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Articles - सत्य के साथ संगति

गॉंधीजी एक सत्य साधक के रूप में विकसित हो रहे थे, लगातार नई समझ प्राप्ति के आधार पर अपने दृष्टिकोण में बदलाव ला रहे थे| इस विषय के संदर्भ में समय-समय पर उनके द्वारा दिये गये बयानों में विरोधाभास भी दिखायी दिया है| किन्तु वे सत्य के प्रति अपनी निष्ठा पर गंभीर रूप से टिके हुए थे, सत्य के पुजारी के नाते उनके लिए वे स्वयं गलत हो सकते हैं पर सत्य, सत्य है| उनके संदर्भ में अपना स्थान लेते हुए वे कहते हैं कि ‘उत्साही पाठक को तथा मेरे लेखों में दिलचस्पी लेने वाले दूसरे लोगों को मैं यह बता देना चाहता हूं कि मेरे लेख सदा सुसंगत ही प्रतीत हों, इसकी मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है| सत्य की खोज में मैंने कई विचार त्याग दिये हैं और कई नई बातें सीखी हैं| वृद्ध हो जाने पर भी मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरा आन्तरिक विकास रुक गया है या देह के नाश के बाद मेरा विकास रुक जायेगा| प्रतिक्षण मैं सत्यरूपी नारायण की आज्ञा मानने के लिए ही तैयार रहता हूं| इसलिए मेरे किन्हीं भी दो लेखों में यदि किसी भी कोई असंगति लगे और उसका मेरी विवेकशीलता में विश्वास हो, तो उसके लिए एक ही विषय पर लिखे दो लेखों में से बाद के लेख को चुनना ही अच्छा रहेगा|’११

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