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Articles -सेवाग्राम आश्रम

ईश्वर प्राप्ति गॉंधीजी के जीवन का ध्येय था इसलिए उन्होंने आश्रमी जीवन की संकल्पना का निर्माण दक्षिण अफ्रीका के दिनों से ही किया था| वे मानते थे की आश्रम यानी सामुदायिक धार्मिक जीवन मेरी ही प्रतिमा है| ऐसे उद्गार उनके मुंह से कई बार निकलते थे| मनुष्य मात्र की सेवा करना ही उनके आश्रम का उद्देश्य था| इसलिए एकादश व्रत को केन्द्र में रखकर वर्धा स्थित छोटे से गॉंव में उन्होंने आश्रम स्थापित किया| आश्रम में सुबह-शाम नियमित प्रार्थना होती थी| अनाज दलना, पानी भरना, रसोई बनाना, पाखाना साफ करना आदि किसी न किसी प्रकार के शरीरश्रम के बिना किसी को भोजन नहीं मिलता था| आश्रम में सभी जाति-धर्म को समान स्थान मिलता था| किसी भी जाति के लोग यहॉं आकर रह सकते थे| सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, शरीरश्रम, निर्भयता, सर्व-धर्म-समत्व, स्वदेशी व अस्पृश्यता निवारण ऐसे ११ व्रतों की प्रयोगशाला थी आश्रम|

वे कहते थे कि ‘मैं क्या हूं, यह यदि आप जानना चाहते हैं तो मेरा सेवाग्राम का जीवन आप देखिये तथा यहॉं के वातावरण का अध्ययन कीजिये|’९

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