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Articles - महात्मा गॉंधी और दान

दान देने और लेने में सच्ची परीक्षा तो लेनेवाले की ही होती है, क्योंकि छिपे तौर पर लोग यह भलीभांति देख सकते है कि दिये हुए दान का कैसा उपयोग किया जाता है| गॉंधीजी के नेतृत्व में कुछ खास बात थी उन्होंने अपने आचरण में पारदर्शिता एवं सत्यनिष्ठा का प्रदर्शन किया| यह कसौटी के आधार पर लोगों ने गॉंधीजी को यथायोग्य दान दिया था| हालांकि गॉंधीजी चाहते तो दो-चार धनवानों से ही ज्यादा दान प्राप्त कर सकते थे इसके लिए इतनी यात्रा, इतने लोगों से मिलने की आवश्यकता नहीं रहती थी| पर गॉंधीजी का कार्य करने का तरीका ही ऐसा था कि लोग सीधे तौर पर उनके लक्ष्य से जुड़ जाते थे| गॉंधीजी ने अपने जीवन में करीब ३० से ज्यादा छोटे बड़े फंड एकत्रित किये थे| सन् १९१५ से १९१७ तक एकत्रित किए गये कुछ फंड का ब्यौरा यहॉं हम प्रस्तुत कर रहे है|- सम्पादक

विश्व में अभी भी सभी मनुष्यों के लिए न्यायिक अर्थव्यवस्था नहीं बनी| आवश्यकता से ज्यादा खर्च करना और बिगाड़ने की वृत्ति भावी पीढ़ी या प्रकृति को नुकसान करती है| अमीर और गरीब के बीच में निर्मित हुई इस विराट खाईर्ं का परिणाम लहू के साथ हिंसक क्रान्ति के अलावा और कुछ नहीं होगा| इस परिस्थिति का एक ही उपाय है स्वैच्छिक त्याग और दान|

आज जब अतिरिक्त एक-एक पैसे की विश्व को जरूरत है, तब अतिरिक्त राशि अपने पास रखना गुनाह है, पाप है| गॉंधीजी का ट्रस्टीशिप का सिद्धांत, मनुष्य की मनुष्यता में उनको पूर्ण श्रद्धा निर्माण कराता था| साथ-साथ मनुष्य के हृदय में स्थित लालच एवं स्वार्थ से भी वह परिचित थे| उन्होंने कहा था कि समाज में अमीरों की जिम्मेदारी ज्यादा है| सभी संपत्ति आपकी नहीं है, समाज की है| आवश्यक है उतना लीजिए, बाकी निर्बल लोगों को अर्पण कर दो| जितना आपने समाज से प्राप्त किया है उससे अधिक समाज को प्रदान करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है|

‘देश, समय एवं योग्य व्यक्ति या संस्था को ध्यान में रख कर, उपकार व मुनाफे की आशा के बगैर, कर्तव्य का और समाज का ऋण अदा करने की सोच रखकर जो भी दान दिया जाता है वही दान सच्चा दान है| विनोबाजी ने यह सभी धर्म ग्रंथों का अध्ययन करके दान का अर्थ सरल शब्दों में समझाया है|’१

गॉंधीजी कहते हैं शुरुआत के दौरान राजकीय भँवर में मैं आ चुका था फिर भी अनीति, असत्य और राजकीय हित से नितांत अस्पष्ट रहने के लिए क्या करना चाहिए? यह प्रश्न मैंने अपने आपसे करने के बाद शुरुआत के समय में ज्यादा संघर्ष में से गुजरना पड़ा| पत्नी और बच्चों के साथ संघर्ष भी हुआ, फिर भी अंत में मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि अगर लोगों की सेवा करनी है तो मुझे संपत्ति और अन्य सभी आवश्यक चीज-वस्तुओं का त्याग करना चाहिए| शुरुआत की चर्चा दु:खदायक होने के बावजूद एक समय ऐसा आया जब त्याग मेरे लिए आनन्द का विषय बन गया| मेरे कन्धों से बड़ा बोझ हलका हो गया| मैं आज़ाद बना और निश्चिंंतता से सेवा कर सका|

सन् १९१५ के पूर्वार्ध में गॉंधीजी दक्षिण अफ्रीका से भारत आये| हिन्दुस्तान की भूमि गॉंधीजी के लिए मातृभूमि थी, किन्तु हिन्दुस्तान वासियों के लिए गॉंधीजी अपरिचित व्यक्ति से कम नहीं थे| पर दक्षिण अफ्रीका में किये गये कार्यों ने उनका परिचय दे दिया था| हालांकि यह भी उतना ही सच है कि दक्षिण अफ्रीका में किए गये कार्यों के माध्यम से उन्होंने विश्व के सामने हिन्दुस्तान की एक नयी पहचान बनाई| हिन्दुस्तानियों के दिलों में स्वराज की एक अलख जगायी| हिन्द से दूर रह कर भी वह समूचे हिन्द को सँवार रहे थे|

भारतीय लोक-जीवन में गॉंधीजी का प्रवेश इस युग की, शायद सबसे बड़ी घटना है| वह हमारे जीवन में ज्योति-धारा के रूप में आये, उन्होंने हमारी आत्मा को स्पर्श किया| इसका परिणाम भी ऐसा हुआ, जैसा पहले नहीं सुना गया था, उसने प्रत्येक देशवासी के मर्म को गहराई में जाकर स्पर्श किया| यह पहला मौका था, जब देश के सभी वर्गों के लोग मिल खड़े हुए थे| विश्व के इतिहास में ऐसी दूसरी घटना नहीं है जिसमें असहाय मानव समाज, इस प्रकार इतने थोड़े समय में, स्वाभिमान के साथ अपने पैरों पर उठ खड़ा हुआ हो|

भारत में आते ही गॉंधीजी ने देश के विभिन्न भागोंे में दौरा किया, उनके द्वारा किये गये फंड एकत्रित करने के प्रयास ने सामाजिक एकता एवं समानता का एक श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत किया| महात्मा गॉंधी जैसा शायद ही कोई विरला होगा जिन्होंने सार्वजनिक कार्य के लिए इतना फंड लोगों के पास से प्राप्त किया होगा| फंड प्राप्त करना शायद एक दफा सरल हो सकता है किन्तु लोगों को दान देने के लिए तैयार करने की कला गॉंधीजी में बखूबी देखी जा सकती है| दान देने के लिए भिन्न धर्म के भिन्न जाति के अमीर और गरीब दोनों को एक मंच पर लाने का उन्होंने अधिश्रेष्ठ कार्य किया| दान देने के इस यज्ञ में उन्होंने निर्बल समुदाय को सम्मिलित कर उनका स्वाभिमान जगाया|

लोग गॉंधीजी को इतना फंड क्यों देते थे? ऐसे बहुत सारे किस्से मिलेंगे जहॉं एक ही सभा में पैसों की बारिश होने लगी उतना फंड लोगों ने दिया| महिलाओं ने अपने गहने तक उतारकर दे दिये| इस स्थिति को समझने के लिए हमें व्यक्ति के इर्दगिर्द फैले तरंगों को समझना आवश्यक है| क्योंकि मनुष्य के सारे सामाजिक और व्यक्तिगत संस्कार उस जलवायु और भौगोलिक परिस्थिति के अनुरूप बनते हैं, जिसमें जितना हृदय-बल, मनोबल और इच्छा शक्ति होती है, उसी मात्रा में उसका व्यक्तित्व कम या अधिक मात्रा में अपने इर्दगिर्द के तरंगों का व्याप्त कर सकता है| सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह के उन महाव्रतों के तरंगों ने व्रतनिष्ठ गॉंधी का निर्माण किया और यह प्रभाव इतना गहरा था कि व्रतरूपी सकारात्मक सामग्री उसके चारों और सदैव बनी रही|

गॉंधीजी ने जैसे भारत में आगमन किया, लोग उनके लिए सम्मान कार्यक्रम आयोजित करते थे| पैसों की थैली, मानपत्र आदि के द्वारा गॉंधीजी का सम्मान किया जाता था| इन सभी घटनाओं से गॉंधीजी सेवा के क्षेत्र को विस्तृत कर रहे थे| वह कहते हैं ‘सत्ता या हुकूमत का क्षेत्र बहुत छोटा रहता है| मगर सेवा का क्षेत्र तो बहुत बड़ा है| वह उतना बड़ा है कि जितनी बड़ी धरती है| उसमें अनगिनत कार्यकर्ता समा सकते हैं|’२

उनके राजनैतिक गुरु गोखले चाहते थे कि गॉंधीजी मुंबई में स्थायी रूप से अपना आश्रम खोलें और यहॉं पर ही हमेशा के लिए रहेंे| आश्रम के लिए अहमदाबाद का चयन किया गया| किन्तु गोखले की अमीदृष्टि गॉंधीजी पर हमेशा रही| ‘यह निश्चित है कि आपको आश्रम के लिए पैसा मुझी से लेना है| उसे मैं अपना ही आश्रम समझूँगा’ गोखले ने आश्वासन देते हुए गॉंधीजी को कहा|३ और गॉंधीजी के लिए पैसे उगाहने के धन्धे से मुक्ति मिल गयी| वह कहते थे ‘मेरा अनुभव तो मुझसे यह कह रहा है कि कोई भी हलचल केवल धनाभाव से न तो गिरती, न अटकती या न निस्तेज ही होती है| इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी हलचल संसार में बिना रुपयों के ही चल सकती है| बल्कि उसका अर्थ यह जरूर है कि जहॉं पर सच्चे संचालक होते हैं, वहॉं रुपया अपने-आप चला आता है|’४

व्यक्ति दान करने के लिए प्रेरित तब होता है जब उनके पीछे भावना का बल रहता है| गॉंधीजी ने अपने प्रेम, विश्वास और आत्मत्याग की तीन सम्मिलित शक्तियों के साथ दान की संज्ञा धारण की थी| उन्होंने लेने के लिए फंड एकत्रित नहीं किया बल्कि देने के लिए किया| निर्बल वर्ग के उत्कर्ष के लिए किया, लोगों को दान देने की कला से वाकिफ करवाया| अप्रैल १९१५ में मद्रास के गुजरातियों के द्वारा आयोजित सत्कार समारोह में गॉंधीजी को पैसों की थैली से सम्मानित किया गया था| अपने प्रत्युत्तर में गॉंधीजी ने थैली को धन्यवाद पूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि वे कभी किसी से भी किसी प्रकार की भेंट नहीं लेते, और इसलिए वे उसे सार्वजनिक काम में खर्च करने के लिए दे देंगे|५

चम्पारन सत्याग्रह कि स्थिति ऐसी थी की बिना पैसे के कोई कार्य नहीं चल सकता था| अब तक की प्रथा सार्वजनिक काम के लिए जनता से धन प्राप्त करने की नहीं थी| जब भी पैसों की आवश्यकता आती थी, ब्रजकिशोर बाबू एवं उनका मण्डल जरूरत पड़ने पर अपनी जेब से तथा कुछ मित्रों से मदद करवा देते थे| गॉंधीजी का यह दृढ़ निश्चय था कि चम्पारन की रैयत से एक कौड़ी भी न ली जाये| साथ साथ यह भी तय किया कि इस जॉंच के लिए हिन्दुस्तान में सार्वजनिक चन्दा एकत्रित न किया जाये| वैसा करने पर यह जॉंच राष्ट्रीय और राजनीतिक रूप धारण कर लेगी| गॉंधीजी के मुंबई में बसे मित्रों ने १५ हजार रुपये की मदद का तार भेजा तो उन्हें भी अस्वीकार कर दिया| डॉ. प्राणजीवनदास मेहता ने बहुत सारे किस्से में गॉंधीजी को मदद की थी| चम्पारन में भी आवश्यकता के अनुसार डॉ. प्राणजीवनदास मेहता की मदद लेने का निश्चय हुआ| सत्याग्रह पद्धति में गॉंधीजी का यह नजरिया पहले से रहा कि गरीब से, कम से कम खर्च करते हुए, लड़ाई चलाई जाए और उनमें वह सफल रहे| चम्पारन सत्याग्रह ने एक अनूठी पद्धति से वहॉं के स्थानीय लोगों को नील से जुड़े समस्या से मुक्ति दिलाई|

परिवार की संकल्पना गॉंधीजी के लिए बृहद् थी, सारे विश्व को वह अपना परिवार मानते थे| इसलिए दक्षिण अफ्रीका में एवं भारत में भी उनका खुद का कोई घर नहीं रहा| आश्रम ही उनके लिए निवास स्थान बना रहा और आश्रम को आवश्यक फंड के लिए लोगों से अपील करते थे| चम्पारन सत्याग्रह की चहल-पहल से निकलकर आश्रम के लिए आवश्यक फंड भी जुटाये थे| उनकी अभिव्यक्ति लोगों के हृदयों को स्पर्श करती थी|

सत्याग्रह आश्रम में होनेवाले खर्च करीब १ लाख १८ हजार रुपये के लिए गॉंधीजी ने एक परिपत्र अपने सभी मित्र व परिचित को भेजा था| उनके माध्यम से फंड प्राप्त करने की अपील दर्शायी गयी| उन्होंने पारदर्शिता को अपने जीवन में विशेष महत्त्व दिया था| उस परिपत्र में वह लिखते हैं कि सत्याग्रह आश्रम तथा उससे सम्बन्धित कार्रवाइयों पर होने वाला खर्च इतने दिनों तक केवल मित्र समुदाय द्वारा स्वेच्छा से दी गई सहायता पर चला, लेकिन उसकी प्रवृत्तियॉं इतनी बढ़ गई हैं कि अब उसका खर्च बिना मांगे चल सकेगा, ऐसा नहीं जान पड़ता|... यह साहसिक योजना यदि आपको पसंद हो तो मुझे आपकी सहायता लेनी होगी, आपको भी यथाशक्ति मेरी सहायता करनी होगी तथा लोगों से भी इसके लिए कहना होगा| यदि आपकी इन सब प्रवृत्तियों में से अमुक प्रवृत्ति के लिए सहायता करने की इच्छा होगी तो आपके द्वारा दी गई रकम उसी पर व्यय की जायेगी| लेकिन अगर मेरी समस्त प्रवृत्तियों में पागलपन के सिवा आपको और कुछ दिखाई न दे तब भी आप लोगों में से, जो मुझे जानते हैं उनसे मेरी प्रार्थना है कि उन्हें मेरे आत्मिक संतोष की खातिर ही मदद करनी चाहिए| जबतक मुझे अपनी भूल मालूम नहीं पड़ेगी तबतक ये प्रवृत्तियॉं मेरी जीवन-डोर होंगी| इन प्रवृत्तियों में मेरी देश सेवा की वृत्ति की चरम परिणति है|६ सेवा का महत्त्व परिभाषित करते हुए गॉंधीजी लिखते हैं ‘जिस सेवा से चित्त को आनन्द नहीं मालूम होता, वह न सेवक को फलती है न सेव्य को सुहाती है| जिस सेवा से चित्त आनंदित होता है उसके सामने ऐशो-आराम या धनोर्पाजन इत्यादि बातें तुच्छ मालूम होती हैं|’७

वह फंड एकत्रित कर रहे थे साथ-साथ देश के लिए जिन्होंने अपना बलिदान दिया है उनके विचार व त्याग को लोगों के बीच में जिन्दा करते थे| जब जेतपुर में गोखले स्मारक कोष के लिए गॉंधीजी गये तब अपने भाषण में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘हम यहां चन्दा लेने के लिए ही नहीं आये हैं, यदि आपको स्वर्गीय गोखले के जीवन-कार्य से ऐसा लगे कि उन्होंने देश-सेवा की थी तो उनके स्मारक के लिए खोले गये कोष में आपको कुछ देना चाहिए, उसी हालत में आप इस कोष में कुछ रकम दें|’८ ऐसे ही उन्होंने लोकमान्य तिलक, चितरंजन दास, रविन्द्रनाथ टैगोर, मालवीयजी आदि महान लोगों के कार्य व स्मृति के लिए चन्दा एकत्रित करने का अतुल्य प्रयास किया था|

गॉंधीजी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके विरोधी भी उनकी कार्यदक्षता को स्वीकार करते थे| उनकी कार्य पद्धति अद्वितीय थी| इसलिए उनको मदद करने के लिए बहुत लोग सामने से प्रस्ताव रखते थे, समय-समय पर उनसे मिलते थे| बहुत बार ऐसा भी हुआ जहॉं गॉंधीजी जिसके खिलाफ सत्याग्रह कर रहे हैं उन्होंने उनको आर्थिक मदद भेजी हो| उनमें एक नाम है अंबालाल साराभाई, अंबालाल साराभाई अहमदाबाद के मिल मालिक, आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने भी आश्रम के लिए बड़ी राशि दान की थी| बिना कुछ बोले, बिना अपना नाम बताये सत्याग्रह आश्रम को तेरह हजार की राशि देने वाले अंबालाल साराभाई ही थे| जो आश्रम को चलाने के लिए एक साल के खर्च के समान था| ऐसे अनुभव उनको कई बार हुए इसलिए वह कहते हैं ‘अनुभवों के आधार पर मेरा यह विश्वास बन गया है कि यदि नीयत साफ हो तो संकट के समय सेवक और साधन कहीं न कहीं से आ जुटते हैं|’९

‘हिसाब रखने से विश्वास-अविश्वास का कोई सम्बन्ध ही नहीं है| हिसाब रखना यह स्वयं एक स्वतंत्र धर्म है| उसके बिना हमें अपने काम को ही मलिन समझना चाहिए|’१० गॉंधीजी अपने दाताओं को हमेशा खर्च का ब्यौरा भेजते थे और उनकी राय मांगते थे| दाताओं को यह यकीन दिलाते थे कि आपके द्वारा दिया गया फंड आपके द्वारा सूचित कार्य में ही खर्च किया जायेगा| जमनालाल बजाज ने १५०० रुपये भेजे साथ यह भी सुझाव दिया कि यह हिन्दी प्रचार में ही उपयोग किया जाए| गॉंधीजी ने प्रत्युत्तर देते हुए लिखा कि ‘मैं ऋणी हुआ हूं, आपका दान हिन्दी शिक्षा के प्रचार में ही रखा जायेगा| यदि दूसरे कोई इसी काम के लिए दान भेज देंगे और कुछ धन बचेगा तो आपका दान दूसरे कार्यों में भी खर्च किया जायेगा|’११

जहॉं प्रामाणिकता और निष्ठा से कार्य हुआ है या हो रहा है वहॉं आर्थिक मदद मिल ही जायेगी| इतना आत्मविश्वास गॉंधीजी के फंड आधारित कार्यों से मिलता है| सत्याग्रह का सिद्धांत है जालिम हमारे तन एवं धन का मालिक हो सकता है, किन्तु मन का कभी नही| मन स्वतंत्र रह सकता है इस ज्ञान में से सत्याग्रह के शास्त्र का जन्म हुआ है| शुद्धतम सत्याग्रह में किसी भी प्रकार की सुविधा के बगैर भी कार्य को अंजाम देने कि तैयारी होनी चाहिए| जहॉं यह निश्चिंतता आ गई वहॉं बहुत सारी मुश्किलों से हम छूट जायेंगे| इस प्रकार सत्याग्रह और आत्मशक्ति के बल पर महात्मा गॉंधी ने समूचे संसार को मुक्त कर शोषण-मुक्ति का नया द्वार खोल दिया| उन्होंने उच्च कोटि की देश-सेवा करने का एक भी अवसर व्यर्थ न जाने दिया| महात्मा गॉंधी ने भारत के करोड़ों गरीबों के दरवाजे पर उन्हीं की भाषा में दस्तक दिया| बहुत समय से भारतीयों के बंद द्वार सच्चा प्रेम व सत्य के स्पर्श मात्र से खुल गया|

स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान गॉंधीजी ने देश-भक्ति को चरमसीमा पर पहुँचा दी थी, देशवासियों को यह यकीन दिलाया कि स्वराज्य के लिए आपका योगदान महत्त्वपूर्ण है| स्वराज्य प्राप्त करने के प्रयास में आप अपनी यथाशक्ति के आधार पर योगदान प्रदान कर देश के प्रति अपनी आस्था को दृढ्ढ करें| उनकी विधि यही दर्शाती है कि राष्ट्र निर्माण में सभी का योगदान आवश्यक है| वह केवल स्वतंत्रता के लिए ही सत्याग्रह या रचनात्मक कार्यक्रम नहीं चला रहे थे बल्कि स्वाभिमानपूर्वक जीने के लिए लोगों को तैयार कर रहे थे| उन्होंने ऐसे कई उदाहरण स्थापित करते हुए, अपने कर्तव्य बोध का भरपूर परिचय भी दिया| वह कहते हैं ‘जब मनुष्य अपने-आप को समाज का सेवक मानेगा, समाज की खातिर धन कमायेगा, समाज के कल्याण के लिए उसे खर्च करेगा, तब उसकी कमाई में शुद्धता आयेगी| उसके साहस में भी अहिंसा होगी| इस प्रकार की कार्यप्रणाली का आयोजन किया जाए तो समाज मैं बगैर संघर्ष के मूक क्रांति पैदा हो सकती है’|१२ गॉंधीजी ने मनुष्य के इतिहास को ऊँचा उठाया, उसको जड़ युद्ध की कीचड़ भरी ज़मीन से उठाकर आध्यात्मिक संग्राम के उच्च शिखर पर ले गये| और यह क्रांति के तरंग आज सारा संसार अनुभव कर रहा है|

सन्दर्भ -

१) दान आपवानो अभिनव प्रयोग (गुज.) पृ. २९; २) हरिजन सेवक, १२-१०-१९४७; ३) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२) मो.क.गॉंधी, पृ. सं. ३४३; ४) दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास (२००४) मो. क. गॉंधी, पृ. सं. १४७;

५) सं.गॉं.वा, खण्ड १३, पृ. सं. ७१-७२; ६) सं.गॉं.वां. खण्ड १३, पृ. सं. ४६१; ७) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२) मो.क.गॉंधी, पृ. सं. १५८; ८) काठियावाड़ टाईम्स, ८-१२-१९१५; ९) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२) मो.क.गॉंधी, पृ. सं. २६३; १०) दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास (२००४) मो. क. गॉंधी, पृ. सं. १४१; ११) पत्रः जमनालाल बजाज को, सं.गॉं.वां. खण्ड १३, पृ. ४८८; १२) हरिजन सेवक, २४-८-१९४०.

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