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Articles - महाराष्ट्रमय महात्मा

महाराष्ट्र में गॉंधीजी के राजनीतिक नेतृत्व और अहिंसा के आन्दोलन के प्रति प्रबल विरोध और निराशा की भावना भी दिखायी दी थी| दूसरी ओर दिनों दिन बढ़नेवाला एक वर्ग गॉंधीजी के विचारों से प्रभावित व प्रेरित भी होता गया| यही महाराष्ट्र ने गॉंधीजी को पहला व्यक्तिगत सत्याग्रही दिया, यही महाराष्ट्र जिन्होंने गॉंधीजी को तिलक स्वराज फंड, खादी फंड, हरिजन फंड आदी में दोनों हाथों से रचनात्मक कार्य के लिए दान दिया| महाराष्ट्र के अन्य शहरों के अनगिनत नेताओं ने महात्मा गॉंधी के मार्गदर्शन में स्वतंत्रता के आंदोलन को आगे बढ़ाया| गॉंधीजी ने भी अपने आंदोलन का केंद्र महाराष्ट्र को बनाया था और गॉंधी युग में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र सेवाग्राम आश्रम बना था| गॉंधीजी और महाराष्ट्र के इस अद्वितीय संबंध के कुछ रोचक घटनाक्रम को दर्शाता प्रस्तुत है यह लेख|- सम्पादक

गॉंधीजी जैसे महान कर्मवीर को समझने के लिए उनके द्वारा लिखे हुए लेख, किताबें, पत्रों, सामयिक, वर्तमान पत्रों में दिये हुए उनके लेख, गॉंधीजी के भाषण-संदेश, गॉंधीजी पर उनके साथियों द्वारा लिखे लेख, सांप्रत समय में गॉंधीजी पर लिखी जाने वाली किताबें एवं चर्चा के आधार पर वाचक वर्ग इस महापुरुष को समझने का प्रयत्न करते हैं|

हम जानते हैं कि गॉंधीजी समग्र मानव जाति के मार्गदर्शक और समाज का नवनिर्माण करने वाले महापुरुष रहे हैं| उच्चतम शिक्षा इंग्लैंड में, सत्याग्रह का बीजारोपण हुआ दक्षिण अफ्रीका में, व उनके इस वटवृक्ष का विकास हुआ समग्र भारत में| गॉंधीजी ने अपने जीवनकाल के दौरान बहुत बार भारत का प्रवास किया व सत्याग्रह मंत्र का प्रसार व आचरण किया| भारत का कोई प्रान्त ऐसा नहीं होगा जहॉं गॉंधीजी स्वयं न गये हों| परंतु योगानुयोग गॉंधीजी के जीवन का ज्यादातर समय और उनके कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र के हिस्से में जाता है| गॉंधीजी का जीवन महाराष्ट्र के साथ एकरूप हो गया था| यहॉं पर महाराष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में उनके बृहत जीवन को दर्शाना शायद संभव नहीं है, केवल उनकी एक झॉंकी ही प्रस्तुत कर रहे हैं|

महाराष्ट्र गॉंधीजी के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर चला| जेल में, उपवास में, प्रार्थना में, आश्रम की स्थापना व संचालन में, सभी में उत्कृष्ट सहकार्य किया| गॉंधीजी के तत्त्वज्ञान का, आंदोलन का व व्यक्तित्व का प्रभाव भारत के सभी राज्यों पर पड़ा है| पर महाराष्ट्र से उनका संबंध साधक और बाधक दोनों स्वरूप से व दीर्घकालीन रहा है| उनके राजकीय गुरु महाराष्ट्र से, आध्यात्मिक जीवन की स्फूर्ति मिली महाराष्ट्र से, और प्राणघातक महापातक निर्माण हुए वह भी महाराष्ट्र से| गॉंधीवाद के भाष्यकार जितने महाराष्ट्र में हुए हैं उतने शायद ही कहीं और जगहों में हुए हैं| और गॉंधीजी के आलोचक जितने महाराष्ट्र में मिलते हैं उतने दूसरी जगहों में सहज ही नहीं मिलेंगे| उसके बावजूद महाराष्ट्र, वहॉं के लोग व साधु-संतों को उनके प्रति गॉंधीजी को सदैव प्रेम ही उमड़ता था| राजकीय मार्ग संबंधी मतभेद होगा, पर महाराष्ट्र के नेता, संस्था, वहॉं की गतिविधियॉं सभी के लिए गॉंधीजी को गौरव था| महाराष्ट्र का त्याग, धैर्य, विद्वत्ता व कार्यकुशलता की प्रशंसा गॉंधीजी ने मुक्त कंठ से की है| वह अपना तात्त्विक विरोध कितने ही तीव्रता से प्रकट करते होंगे पर गुण-ग्रहण के बीच में विरोध को कभी नहीं आने दिया|

महाराष्ट्र के प्रति गॉंधीजी के मन में बहुत आदर था| उन्होंने कहा थाः ‘महाराष्ट्र अच्छे और दृढ़चित्त कार्यकर्ताओं का मधु-छत्ता है| महाराष्ट्रियों की कार्यकुशलता, उनके स्वार्थ-त्याग की भावना और विद्वत्ता की जानकारी मुझे है| महाराष्ट्र में जो शक्ति है, वह हिन्दुस्तान के अन्य किसी भी भाग या क्षेत्र में नहीं है| आत्मक्लेश और त्यागवृत्ति ये दो गुण महाराष्ट्र के पास हैं, यह मैं अच्छी तरह जानता हूं|१ इससे यह पता चलता है कि महाराष्ट्र के प्रति गॉंधीजी को अप्रतिम विश्वास था|

गॉंधीजी महाराष्ट्र से प्रभावित थे| यहॉं के लोग, यहॉं की संस्कृति, रीति-रिवाज, जीवनशैली आदि मामलों में महाराष्ट्र एक असरकारी प्रभाव छोड़ता है| गॉंधीजी को महाराष्ट्र में आना हमेशा अच्छा लगता था, वे कहते थे ‘लोकमान्य तिलक महाराज की जन्मभूमि में जाना- जहॉं आधुनिक काल में वीर पुरुषों का जन्म हुआ, जहॉं शिवाजी हो गये हैं, जहॉं रामदास और तुकाराम ने गाया है, वहॉं जाना मेरे लिए तो तीर्थयात्रा करने के समान ही है|’२

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