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Articles - मृत्यु जीवन की जननी

‘खोज गॉंधीजी की’ के प्रत्येक अंक में महात्मा गॉंधी के जीवन व अन्य विषयों से जुड़े विचार लोगों के सामने रखने का हमारा प्रयास हमेशा रहा है| महात्मा गॉंधी के विचार हमेशा लोगों को नई दिशा प्रदान करते हैं| शायद ही ऐसा कोई विषय होगा जिसपर महात्मा गॉंधी ने अपने विचार प्रकट नहीं किए हों| गॉंधी निवार्ण दिवस पर मृत्यु के विषय में गॉंधीजी के विचार को दर्शाते ‘मृत्यु जीवन की जननी’ विषयक प्रस्तुत लेख का संकलन फाउण्डेशन के अभिलेखागार में उपलब्ध साहित्य के माध्यम से किया गया है|- सम्पादक

जन्म और मृत्यु जीवन का अंत नहीं है| यह बस एक महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व की समाप्ति है| जीवन सार्वभौमिकता का विजय प्राप्त करने के लिए बहता रहता है, जीवन तब तक प्रवाहशील रहता है जब तक यह शाश्वत में विलीन न हो जाए| मृत्यु आत्मा का भौतिक शरीर से अलग होना है| मृत्यु एक नए और बेहतर जीवन का शुरुआती बिंदु बन जाता है| मौत बस जीवन के एक उच्चतर प्रारूप के लिए दरवाजे खोलती है, यह एक संपूर्ण जीवन का प्रवेश द्वार है|

जैन मतानुसार संसार का प्रत्येक जीव या प्राणी अपने उपार्जन किये हुए गति नाम कर्म के अनुसार एक शरीर छ़ोडकर दूसरा शरीर धारण करने के लिए जन्म लिया करता है|

मृत्यु मनुष्य को कितना ज़्यादा भयभीत करती है, कितना शोक उत्पन्न करवाती है और गहरे दुःख में ही डुबोकर रखती है| हर मनुष्य को जीवन में किसी न किसी की मृत्यु का साक्षी बनना पड़ता है| जन्म एक उपहार और मृत्यु एक भय बन जाता है| गॉंधीजी कहते हैं कि ‘जिसका जन्म हुआ है उसको मृत्यु से मुक्ति मिल नहीं सकती| ऐसी मृत्यु का भय क्या, शोक भी क्या? मैं समझता हूँ कि हम सबके लिए मृत्यु एक आनंददायक मित्र है| हमेशा धन्यवाद के लायक है|’१

मृत्यु के डर में अनेक डर समाये होते हैं| एक है शारीरिक वेदना का डर, दूसरा है शरीर से यानी जीवन से वियोग होने का डर, तीसरा है जो कुछ भी पुरुषार्थ हम करते हैं अथवा जीवन का आनन्द लेते हैं उसके एकाएक कट जाने का डर| इसमें एक चौथा डर भी हम बढ़ा सकते हैं| मृत्यु के बाद हमारा क्या होगा, कहां जाना पड़ेगा, क्या भुगतना पड़ेगा, इसकी कोई स्पष्ट कल्पना न होने से जो डर लगता है अज्ञात का डर... हरिजन साप्ताहिक में गॉंधीजी लिखते हैं कि इंसान सिर्फ मौत से बचने के लिए ही नहीं जीता| अगर वह ऐसा करता है तो मेरी सलाह है कि वह ऐसा न करे| उसे मेरी सलाह है कि अगर वह ज्यादा न कर सके तो कम-से-कम मौत और जिन्दगी दोनों को प्यार करना सीखे| कोई कह सकता है कि यह एक मुश्किल बात है| इसपर अमल करना और भी मुश्किल है| मगर हर उचित और महान काम मुश्किल तो होता ही है| ऊपर उठना हमेशा मुश्किल होता है| नीचे गिरना आसान है और उसमें अक्सर हमेशा फिसलन होती है| जिन्दगी वहीं तक जीने लायक होती है जहॉं तक मौत को दुश्मन नहीं बल्कि दोस्त माना जाता है| जिन्दगी के लालचों को जीतने के लिए मौत की मदद लीजिए|२

जीवन में सबसे अधिक मूल्यवान वस्तु तो प्रयत्न ही है| सब तरह के आदर्शों और सब उन्नत कल्पनाओं को जीवन के प्रयोग में लाने के बाद जो अनुभव प्राप्त होता है वही सब कल्पनाओं की अंतिम कसौटी है| प्रयत्न से जो पाया वही मनुष्य की सच्ची और अच्छी पूंजी होती है| १९४५ के अपने पंचगनी दौरे के दौरान गॉंधीजी ने कहा कि ‘मृत्यु प्रयत्न का अंत नहीं| अगर मनुष्य के प्रयत्न का अंत मृत्यु हो तो जगत का शाश्वत नियम अर्थात् परमात्मा एक मजाक की चीज बन जाता है| परलोक का गुप्त रहस्य जानने के झंझट में हम न पड़ें| हममें इतनी श्रद्धा होनी चाहिए की ठीक तरह से व्यतीत किया हुआ जीवन और भी उत्कृष्ट और समृद्ध जीवन का आरंभ है|’३

शहीद श्रद्धानन्दजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते गॉंधीजी लिखते हैं कि ‘मृत्यु तो हमेशा ही धन्य होती है, मगर उस योद्धा के लिए तो और भी अधिक, जो अपने धर्म यानी सत्य के लिए मरता है| मृत्यु कोई शैतान नहीं है| वह तो सबसे बड़ी मित्र है| वह हमें कष्टों से मुक्ति देती है| हमारी इच्छा के विरुद्ध भी हमें छुटकारा देती है| वह हमें बराबर ही नई आशाएँ, नये अवसर प्रदान करती है| वह नींद के समान मीठी है, जो हमें फिर ताजा कर देती है|’४

मृत्यु के द्वारा केवल नया जन्म नहीं मिलता| मृत्यु के द्वारा मनुष्य सजीवन, प्राणवान बनता है और भविष्य में नये-नये स्वप्न देखने की शक्ति उसमें प्रगट होती है| इस तरह मृत्यु ही जीवन का उत्तम से उत्तम साथी है, सचमुच तो जीवन और मृत्यु दोनों को मिलाकर ही सम्पूर्ण जीवन बनता है| और इसलिए महात्मा गॉंधी ने कहा कि ‘जन्म और मृत्यु दो भिन्न स्थितियॉं नहीं हैं, परन्तु एक ही स्थिति के दो अलग-अलग पहलू हैं| एक पर दुःखी होने और दूसरे पर खुशी मनाने का कोई कारण नहीं है|’५ इस संसार में एक भी क्षण ऐसा नहीं गुजरता जब कोई न कोई जन्मता या मरता न हो| हमें समझ लेना चाहिये कि जन्म की खुशी मनाना और मौत का मातम करना बड़ी बेवकूफी है| जो आत्मा को मानते हैं और कौन हिन्दू, मुसलमान या पारसी ऐसा होगा जो आत्मा को नहीं मानता? वे जानते हैं कि आत्मा कभी मरती नहीं है| जीवित और मृत दोनों की आत्माएं एक ही है| उत्पत्ति और लय की शाश्वत क्रियाएं बराबर जारी रहती हैं| इसमें ऐसी कोई बात नहीं, जिसके लिए हम सुख या दुःख के मारे बावले हो जायें| अगर हम अपनी कौटुम्बिकता के खयाल को अपने देशवासियों तक भी बढ़ा लें और समझ लें कि देश में होनेवाले सारे जन्म हमारे परिवार में ही हो रहे हैं, तो हम कितने जन्मोत्सव मनायेंगे? अगर हम देश की सारी मृत्यु पर रोयें, तो हमारी आंखों के आंसू कभी नहीं सूखेंगे| इस विचारधारा से हमें मौत के सारे डर से छुटकारा पाने में मदद मिलनी चाहिये|६

२९ जनवरी १९४८ को मिस मार्गरेट बुर्क-व्हाइट ने गॉंधीजी को सवाल किया कि बापूजी क्या आप अभी भी १२५ साल जीने की आशा रखते हैं? प्रत्युत्तर देते हुए गॉंधीजी ने कहा ‘आज चारों और फैले अंधकार को देखते हुए मैंने यह इच्छा त्याग दी है| मैं प्रकाश की खोज कर रहा हूँ| यदि हालत सुधरी और लोगों ने मेरी पुकार सुनकर शान्ति और सौहार्द के नये युग का सूत्रपात करने में मुझे सहयोग दिया, तो मैं फिर से मनुष्य का पूरा जीवन जीना चाहूँगा| तब सचमुच मुझे ऐसी इच्छा करने का आदेश मिलेगा|’७

गॉंधीजी सत्य-रूपी परमेश्वर के पुजारी रहे| उनकी दृष्टि में वही एकमात्र सत्य रहा, दूसरा सब कुछ मिथ्या है| सत्य के शोधक ने उसी शोध रूपी यज्ञ में अपने अस्तित्व को मिटाते हुए शरीर की भी आहुति देने की तैयारी दर्शायी| उन्होंने अपने जीवन के माध्यम से कथनी और करनी को साकार किया| अपने जीवन के अंतिम अनशन के दिनों के दौरान प्रार्थना सभा में दिये गये भाषण में वह कहते हैं कि ‘अगर आप मेरा खयाल रखें कि इसे जिंदा रखा जाय तो बड़ी भारी गलती करने वाले हैं| मुझको जिंदा रखना या मारना किसी के हाथ में नहीं है| वह ईश्वर के हाथ में है| इसमें मुझे कोई शक नहीं है| किसी को भी शक नहीं होना चाहिए| ... मुझपर दया कर आप कुछ न कीजिए| जितना दिन उपवास का काट सकता हूँ काटूंगा| ईश्वर की इच्छा होगी तो मर जाऊंगा|’८ निखालस भाव से, निर्भयता से अपने मृत्यु को स्वीकार करना यह व्रत-निष्ठा जीवन को दर्शाता है| कोई भी व्रत लेना बलवान का काम है, निर्बल का नहीं| यह उन्होंने साकार करके दिखा दिया|

२९ जनवरी १९४८ के दिन गॉंधीजी की तबीयत ठीक नहीं थी, उस दौरान मनुबहन से बात करते हुए कहा कि ‘यदि मैं लम्बे समय की बीमारी से अथवा किसी फोड़े-फुंसी से भी मरूं, तो लोगों को नाराज करने का खतरा उठा कर भी संसार के सामने तुम यह घोषणा करना तुम्हारा धर्म होगा कि जैसा ईश्वर-परायण मनुष्य होने का मैं दावा करता था वैसा सचमुच मैं था नहीं| अगर तुम ऐसा करोगे तो मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी| यह भी याद रखो कि अगर कोई आदमी गोली मार कर मेरे प्राण ले ले, जैसे किसी ने उस दिन बम से मेरे प्राण लेने की कोशिश की थी, (२० जनवरी १९४८ को बिड़ला-भवन के प्रांगण में प्रार्थना सभा स्थल के पास गॉंधीजी को बम से मारने का प्रयास किया गया था) और मैं कराहे बिना उस गोली का सामना करूं और रामनाम लेते हुए मेरे प्राण निकल जायें, तो ही मेरा दावा सच्चा साबित होगा|’९ सारे विश्व ने यह कृत्य को देखा| मृत्यु की गरिमा को सार्थक करते हुए, इस महामानव ने सुखद अनुभव के रूप में मृत्यु को भी जिया|

किसी महापुरुष का, उसके जीवन-काल में, मूल्यांकन करना अथवा इतिहास में उसके स्थान का निर्धारण करना, आसान काम नहीं है| गॉंधीजी उन पैगंबरों में से हैं जिनमें हृदय का शौर्य, आत्मा का शील और निर्भीक व्यक्ति की हंसी के दर्शन होते हैं| उनकी मृत्यु पर सारी दुनियां ने ऐसा शोक मनाया जैसा मानव इतिहास में किसी अन्य की मृत्यु पर नहीं मनाया गया था| डॉ. जे. एच. होम्स ने यह कहकर कि ‘‘गॉंधीजी गौतम बुद्ध के बाद महानतम भारतीय थे और ईसा मसीह के बाद महानतम व्यक्ति थे’’ गॉंधीजी का और भी ठोस मूल्यांकन कर दिया था| सर्वपल्ली राधाकृष्णन् महात्मा गॉंधी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दर्शाया कि ‘गॉंधीजी ने समूची दुनियां के सुख-दुःख के साथ अपने को एकाकार कर दिया था, मानव-मानव के बीच उनके लिए भेद न था| वह मानवता के लिए जीये और उसी के लिए उन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया|’

इंसानियत स्वर्ग की तरफ, मनुष्यता देवत्व की तरफ कितनी ऊँची उठ सकती है| मनुष्य की आत्मा कितनी उन्नत हो सकती है| मनुष्य की ऊँचाई, चौड़ाई, गहराई कहॉं तक जा सकती है, इसके लिए भी किसी पैमाने की आवश्यकता थी| परमात्मा ने गॉंधीजी को बनाया मनुष्य कितना ऊँचा उठ सकता है यह बतलाने के लिए|१० ऐसा कभी-कभी ही होता है कि सामान्य स्तर से ऊपर उठकर कोई असाधारण आत्मा, जिसने ईश्वर के विषय में अधिक गहराई से चिंतन किया है, दैवी हेतु का अधिक स्पष्टता के साथ प्रतिसंवेदन किया है और दैवी मार्गदर्शन के अनुरूप वीरता पूर्वक आचरण किया है| गॉंधीजी महान हैं इसलिए हम से भिन्न हैं, यानी उस हद तक असामान्य रहे| लेकिन वह मनुष्य भी थे, इसलिए हमारे जैसे ही थे| उनमें और दूसरों में जो सामान्य अंश रहे, यानी समान धर्म है, उसी पर गॉंधीजी की जीवन-निष्ठा आधारित रही| यही गॉंधीजी की विशेषता है| उनमें और मानव-मात्र में जो समान अंश है उसी को मनुष्यता या इंसानियत कहते हैं|

आदमी के शरीर और मन दोनों का मरण है| तो भी जो आदमी मरता है, वह अपने द्वारा किये गये कर्मों के रूप में जीवित रहता है| जहॉं-जहॉं भी कहीं व्यक्ति के विचारों, उनके शब्दों, उनके कार्यों ने दूसरे व्यक्ति को प्रभावित किया है, वहॉं-वहॉं उस व्यक्ति का पुनर्जन्म हो गया है| जीवन की कार्य-शीलता, जीवन के कार्य ही वास्तविकता हैं| ये ही रहते हैं और कुछ भी नहीं रहता| प्यारेलाल लिखते हैं कि गॉंधीजी हम सबसे भारपूर्वक कहा करते थे: मैं शरीर से तुम्हारे बीच सदा नहीं रहूँगा, परन्तु जिनके हृदय में वह श्रद्धा और उत्कंठा होगी, उन सबके निकट मैं सदैव रहूंगा|११ वह हमेशा कहा करते थे कि ‘मेरे चले जाने के बाद कोई भी एक व्यक्ति मेरा पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं कर सकेगा| परन्तु मेरा थोड़ा-थोड़ा अंश तुममें से अनको में रहेगा| यदि तुममें से प्रत्येक व्यक्ति ध्येय को प्रथम और स्वयं को अंतिम स्थान देगा, तो मेरे रिक्त स्थान की बहुत कुछ पूर्ति हो जायेगी|’१२

एक मायने में गॉंधीजी का यह विचार तो आज भी उनके मौलिक विचार की पुष्टि करता है कि ‘मेरा तो यह विश्वास है कि सत्पुरुष के कार्य का सच्चा आरम्भ उसके मृत्यु के बाद होता है|’१३

सन्दर्भ -

१) प्रार्थना प्रवचन, १५.१.१९४८; २) हरिजन, ३०.११.१९४७/सं.गॉं.वॉं. खण्ड ९०, ८१; ३) पंचगनी, ६.६.१९४५; ४) शहीद श्रद्धानन्दजी (यंग इंडिया, ३०.१२.१९२६/सं.गॉं.वॉं. खंण्ड ३२, ४६९; ५) यंग इंडिया, २०.११.१९२४/सत्य ही ईश्वर है, पृ. सं. १३५; ६) यंग इंडिया, १३.१०.१९२१/सत्य ही ईश्वर है, पृ. सं. १३५; ७) सं.गॉं.वॉं. खण्ड-९०, ४९८; ८) प्रार्थना प्रवचन, १७.१.१९४८; ९) दिल्लीमां गॉंधीजी (गुज.), मनुबहेन गॉंधी, ४२०; १०) दिशा बोधक दस्तावेज, दादा धर्माधिकारी; ११) महात्मा गॉंधी: पूर्णाहुति, ४८२; १२) वही पृ. सं. ४८०; १३) गॉंधीजी की सूक्तियां, पृ. सं. ७६.

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