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Articles -रचनात्मक कार्य में महाराष्ट्र का योगदान

‘मैं महाराष्ट्र के और महाराष्ट्रियों की आशा कभी नहीं छोड़ सकता| जिस महाराष्ट्र ने निरंतर भारतभूमि को त्याग का और ज्ञान का पाठ सिखाया है वह महाराष्ट्र गरीबों के चरखे का और खादी का अनादर कभी नहीं करेगा|’३ उनकी यह ख्वाहिश सदैव रही कि स्वराज्य पाने का साधन चरखा और खादी है, और महाराष्ट्र इस कार्य में प्रथम स्थान प्राप्त करें| महाराष्ट्र ने यह उत्तरदायित्व बखूबी निभाया और गॉंधीजी की उम्मीदों पर खरा उतरा| उसका प्रमाणपत्र भी गॉंधीजी ने ही दिया| उन्होंने लिखा कि ‘मैं अपने कुछ मित्रों की इस आशंका से कि महाराष्ट्र चरखा और कताई संबंधी संदेश को प्रेम से नहीं अपनायेगा, कभी सहमत नहीं था| अब तक जो चन्दा इकट्ठा हुआ है मेरे अनुमान से बहुत ज्यादा है|’४ रचनात्मक कार्य को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र में उन्होंने प्रमुख संस्थाओं की स्थापना भी की| सेवाग्राम में हिन्दुस्तानी तालीमी संघ, वर्धा के मगनवाडी में ग्रामोद्योग संग्रहालय, कृषि, गौशाला, विद्यालय, खादी उत्पादन, अस्पृश्यता निवारण, अस्पताल, गृह उद्योग की शिक्षा आदि महाराष्ट्र में किये गये मुख्य रचनात्मक कार्य हैं|

अस्पृश्यता निवारण के लिए गॉंधीजी यह मानते थे कि किसी भी मंदिर को सबके लिए खुला रखना ही सही मायने में उस मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा है| गॉंधीजी ने हरिजनों का मंदिर में प्रवेश करवा कर धर्म की संकुचितता का अंत किया और यह पवित्र कार्य भी महाराष्ट्र की पावन भूमि पर हुआ|

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