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Articles - महात्मा गॉंधी - जनसम्पर्क के अलौकिक आदर्श

विश्व पटल पर महात्मा गॉंधी सिर्फ एक नाम नहीं अपितु शान्ति और अहिंसा का प्रतीक है, सामाजिक जीवन पर गॉंधीजी के संचार माध्यम का इतना प्रभाव था की उन्होंने भारतीय समाज में अद्भुत मूल्य सिंचन का कार्य किया| उनका संचार माध्यम शुद्ध, पवित्र एवं परिवर्तन का प्रेरक था| व्यक्ति, समूह, समुदाय एवं देश के लिए नयी आशा की किरण उसमें दिखायी देती थी| उनके संचार में अर्थसभरता, निरपेक्षता, शांति एवं अहिंसात्मक अभिगम महसूस होता था| जिस व्यक्ति के साथ वह कम्यूनिकेशन करते थे उस व्यक्ति के लिए सुखद एवं प्रेरणात्मक अनुभव होता था, उनके जीवन की हर एक गतिविधि उत्कृष्ट संदेश का साधन बनी| हाथ, मस्तिष्क एवं हृदय तीनों को स्पर्श करता उनका संचार मानव समुदाय के लिए चरित्र निर्माण से राष्ट्र निर्माण की दिशा में निश्चित ही प्रेरणा का स्रोत रहा| परम श्रद्धेय स्व. भवरलालजी जैन में गॉंधीजी को एवं उनके कार्यों को देखने का अलग नज़रिया था, उनके द्वारा तैयार किये गये लेखों में से एक लेख ‘महात्मा गॉंधी जनसम्पर्क के अलौकिक आदर्श’ पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं|- सम्पादक

कम्यूनिकेशन विचार, सूचना, इरादे या भावनाओं को साझा करने की एक प्रक्रिया है| यह मौलिक, लिखित, सांकेतिक या प्रतीकात्मक हो सकता है| वक्ता, श्रोता, माध्यम, संदेश, उद्देश्य और प्रयोजन यह सभी संचार प्रक्रिया के महत्त्वपूर्ण घटक हैं| प्रभावशाली कम्यूनिकेशन के लिए, इन सभी तत्त्वों का संकलन अत्यंत आवश्यक है|

गॉंधीजी कम्यूनिकेशन विशेषज्ञ नहीं थे, किन्तु इन सभी पहलुओं पर उन्होंने नजदीक से कार्य किया और उसे अंतिम स्वरूप भी दिया| उद्देश्य था देश के अगम्य हिस्सों में बसी अनपढ़ जनता तक पहुंचना| मुख्य उद्देश्य तो अहिंसक संघर्ष एवं सत्याग्रह के माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत पर विजय प्राप्त कर हिन्दुस्तान को स्वतंत्र बनाना ही था|

गॉंधीजी का पूर्ण विश्वास था कि सत्य के रास्ते पर चलकर ही अहिंसात्मक संघर्ष संभव है| यही विश्वास उनके कम्यूनिकेशन को अद्वितीय बनाता है| उनके सामाजिक एवं राजनीतिक संघर्ष ने अहिंसक संचार की गाथा का निर्माण किया| उनके साथियों में करीब ९३ प्रतिशत निरक्षर थे|१ एवं स्थापित संचार माध्यम से दूर-दूर तक उनका कोई वास्ता नहीं था| उसके बावजूद वह जनता के साथ जुड़े और संघर्षमय गाथा के अंतर्गत ब्रिटिश साम्राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शोषण के खिलाफ किसी भी हथियार के बिना एक आगवी पद्धति से अहिंसक युद्ध को अंजाम दिया|

गॉंधीजी ने अपने युवाकाल में यह स्वीकार किया था कि वह संवाद स्थापित करने में कठिनाई का अनुभव करते थे| वह कभी अच्छे वक्ता के रूप में खुद को प्रस्थापित नहीं कर पाए| जब उन्होंने सत्याग्रह की शुरुआत की तब अपने दोस्तों, आलोचकों एवं अपने देशवासियों के साथ अहिंसक सत्याग्रह के गहरे अर्थ को व्यक्त करने के लिए कम्यूनिकेशन की आवश्यकता को महसूस किया| हालांकि उन्होंने कम्यूनिकेशन के माध्यम व नीति पर बहुत ज्यादा बात नहीं की, किन्तु उनके द्वारा किये गये बृहद पत्राचार यह दर्शाते हैं कि कम्यूनिकेशन के हर पहलू का कितनी बारीकी से उन्होंने ख्याल रखा था|

‘सत्य’ उनके लिए ईश्वर का रूप था| इसीलिए सत्य के साधक के रूप में उन्होंने सभी कार्यों में उद्देश्य की अखंडता पाई| हर क्रिया का अंतिम उद्देश्य होता ही है, वह चाहे व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक हो, उनके सभी कार्य इस लक्ष्य की दिशा में अपने प्रयास का हिस्सा बने| उन्होंने वैचारिक प्रक्रिया, संवाद, भाषण एवं अपने भीतर के साथ किए ‘स्व-संवाद’ के अनुरूप नेतृत्व का विकास किया| इसलिए उनके सभी कम्यूनिकेशन एक सद्भाव को दर्शाते रहे|

गॉंधीजी ने वक्ता की तुलना में श्रोता को अधिक महत्त्व दिया| उनके दर्शकों में आम जनता, उनके विरोधी और सरकार भी शामिल थे|

गॉंधीजी साधन के बारे में सतर्क रहते थे| यह उनकी मौलिक धारणा से अधिक जान सकते हैं| सत्य साध्य है और अहिंसा साधन| वे मानते थे कि हम जो साधन का उपयोग करते हैं वह मूर्त है| तथापि, गॉंधीजी के लिए मार्ग ही मंजिल थी (ींहश ुरू ळी ींहश सेरश्र) मतलब, अगर हम साधन का खयाल रखते हैं तो साध्य अपने आप निर्मित होगा| गॉंधीजी कहते हैं कि ‘मैं अक्सर कहता रहा हूँ कि अगर साधनों की फिक्र रखी जाये तो ध्येय अपनी फिक्र खुद कर लेगा|’ अहिंसा साधन है, और ध्येय है- हर एक राष्ट्र के लिए पूर्ण स्वाधीनता|२

गॉंधीजी शब्दों के प्रयोग में संयम बरतते थे| वे कहते हैं कि ‘मैं अपने-आप को यह प्रमाण-पत्र दे सकता हूँ कि मेरी जबान या कलम से बिना सोचे-समझे या बिना तौले शायद ही कोई शब्द कभी निकला है| मुझे याद नहीं पड़ता कि अपने भाषण या लेख के किसी अंश के लिए मुझे कभी शरमाना या पछताना पड़ा हो| मैं अनेक संकटों से बच गया हूँ और मुझे अपना बहुत सा समय बचा लेने का लाभ मिला है|३

‘अनुभव ने मुझे यह भी सिखाया है कि सत्य के प्रत्येक पुजारी के लिए मौन का सेवन इष्ट है| मनुष्य जाने-अनजाने भी प्रायः अतिशयोक्ति करता है, अथवा जो कहने योग्य है उसे छिपाता है, या दूसरे ढंग से कहता है| ऐसे संकटों से बचने के लिए भी मितभाषी होना आवश्यक है| कम बोलनेवाला बिना सोचे नहीं बोलेगा| वह अपने प्रत्येक शब्द को तौलेगा| यही सतर्कता उन्हें लेख लिखने में अत्यंत मददगार साबित हुई है|

कॉंग्रेस का मंच, प्रार्थना के समय किए गये प्रवचन, मीडिया संवाददाताओं के साथ साक्षात्कार, पत्राचार, तार, लेख जैसे अन्य साधन हैं जिनके द्वारा वह जनता के साथ कम्यूनिकेशन करते थे| इतना ही नहीं सत्याग्रह की अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए ३५ साल की उम्र में ही उन्होंने अपने लेखन कौशल के माध्यम से इंडियन ओपिनियन, नवजीवन, यंग इंडिया, हरिजन जैसी साप्ताहिक पत्रिकाएँ विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित की| हरि पुस्तिका, हिन्द स्वराज, रचनात्मक कार्यक्रम, मंगल प्रभात, आत्मकथा आदि उनकी मूल रचनाओं ने भी लोगों को प्रेरित किया| गॉंधीजी की पत्रकारिता की बारीकियों को समझने का प्रयास किया जाय तो वह व्यावहारिक पत्रकारिता के स्तंभों में से एक नजर आते हैं|

लंबी यात्राएँ, चाहे वह १९१५ की हो, १९२५ की हो, १९३० का नमक सत्याग्रह हो या १९४६ की नोआखाली यात्रा, बहुतेक उनके कम्यूनिकेशन के बेहद कारगर साधन बन गये थे| वो कहते हैं कि ‘हिन्दुस्तान में जितनी यात्रा करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है उतना शायद ही किसी को हुआ हो| यात्रा और लोगों को सुनना यह दो कार्य अभिव्यक्ति के व्यापक साधन बन गये थे|’४ इन्हीं यात्राओं से उन्होंने अपने संदेश को जीवन दिया, और आम जनता के दिल को छू लिया|

गॉंधीजी के अनशन हमेशा एक त्वरित कम्यूनिकेशन साबित हुए| इसका एक उदाहरण - अहमदाबाद मिल मजदूर हड़ताल के दौरान कार्यकर्ताओं ने अहिंसक संघर्ष की ताकत के नेतृत्व का एहसास किया| उनके ऐतिहासिक अनशन ब्रिटिश हुकूमत के अलगाववादी मनसूबे को रोकने के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुए| गॉंधीजी के अनशन ने भारत के हृदय को स्पर्श किया और लोगों से बात करने की अनिवार्य आवश्यकता जान पड़ी| मनुष्य के आन्तरिक हृदयतारों तक पहुंचने के लिए उनमें एक कृतिप्रेरक की प्रतिभा निर्माण हुई| उनके अनशन मनोभावों के आदान-प्रदान के साधन बने|

उनके आश्रम और प्रार्थना ने सामाजिक, आर्थिक और नैतिक प्रकृति के संघर्ष से जनता को अवगत करा दिया| उनकी पोशाक जनता के साथ एकता का प्रतीक साधने योग्य थी| उनके खुराक की आदतें अहिंसा के प्रति अपने प्यार को प्रगट करती थीं| गॉंधीजी के उपवास, प्रार्थना और पोशाक ने भी लोगों पर गहरा प्रभाव डाला| कताई कार्य संचार का एक और माध्यम था, यह भी संगठन का एक तरीका बना| गॉंधीजी कहते हैं कि ‘मेरे लिए राजनीतिक दुनियां में चरखे से ज्यादा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं हैं| उनके हर एक कार्य में लोग खुद को देखते थे| यह केवल तभी संभव है जब श्रोता खुद को वक्ता के साथ समायोजित रूप से देखता हो, तभी संचार माध्यम शक्तिशाली और ठोस बन जाता है| गॉंधीजी अपने श्रोता वर्ग के साथ खुद की पहचान बनाने में सफल रहे थे|

परंपरागत एवं अपरंपरागत दोनों तरह के मीडिया का चयन यह दर्शाता है कि गॉंधीजी ने संदेश वाहक के रूप में संचार साधनों का इस्तेमाल कितने अभिनव एवं व्यापक रूप से किया था|

अपने उद्देश्यों को सार्थक करने के लिए उन्होंने बहुविध अवधारणाओं का इस्तेमाल किया| जैसे सत्याग्रह, सर्वोदय, हरिजन, नई तालीम, ग्रामस्वराज, पंचायत राज, एकादश व्रत आदि संकल्पनाओं के माध्यम से राष्ट्र निर्माण कि दिशा में उन्होंने अपने उद्देश्य को स्थित किया था| लोगों में सामाजिक सौहार्द और सद्भाव का संदेश स्थापित करने के लिए कलकत्ता का मुस्लिम इलाका, दिल्ली की भंगी कालोनी जैसी जगहों पर रहने की उनकी प्राथमिकता रहती थी| यह सभी अवधारणायें उनके सशक्त संचार के साधन रहे|

ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गुजारे जा रहे अन्यायपूर्ण कृत्यों के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए, ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान दिया गया नारा ‘करेंगे या मरेंगे’ के द्वारा लोगों की राजनीतिक मनःस्थिति को जगाने का उनका अभिनव प्रयास था| गॉंधीजी का यह संदेश एक जादू की छड़ी के साथ भारत को छुआ| धीरे-धीरे एक नई दृष्टि का संचार हुआ| उनके द्वारा दिए गये खुले संदेश सटीक, स्पष्ट और सीधे मुद्दे पर विनम्रता से लिखे होते थे| इससे कोइ द्वेष उत्पन्न होने का सवाल ही नहीं होता था| उन्होंने अपने द्वारा लिखे संदेश के माध्यम से औपनिवेशिक प्रशासन के चतुर दिमाग और ब्रिटिश राज के दिल में घुसने की शक्ति बना ली थी|

सत्य-शोधक के रूप में गॉंधीजी ने भी अपने संचार माध्यमों के तौर पर दिल और दिमाग को भी स्थान दिया| उन्होंने कहा कि ‘अशुद्ध मन शुद्ध अहिंसा को प्राप्त नहीं कर सकता| अहिंसा के जरिए ही हम हिंसा पर जीत पा सकते हैंै| हृदय की शुद्धता के बिना सच्ची अहिंसा असम्भव है|’५ गॉंधीजी ने भय, क्रोध, दुश्मनी, घृणा, संदेह और दोष इन सभी को मस्तिष्क को कलंकित एवं हृदय को लाचार बनाने वाले तत्त्व के रूप में निर्दिष्ट किया|

बीमार पिताजी के सामने गलतियों की स्वीकारोक्ति की घटना यही दर्शाती है कि बालक गॉंधी के भीतर निरंतर बातचीत तथा पारदर्शकता का एक विशिष्ट उदाहरण मौजूद था| वे लिखते हैं कि चिट्ठी में मैंने सारा दोष स्वीकार किया और सजा चाही| आग्रहपूर्वक बिनती की कि वे अपने को दुःख में न डालें, और भविष्य में फिर ऐसा अपराध न करने की प्रतिज्ञा की|... उनके पिताजी ने चिट्ठी पढ़ी| आँखों से मोती की बूंदें टपकी|... मोती की बूँदों के उस प्रेमबाण ने मुझे बेध डाला| मैं शुद्ध बना|६ अपने भीतर किए गए बातचीत से ही बालक गॉंधी अपने पिताजी के साथ संवाद करने का साहस जुटा पाये| इन्हीं साहस की वजह से प्यार की शानदार अभिव्यक्ति का स्वाद वो चख पाये|

वह लगातार गहरे आत्मनिरीक्षण में अपने ‘अंतःकरण की आवाज’ के साथ परामर्श करते रहते थे और सबसे महत्त्वपूर्ण अपने अभूतपूर्व बयान, चाहे वह अपने पिताजी के लिए कहा हों, लंदन में अपने मेजबान को अपनी शादीशुदा होने की बात का ब्यौरा लिखा हों या फिर चम्पारण में जिला अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने उनका दिया गया बयान हो, ऐसे अनेक उदाहरण उनके पारदर्शी और निडर कम्यूनिकेशन के उदाहरण थे|

निर्भयता आध्यात्मिकता की सबसे पहली जरूरत है| जो कायर हैं, उसमें नैतिकता कभी आ ही नहीं सकती|७ इस तरह की निर्भयता उन्हें शत्रुतापूर्ण स्थानीय लोगों के बीच नोआखाली यात्रा शुरू करने के लिए ताकत दे रही थी| इसी तरह महात्मा गॉंधी असहयोग आन्दोलन के दौरान विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार के आगाज़ पर अपनी नौकरी खो दिए मिल मजदूरों को लंकाशायर यात्रा के दौरान मिले| उनका मानना था, कि सच्ची सार्वजनिक सेवा तभी सम्भव है जब मान-मर्यादा, धन-सम्पत्ति, जाति, कुटुम्बीजन और मृत्यु के सम्बन्ध में निर्भयता आ जाती है|८

आत्मसंयम और दिमाग का संतुलन वक्ता को गंभीर एवं सक्षम बनाता है| आत्मसंयम और धैर्य ही स्वतंत्र और निष्पक्ष संचार का निर्माण कर सकते हैं| १९३० में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पूछा की गॉंधीजी देश को क्या देनेवाले हैं, गॉंधीजी ने उत्तर दिया, मैं रात दिन व्यग्रतापूर्वक सोच रहा हूँ, परन्तु मुझे घोर अन्धकार में प्रकाश की कोई किरण दिखाई नहीं दे रही है|’९ गॉंधीजी के अद्वितीय और अपूर्व व्यक्तित्व की नींव में अंतरात्मा की आवाज सुनने की तत्परता थी| जब तक हम वैचारिक रूप से शान्त नहीं होंगे तब तक हम अपने अंतरात्मा की आवाज नहीं सुन सकेंगे|

गॉंधीजी शब्दों के मामले में मितव्ययी थे, हालांकि इससे उनकी आवश्यक अभिव्यक्ति में कोई कमी महसूस नहीं हुई| उनका कम्यूनिकेशन प्रत्यक्ष, ध्यान केंद्रित और तेज था| लॉर्ड इर्विन को लिखे खत गॉंधीजी की लेखन शैली की गवाही देती हैं| ‘यह जाहिर है कि मौजूदा विदेशी सरकार दुनियां में सबसे ज्यादा खर्चीली है और इसे बनाये रखने की गरज से ही ये सारे अन्याय किये जा रहे हैं| आप अपने वेतन को ही ले लीजिए| वह माहवार २१,००० रुपये से भी ज्यादा है| ... इस तरह आप अपनी तनख्वाह के रूप में ५,००० से भी अधिक भारतीयों की औसत कमाई का हिस्सा ले लेते हैं| निजी तौर पर मेरे दिल में आपके लिए इतनी इज्जत है कि मैं ऐसी कोई बात आपके बारे में नहीं कहना चाहूंगा जिससे आपके दिल को ठेस पहुंचे|... पर जिस प्रणाली ने ऐसी खर्चीली व्यवस्था बना रखी है, उसे तुरन्त तिलांजलि देना ही उचित है|’१० अपने विरोधियों से पत्राचार करने कि उनकी तत्परता उनको एक अनूठा संदेशवाहक बनाती है|

एक संदेशवाहक के रूप में कुछ सद्गुणों का उन्होंने दृढ़ता से पालन किया| जैसे कि आत्मनिरीक्षण, पारदर्शिता, निर्भयता, तत्परता, विरोधियों से बात करने कि तैयारी, धैर्य और स्पष्टवादिता, इन सबको वह अपनी कुंजी मानते थे| अपनी बुद्धिमत्ता से उन्होंने अपने कम्युनिकेशन के लिए उत्प्रेरक घटक के रूप में मौन एवं हास्य को भी नियोजित किया था|

गॉंधीजी ने मौन को सक्रिय संचार साधन के रूप में इस्तेमाल किया| लूईस फिशर लिखते हैं कि ‘जब राजनैतिक भारत छिन्न-भिन्न तथा साहसहीन हो रहा था तब गॉंधीजी को मौन के लिए यह अच्छा समय लगा| उन्होंने उद्धृत किया कि ‘मौन यह लौकिक आराधना की सच्ची भाषा है’|११

गॉंधीजी ने अपने पूर्ण आयुष्य के दौरान १५ सत्याग्रह किए, उनके द्वारा किए गये सभी उपवासों का कुल समय ६ साल से ज्यादा हो रहा है| १४ बार जेल में गये, कुल मिलाकर २३३८ दिन जेल में बिताए, पूरे विश्व में ३ महाद्वीप, २२ देशों के २००० शहरों एवं गॉंवों की मुलाकात की| प्रत्यक्ष रूप से करीब १७९२६ व्यक्तियों के संपर्क में आए और १ लाख से भी ज्यादा पत्राचार किया|१२ ये आँकड़े दर्शाते हैं कि गॉंधीजी का जीवन असाधारण रूप से कम्यूनिकेशन का पर्याय बन गया था|

गॉंधीजी संचार विशेषज्ञ नहीं थे, किन्तु, सत्य की अपनी खोज में उन्होंने अहिंसक संचार माध्यमों को अभिन्न रूप से विकसित किया| उनका संदेश सभी वर्ग तक पहुंचा, उसमें धर्म और भाषा की कोई दीवार नहीं थी| हम उनके संचार माध्यमों में देख सकते हैं कि गॉंधीजी के विचार, भाषण और कृति में ऐक्य था| उनके व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में एकरूपता थी| उनकी राजनीति, अर्थशास्त्र और धर्म एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए आंतरिक रूप से बुने गये थे| उनके कम्यूनिकेशन ने ‘मैं और तुम’, ‘दोस्त और दुश्मन’ की परिभाषा को भंग कर अद्वैत की भावना का निर्माण किया था| उनका जीवन सत्य की निरंतर खोज की परिभाषा बन गया था, और नेतृत्व को प्रदान करते हुए उन्होंने कहा कि मेरा ‘जीवन ही मेरा संदेश’ है| दूसरे शब्दों में कहें तो उनका पूर्ण जीवन पारदर्शक अहिंसक संचार का अलौकिक आदर्श बन गया था|

सन्दर्भ -

१) A students history of education in India, Jayant Pandurang Nayaka, Syed Nurullah, 1974, Macmillan २) सं.गॉं.वां., खण्ड ६८, पृष्ठ ४३१; ३) मो. क. गॉंधी, सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२), पृष्ठ ५६; ४) नवजीवन, ९-१०-१९२१; ५) एडमण्ड और एवॉन प्रिवा को पत्रः ५ फरवरी, १९४७; ६) मो. क. गॉंधी, सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२), २३; ७) यंग इंडिया, १३-१०-१९२१, पृ. ३२३; ८) सं.गॉं.वां. पत्रः मगनलाल गॉंधी को, नवम्बर ११, १९१०; ९) लुई फिशर, गॉंधी की कहानी पृ.१३५; १०) लार्ड ईर्विन को पत्र; २ मार्च १९३०; सं.गॉं.वां. खण्ड ४८, पृ. ४०२; ११) लुई फिशर, गॉंधी की कहानी, पृ. ११९; १२) अभिलेखागार, गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन

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