का नेतृत्व पुरुष को देकर वह अनुयायी बनने को भी तैयार हुई| इस संदर्भ में गॉंधीजी का नजरिया बेहद सकारात्मक रहा उन्होंने कहा कि स्त्री के इस प्रेम को पूरी तरह मानवता तक विकसित कर देना चाहिए| उसे भूल जाना चाहिए कि वह पुरुष की वासना का लक्ष्य थी अथवा हो सकती है| इस प्रकार वह पुरुष की मॉं, उसकी निर्मात्री और निःशब्द नेता के रूप में उसके बराबर अपना गौरवपूर्ण स्थान ग्रहण करेगी| युद्धों में उलझी दुनियां को प्रेम एवं शांति की कला सिखाना उसी से संभव है|११

युगपुरुष महात्मा गॉंधी के विचार सृष्टि से पता चलता है कि उन्होंने स्त्री को साक्षात् त्याग की मूर्ति और शक्ति का प्रतीक कहा जो सारे संसार का उद्धार कर सकती है| उन्होंने स्वयं कहा ‘स्त्री जाति में जो अपार शक्ति रही है उसका कारण उसकी विद्वत्ता अथवा उसका शरीर बल नहीं है, बल्कि उसका मुख्य कारण उसमें पाई जाने वाली तीव्र श्रद्धा, वेगवती भावना और अत्यन्त त्याग तथा सहन करने की शक्ति है| स्त्री स्वभाव से ही कोमल और धार्मिक वृत्ति की है और जहॉं पुरुष श्रद्धा खोकर ढीला पड़ जाता है अथवा गलत हिसाब करने में उलझ जाता है, वहॉं स्त्री धीर बनकर दृढ़ गति से सीधे मार्ग पर जाती है’|१२

भारतीय राजनीति में १९२० से १९४८ का समय गॉंधी युग कहलाता है| इस समय में गॉंधीजी भारत के शिखर पुरुष के रूप में रहे और उन्होंने भारतीय जीवन के सभी क्षेत्रों पर अपना प्रभाव डाला| उनके द्वारा संचालित राष्ट्रीय आन्दोलन ने भारतीय महिलाओं में अभूतपूर्व जागृति उत्पन्न की| कस्तूरबा गॉंधी, अरुणा आसफ अली, कमला नेहरू, सरोजिनी नायडू, विजय लक्ष्मी पंडित, कमला देवी चट्टोपाध्याय, सुभद्रा कुमारी चौहान, मीरा बेन और अनेक महिला सेनानी जिनका नाम तक अज्ञात है|

सत्य एवं अहिंसा की नींव पर निर्मित नवीन विश्व-व्यवस्था की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरुष को अपने भविष्य की रचना का है उतना और वैसा ही अधिकार स्त्री को भी अपना भविष्य तय करने का है|१३ गॉंधीजी के इस विचार से अगर देखा जाये तो इतना अवश्य कह सकते हैं कि सृष्टि की अनुपम रचना है नर-नारी| स्त्री और पुरुष दोनों का अस्तित्व संसार में कायम है| एक के बिना दूसरा अधूरा है| वास्तव में प्राकृतिक दृष्टिकोण से दोनों को एक-दूसरे की चाहत व जरूरत है| दोनों संसार के नियामक हैं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी के संवाहक, सशक्त व जीवंत माध्यम है| समाज में दोनों की स्थिति व परिस्थिति सम्माननीय है| दोनों परिवार की बुनियाद तथा संस्कृति व सभ्यता की पहचान है|

सन्दर्भ -

१) हरिजन, २४ फरवरी १९४०; २) किशोरलाल मशरूवाला, गॉंधीविचार दोहन, पृ. सं. ३९; ३) एकला चलो रे पृ. ६५-६६; ४) सं. गॉं. वा. खण्ड १५, पृ. सं. ३३१; ५) नवजीवन, ६-४-१९३०; ६) सं. गॉं. वा. खण्ड १५, पृ. सं. ३१६; ७) सं.गॉं.वां. खण्ड १८, पृ. सं. ३६०; ८) काका कालेलकर, गॉंधीजी का रचनात्मक क्रांतिशास्त्र, खण्ड १, स्त्री-जनों का स्थान, पृ. २१३; ९) महात्मा गॉंधी: व्यक्तित्व और विचार, पृ. १; १०) स्त्रियॉं और उनकी समस्यायें, पृष्ठ सं. ६; ११) फौजिया परविन, गॉंधी दर्शन में नारी स्वातंत्रता पृ. सं. १२८; १२) किशोरलाल मशरूवाला, गॉंधी विचार दोहन, पृ. सं. ४०; १३) रचनात्मक कार्यक्रम, नवजीवन प्रकाशन. पृ. ३२-३४

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