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Articles - गॉंधीजी और अंग्रेजी साम्राज्य

परम श्रद्धेय स्व. भवरलालजी जैन गॉंधीजी के विचार से प्रेरित रहे| आपका मानना था कि गॉंधीजी के प्रति फैली भ्रमित मान्यता का प्रत्युत्तर शोध संस्थान के रुप में गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन की ओर से देना ही चाहिए| ऐसा करने से वास्तविक स्थिति लोगों के सामने आयेगी और विश्वसनीय तथ्य से लोग परीचित होंगे| गॉंधीजी व अंग्रेजी साम्राज्य - इस विषय को यथासंभव न्याय देने के लिए संपूर्ण गॉंधी वांड़्मय एवं अन्य आधारभूत प्राथमिक साहित्य से निकाले गये संदर्भ के आधार पर, स्व. भवरलालजी जैन के मार्गदर्शन में तैयार किया गया विस्तृत शोध लेख का संक्षेप लेख पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं|- सम्पादक

भारतीय संदर्भ में आलोचना का स्थान हमेशा रहा है, किसी भी घटना एवं व्यक्ति के संदर्भ में यह प्रबल रूप से देखा गया है| चाहे आध्यात्मिक, राजनीतिक, सामाजिक क्षेत्र क्यों न हो बहस हमेशा छिड़ती है| संविधान के अनुच्छेद १९(१) के तहत सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है, किन्तु उनकी गरिमा भी अवश्य होती है| गॉंधीजी को लेकर कई सारी चर्चाएं सामने आती हैं, चाहे वह महात्मा शीर्षक से हो, या राष्ट्रपिता सम्मान से, समय-समय पर सुधी समाज उनकी परीक्षा लेता रहा है| कितने सारे चर्चित सवालों में हमने गॉंधीजी को उलझ डाला है| हम कोई एक समय व एक घटना के आधार पर किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन नहीं कर सकते| कुछ समय पहले एक बुद्धिजीवी व्यक्ति ने गॉंधीजी को एक बार फिर कटघरे में ला कर खड़ा कर दिया और कहा गॉंधीजी ब्रिटिश सल्तनत के एजेन्ट थे| आइये, हम थोड़ा नजदीक से विश्लेषण करते हुए प्रामाणिक संदर्भ के आधार पर इस आलोचना को समझने का प्रयास करते हैं|

अंग्रेजी सल्तनत के साथ गॉंधीजी के संबंध के संदर्भ में, हम कालानुक्रम आधारित दो तरह के दृष्टिकोण का मूल्यांकन कर सकते हैं| १) पूर्वार्ध १९१९ और २) उत्तरार्ध १९१९ पूर्वार्ध १९१९ सन् १९१९ से पहले अंग्रेजी सल्तनत के साथ गॉंधीजी के व्यवहार को समझने के लिए किये गये पत्र व्यवहार, संवाद एवं आत्मकथा के कुछ अंश, साथ-साथ अंग्रेजी अफसर की ओर से आये प्रत्युत्तर का अध्ययन करना जरूरी बन जाता है| प्रस्तुत है विषय के अनुरूप कुछ महत्त्वपूर्ण पत्रों एवं अन्य सामग्री|

१९०१ में जोहानिसबर्ग में एशियाइयों से व्यवहार करने के लिए एक भारतीय प्रवास-कार्यालय खोला गया था| उस संबंध में गॉंधीजी ने सैनिक गवर्नर कर्नल कॉलिन मैकेंजी को खत लिखा, वे लिखते हैं कि ‘हम बताना चाहते हैं कि अब तक सम्राट के अधिकारियों के साथ हमारा सीधा व्यवहार किसी शिकायत के बिना चलता रहा है और हमें भय है कि इस नये परिवर्तन से हमारे बहुत-से-साथी, प्रजाजनों में असन्तोष होगा|... हम सदैव वफादार रहे हैं और अब तक की भांति सीधे साम्राज्यीय अधिकारियों के अधीन रहना चाहते हैं, जिनके व्यवहार और दयालुता की हम बहुत सराहना करते हैं| हमें भरोसा है कि परमश्रेष्ठ इस मामले पर गम्भीरता से विचार करेंगे और हमारी विनीत प्रार्थना स्वीकार कर लेंगे|’

गॉंधीजी अपने व्यवहार के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अपनी एवं अपने बंधुओं की वफादारी प्रकट करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते थे| उस वक्त वे मानते थे कि ब्रिटिश साम्राज्य जगत का कल्याण करनेवाली सल्तनत है, इस वजह से राजनिष्ठा में वे हमेशा अग्रगामी रहते थे| उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में वे लिखते हैं कि ‘शुद्ध राजनिष्ठा जितनी मैंने अपने में अनुभव की है, उतनी शायद ही दूसरे में देखी हो| मैं देख सकता हूँ कि इस राजनिष्ठा का मूल सत्य पर मेरा स्वाभाविक प्रेम था| इससे व्यक्तिगत लाभ उठाने का मैंने कभी विचार तक नहीं किया| राजभक्ति को ऋण समझकर मैंने सदा ही उसे चुकाया है|’१

चाहे बोअर युद्ध हो या जुलु विद्रोह वे हमेशा ब्रिटिश राज्य के प्रति अपनी वफादारी प्रगट करने के लिए चिकित्सा टीम के साथ उस युद्ध में घायलों की मदद करने पहुंचे थे| वे मानते थे कि ब्रिटिश प्रजाजन के नाते अधिकार मॉंगते हैं, तो उसी नाते ब्रिटिश राज्य की रक्षा में हाथ बँटाना भी वे अपना धर्म समझते थे| इस सेवा की सराहना करते हुए १९०३ लन्दन की सभा में सर वि. वेडरबर्न ने अपने भाषण में कहा था कि ’इस बात को सबने स्वीकार किया है कि हाल के पूरे संकट में भारतीयों ने अपने-आपको राज्य के प्रति वफादार और उपयोगी नागरिक साबित किया है और लड़ाई के दरमियान बीमारों और घायलों की बहुत उपयोगी सेवाएं की हैं|२

उस वक्त गॉंधीजी यह पक्के तौर पर मानते थे कि हिन्दुस्तान की सम्पूर्ण उन्नति ब्रिटिश साम्राज्य के अन्दर रहकर हो सकती है| उनका उद्देश्य यह भी था कि इस मदद के कारण हम अपने ध्येय तक शीघ्र ही पहुँच सकेंगे और उनके साझेदार बन जाने से रंगभेद तथा देशभेद का नाम-निशान भी मिट जायेगा| वे लिखते हैं कि ‘यदि आत्मबल को अर्थात् प्रेमबल को शस्त्रबल के बदले लोकप्रिय बनाने में मैं सफल हो जाऊँ, तो मैं मानता हूँ कि हिन्दुस्तान सारे संसार की टेढ़ी नजर का भी सामना कर सकता है| अतएव हर बार मैं दुःख सहन करने की इस सनातन नीति को अपने जीवन में बुन लेने के लिए अपनी आत्मा को कसता रहूँगा और इस नीति को स्वीकार करने के लिए दूसरों को निमंत्रण देता रहूँगा, और यदि मैं किसी अन्य कार्य में योग देता हूँ, तो उसका हेतु भी केवल इसी नीति की अद्वितीय उत्तमता सिद्ध करना है|... मैं चाहता हूँ कि जो वफादारी एक अंग्रेज में है वही वफादारी हर एक हिन्दुस्तानी में जागे|’३

अगर हम स्वातंत्र्य संग्राम की ऐतिहासिक घटनाओं को देखें तो पता चलता हैं कि कॉंग्रेस की स्थापना भी अंग्रेजी साम्राज्य के भीतर रहते हुए अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए की गई थी| तिलक तक किसी ने भी स्वराज की बात प्रस्तुत नहीं की थी| उनमें गॉंधीजी भी थे जिन्होंने स्वराज्य के लिए अंग्रेजों से संवाद करने की शुरूआत की थी| उस दौर में अंग्रेजों के साथ उनका व्यवहार कर्तव्य के आधार पर सही था| क्योंकि वहॉं उद्देश्य कर्तव्य परायणता के माध्यम से अपने देश-बंधुओं के अधिकार प्राप्त करना था| और उसमें गॉंधीजी सही थे अन्यथा दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए इतना बड़ा जन सैलाब उनके साथ न होता|

उत्तरार्ध १९१९

१३ अप्रैल, १९१९ यह तारीख विश्व के बड़े नरसंहारों में से एक के रूप में दर्ज है| अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में अंग्रेजों द्वारा की गई बर्बरता की घटना ने गॉंधीजी को हिला दिया| इस क्रूरता भरी घटना से कभी न अस्त होनेवाले ब्रिटिश साम्राज्य के मनसूबे लोगों के सामने आ चुके थे|

जलियांवाला हत्याकाण्ड के बाद गॉंधीजी के विचार एवं कार्यप्रणाली में आमूल परिवर्तन आया| गॉंधीजी के असहयोग आंदोलन का सार था, अंग्रेजी अदालतों, शिक्षण-संस्थाओं, कौंसिलों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार| अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ समग्र वातावरण तैयार हो रहा था, असहयोग आन्दोलन में मुख्यतः स्वावलंबन एवं संगठन के संकल्प को साकार करने के लिए गॉंधीजी ने चरखे को स्वावलंबन का प्रतीक एवं विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के माध्यम से, अंग्रेजी सल्तनत को चक्रव्यूह के दायरे में लाकर डायरशाही के कृत्य का अहिंसक प्रत्युत्तर देते हुए ब्रिटिशराज के खिलाफ आगाज़ छेड़ दिया था| वे कहते थे कि ‘जो साम्राज्य फौजी शासन के द्वारा फैलाये गये आतंक के लिए जिम्मेदार हो, जो साम्राज्य अपनी गलतियों के लिए पश्चाताप करने को तैयार नहीं है, जो साम्राज्य गम्भीरता पूर्वक दिये गये अपने वचनों को भंग करके गुप्त सन्धियां करे, ऐसे साम्राज्य को अधर्मी ईश्वर का कोई खयाल न रखने वाला साम्राज्य ही कहा जा सकता है| अतः उसके प्रति निष्ठा रखना ईश्वर के प्रति अनिष्ठा होगी|’४

वे लिखते हैं कि ‘हम सरकार की सत्ता को इसलिए चुनौती देते हैं कि हम उसकी शासन-प्रणाली को बिलकुल बुरी प्रणाली मानते हैं| हम इस सरकार का तख्ता उलट देना चाहते हैं| हम उसे लोकमत के आगे झुकने को मजबूर कर देना चाहते हैं| हम यह दिखाना चाहते हैं कि सरकार का अस्तित्व प्रजा की सेवा के लिए होता है; प्रजा सरकार की सेवा के लिए नहीं होती|’५ ब्रिटिश साम्राज्य की अच्छाइयों में गॉंधीजी का विश्वास क्रमशः डिगता चला गया| पंजाब की घटनाओं ने गॉंधीजी की साम्राज्य-भक्ति को डिगा दिया था, अब वह ऐसे जन-संघर्ष का नेतृत्व करने जा रहे थे, जिसका उद्देश्य देश से विदेशी शासन को समाप्त करना था| जिस साम्राज्य का उन्होंने गौरव-गान किया था, जिस साम्राज्य की लड़ाइयों को, अहिंसावादी होने के बावजूद, अपना मानकर उन्होंने मदद की थी, उसी साम्राज्य के खिलाफ राजद्रोह के अनचाहे रास्ते पर वे आ चुके थे| ‘यंग इंडिया’ के १५ दिसम्बर, १९२१ के अंक में उन्होंने लिखा था लॉर्ड रीडिंग को यह बात समझ लेनी चाहिए कि असहयोग करनेवाले सरकार से जंगी लड़ाई लड़ रहे हैं, और उन्होंने सरकार के खिलाफ बगावत कर दी है| ये वही गॉंधीजी थे, जिन्होंने १९१५ के अप्रैल महीने में मद्रास की एक सभा में अपार हर्ष के साथ ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति अपनी वफादारी को दुहराते हुए कहा कि ‘आज की संध्या के इस महान और महत्त्वपूर्ण सम्मेलन में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति पुनः अपनी वफादारी की घोषणा करते हुए मुझे अत्यन्त हर्ष हो रहा है|... और आपसे इस साम्राज्य की समृद्धि की कामना करता हूं|’६

वे लिखते हैं कि ‘हमारी लड़ाई अंग्रेजों से व्यक्तिशः नहीं है|... हम उस प्रणाली को अवश्य नष्ट करना चाहते हैं जिसने हमारे देशवासियों के शरीर, मन और आत्मा को दुर्बल बना दिया है|’७ असहयोग ब्रिटिश राज से किया जा रहा था, लेकिन अंग्रेजों से नफरत या बुरा व्यवहार करने की कड़ी मनाही थी| गॉंधीजी ने बार-बार इस बात की घोषणा की थी कि वे किसी भी अंग्रेज के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे जैसा अपने सगे भाई से नहीं कर सकते| और कई सैद्धांतिक प्रश्‍नोंें पर असहयोग तो वह अपने सगे भाई से भी कर चुके थे| वे कहते हैं ‘मैं अपने किसी भी अंग्रेज भाई को शैतान नहीं कहता| मैं श्री शौकत अली और श्री दास को जिस तरह प्यार करता हूं, उसी तरह अंग्रेजों को भी करता हूं| लेकिन मैं इतना ही कहता हूं कि यह शासन शैतान का शासन है| मैं सरकार को सुधारे बिना चैन नहीं लूंगा| मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं आज सरकार के राजद्रोह अधिनियम का भंग कर रहा हूं| मैं इस सरकार की राजभक्त प्रजा हूं और उसका सच्चा मित्र भी हूं, और इसलिए सरकार से कहता हूं कि या तो वह अपने को सुधार ले या फिर नष्ट होने को तैयार रहे|’

‘एक समय था जब राजनिष्ठा में मैं अंग्रेजों से भी आगे बढ़ जाने का प्रयत्न करता था| मैंने लगन के साथ मेहनत करके अंग्रेजों के राष्ट्रगीत ‘गॉड सेव दि किंग’ की लय सीख ली थी| जब वह सभाओं में गाया जाता, तो मैं अपना सुर उसमें मिला दिया करता था| लेकिन आज मैं इस गीत को अपने हृदय पर हाथ रखकर नहीं गा सकता और किसी को गाने के लिए भी नहीं कह सकता| एक व्यक्ति के रूप में सम्राट जॉर्ज बहुत जियें, ऐसा मैं कहूंगा, लेकिन जिस साम्राज्य ने मनुष्य और भगवान के आगे अपने को गिरा दिया है वह एक क्षण के लिए भी टिके ऐसी कामना मैं नहीं कर सकता|’८

दिसम्बर, १९२० में जहाज पर गुरखाओं के साथ बातचीत में वे कहते हैं ‘मैं ऐसी स्थिति उत्पन्न करना चाहता हूँ जिसमें प्रत्येक अंग्रेज प्रत्येक भारतीय को अपना समकक्षी माने| अंग्रेज अभिमान के शिखर पर चढ़कर बातें करता है, उसे मैं नीचे जमीन पर उतारकर यह खयाल दिलाना चाहता हूं कि हिन्द का सामान्य-से-सामान्य मजदूर भी उसके समकक्ष है| अपने किसी भी व्यवहार में वह भारतीय की अवगणना न करे, अपने सारे व्यवहार में वह उसे अपना समान भागीदार समझे, मैं ऐसी स्थिति उत्पन्न करना चाहता हूं| इससे भिन्न दूसरी किसी भी शर्त पर हिन्दुस्तानी में उसके लिए स्थान नहीं है| अंग्रेज और भारतीय दोनों में परस्पर समतुल्य होने की भावना का प्रसार हो, वे उसका साक्षात्कार करें- इतना भर होने से मैं समझूंगा कि मेरे देश को स्वाधीनता मिल गई|’९

भारत में अंग्रेजी राज्य पर इतने कड़े आरोप लगाने के बाद भी उन्होंने जो निष्कर्ष निकाला वह बड़ा ही अद्भुत था| भारत को कुचलने का दोषी ब्रिटिश राज्य नहीं, विदेशी सभ्यता थी, जिसने इस तरह की शासन-प्रणाली को जन्म दिया था| उनकी दृष्टि में सारी अंग्रेज जाति उस सभ्यता से पीड़ित और उसकी शिकार बनी हुई थी, वह घृणा की नहीं दया की पात्र थी| इसलिए वह विजेताओं पर आध्यात्मिक विजय की बात किया करते थे| उन्होंने कहा भी था, ‘ब्रिटिश सरकार के प्रति अपनी वफादारी जाहिर करने में मेरा स्वार्थ ही है| मैं अंग्रेज जाति के जरिए अहिंसा का महान संदेश फैलाना चाहता हूं|’१०

सन् १९१९ के पूर्व गॉंधीजी अंग्रेजों के एक उत्साही वफादार रहते हुए भीतरी अधिकारों के लिए लड़ रहे थे| और सन् १९१९ के बाद अंग्रेजी सल्तनत हमारे लिए खतरा रूप है, उनके खिलाफ जयघोष होना चाहिए, इस उद्देश्य से उनको भारत छोड़ने के लिए लड़े|

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