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Articles - गॉंधीजी, दक्षिण अफ्रीका और फंड

दक्षिण अफ्रीका और गॉंधीजी का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है| जिस देश में बैरिस्टर मोहनदास एक साल के लिए गये थे, वहॉं की परिस्थिति को आत्मसात कर, उसे अपनी कर्मभूमि के रूप में स्वीकार कर, करीब २१ साल वे दक्षिण अफ्रीका में रहे| उन्होंने सामुदायिक संगठन का उत्कृठ उदाहरण प्रस्तुत किया| अमीर और गरीब दोनों से दान प्राप्त कर, स्वाभिमान की लड़ाई में उसे सम्मिलित किया| दान प्राप्त करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है उसका उपयोग, इसलिए दान से सम्बन्धित अपने विचार में उन्होने कहा कि ‘लोग दान में प्राप्त हुई वस्तु का लाभ मुश्किल से ही उठा पाते हैं| दान में मिले हुए धन का सदुपयोग विरला ही कर सकता है|’ इस तथ्य को सार्थक करने का सफल प्रयास महात्मा गॉंधी ने द. अफ्रीका में किया| गॉंधीजी, द. अफ्रीका और फंड इस विषय पर प्रस्तुत है यह लेख|- सम्पादक

मोहनदास करमचंद गॉंधी, एक बड़े कद के याचक थे| उन्होंने सार्वजनिक कार्यों के लिए जीवनभर नया-पैसा से लेकर लाखों-करोड़ों की भिक्षा मॉंगी| लेकिन वो याचक बने राष्ट्रहित के लिए| गॉंधीजी कहते हैं ‘भिक्षापात्र लेकर मैं आपके सामने खड़ा तो हूँ, लेकिन मुझे पैसे की भिक्षा नहीं चाहिए| ऐसी भिक्षा मैंने अपने जीवन में अधिक मॉंगी हैं| मुझे गरीब की कौड़ी और अमीर के करोड़ दोनों की जरूरत हैं|’१

गॉंधीजी वकालत के व्यवसाय के लिए दक्षिण अफ्रीका गए| उनकी सत्यनिष्ठा, सेवाभाव, गरीबों के प्रति करुणा, आध्यात्मिक्ता, न्याय और नीति के प्रति लगन आदि सद्गुण और सद्भावना के बीज बोये| उस स्थान व परिस्थिति ने सिंचाई का कार्य किया, और यह बीज अंकुरित होकर सुरुचिपूर्ण व्यापक पेड़ के रूप में पनपा| गॉंधीजी उनके महान कार्यों से ही महान हैं, ऐसा नहीं है, उनके छोटे-छोटे कार्यों में भी दुर्लभ सांसारिक गुणों की दृष्टि का पल-पल दर्शन होता है|

श्रीमान् गॉंधी एक कमर्शियल बैरिस्टर पहले लोगों के ‘वकील’ बने, और वकील में से ‘सेवक’ बने| सेवा के जरिए लोगों के ‘मार्गदर्शक’ बने| सत्यनिष्ठा और त्याग के द्वारा लोगों का विश्वास अधिग्रहण करके ‘नेता’ बने| सार्वजनिक जीवन में एकरूप होकर ‘गॉंधी भाई’ बने| इस प्रकार क़ौम के सुख में सुखी और क़ौम के दुःख में दुःखी होकर लोगों के माता एवं पिता का स्थान प्राप्त करके ‘बापू’ बने| वो कहते हैं कि ‘वकालत का धंधा मेरे लिए गौण वस्तु थी और सदा गौण ही रही|’

सन् १८९६ और १९०१ में बिदाई के दौरान मिली हुई भेंटें उन्होंने लौटा दीं| इस संदर्भ में श्रीमान् पारसी रुस्तमजी को लिखे एक पत्र में दर्शाते हैं कि... मैं इन उपहारों को नहीं, बल्कि उस प्रेम को मूल्यवान समझता हूँ जिससे प्रेरित होकर ये दिये गये हैं| इसलिए ये अलंकार नेटाल भारतीय कॉंगे्रस को दिया जाय|

अलंकारों की सूची

१) सन् १८९६ में दिया गया स्वर्ण पदक; २) सन् १८९६ में तमिल भारतीयों द्वारा दी गई स्वर्ण-मुद्रा; ३) सन् १८९९ में जोहानिसबर्ग समिति द्वारा भेंट की गई सोने की जंजीर; ४) श्री पारसी रुस्तमजी द्वारा भेंट की गई सोने की जंजीर, गिन्नियों की थैली और सात स्वर्ण-मुद्राएँ; ५) श्री दादा अब्दुल्ला एण्ड कम्पनी के श्री जूसुब द्वारा भेंट की गई सोने की घड़ी; ६) हमारे समाज द्वारा अर्पित हीरे की अँगूठी; ७) गुजराती हिन्दुओं द्वारा अर्पित सोने का हार; ८) स्टेंजरवासी काठियावाड़ी हिन्दुओं द्वारा भेंट किया गया चॉंदी का प्याला तथा तश्तरी और; ९) श्री अब्दुला कादिर तथा अन्य सज्जनों द्वारा भेंट किया गया हीरे का पिन|

इन मूल्यवान उपहारों का व्यक्तिगत उपयोग न तो मैं कर सकता हूँ और न मेरा परिवार| ये इतने पवित्र हैं की मैं या मेरे उत्तराधिकारी इन्हें बेच भी नहीं सकते|२

अपने इस कार्य का मुझे कभी पश्चात्ताप नहीं हुआ| दिन बीतने पर कस्तूरबा को भी इसके औचित्य की प्रतीति हो गयी| इससे हम बहुत से लालचों से बच गये हैं| मेरा यह मत बना है कि सार्वजनिक सेवक के लिए निजी भेंटें नहीं हो सकती|३

आर्थिक संकट- ट्रान्सवाल के हिन्दिओं की स्थिति आर्थिक रूप से संकटमय हो चुकी थी| उनके व्यापार टूट चुके थे| परिवार के मुखिया जो सभ्यों के जीवन निर्वाह के लिए जिम्मेदार थे, वह सब जेल में बन्द होने की वजह से उनके परिवार टूट चुके थे| जेल में सजा काट चुके लोगों को सरलता से किसी भी प्रकार का कार्य मिलना मुश्किल होता था| कई सारे लोगों को देशनिकाला की स्थिति का सामना करना पड़ा| उनकी सम्पत्ति ट्रान्सवाल में ही रह गई और हिन्दुस्तान में बिना कुछ लिए ही आना पड़ा| उन सबके परिवार को भी संभालना था| विलायत एवं हिंद में दो जगह पर प्रतिनिधि मंडल को भेजा गया था, उनका खर्च निभाना था|

ट्रान्सवाल और ट्रान्सवाल के बाहर बसे हिंदिओं में से जो लोग सत्याग्रह में नहीं शामिल हुए उनकी ओर से सहयोग मिलता था, पर वह पर्याप्त नहीं था| आर्थिक मदद प्राप्त करने के लिए कई तरह के उपाय आजमाये गये| नाटक, खेल आयोजित किये जाते किन्तु आर्थिक संकट वैसे ही खड़ा रहता था| यह प्रश्न १९०७ के अन्त तक बना रहा| १९०७ में लोगों को आह्वान किया गया, टेलीग्राम, पत्र, छपाई खर्च आदि से होनेवाले खर्च के लिए मदद मॉंगी जाने लगी|४

गॉंधीजी ने अपना सब कुछ त्याग कर दिया| उनकी अब-तक की हुई बचत उसमें लगा दी| (१९१० में आयोजित हिंदी राष्ट्रीय महासभा के अधिवेशन में मि. नटेसन ने अपने संबोधन में कहा कि दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई में गॉंधीजी ने दो लाख रुपये खर्च किये|) अन्त में अपने दस हजार का जीवन बीमा की रकम को भी इस कार्य के लिये निकाल लिया| १९०९ में गॉंधीजी विलायत थे तब डॉ. प्राणजीवनदास महेता ने इस फंड के लिए पौंड दस दिया था| श्रीमान् पोलाक ने भी हिंद में आर्थिक योगदान प्राप्त करने के इरादे से एक लाख रुपये एकत्रित करने का प्रयास किया| उनका तत्काल रूप से उदार प्रतिक्रिया श्रीमान् रतनजी जमशेदजी टाटा ने दिया और १९०९ के नवम्बर में लड़त को मदद करने के लिए फंड में पच्चीस हजार रुपये तुरन्त गोखलेजी के माध्यम से भेज दिये| रतन टाटा ने लिखे एक पत्र में दर्शाया है कि ‘साम्राज्य के मूल निवासी के रूप में स्वतंत्र व्यक्ति के अधिकार प्राप्त करने एवं देश के सम्मान को बरकरार रखने के लिए यह कठिनाइयों भरी और अस्तित्व की लड़त का सामना करते हुए अपने मुठ्ठीभर देशबांधव ट्रान्सवाल सरकार को दृढ़ और अनवरत लड़ाई दे रहे हैंै, उनको मैं सही नजरिये से और प्रशंसा के साथ देख रहा हूँ|’ इसमें शुभ निष्ठा, और उद्देश्य में निश्चितता है|

कथित पत्र और श्रीमान् टाटा के प्रयास को इंडियन ओपिनियन में दर्शाते हुए गॉंधीजी ने लिखा कि ‘हिन्दुस्तान जागा है यह बात श्री रतनजी जमशेदजी टाटा के महान दान से प्रकट है| उन्होंने २५,००० रु. की बड़ी रकम देकर संघर्ष के दिनों में मदद को बहुत बढ़ावा दिया है| आशा है कि अन्य भारतीय भी ऐसा ही करेंगे|’५

करीब एक साल बाद श्रीमान् टाटा ने दूसरे २५,००० रुपये का दान भेजा| उसकी प्राप्ति स्वीकार करते हुए इंडियन ओपिनियन में दर्शाया कि ‘श्री टाटा ने सत्याग्रह-संघर्ष के लिए दूसरी बार २५,००० रुपयों की रकम देकर दिखा दिया है कि हमारे प्रति उनकी बहुत गहरी सहानुभूति है| वे संघर्ष के महत्त्व को भली प्रकार समझते हैं| श्री टाटा से प्राप्त हुई अन्य रकम को मिलाकर भारत में कुल सवा लाख रुपये एकत्रित हुए हैं| इस धन-राशि का द्विपंचमांश अकेले श्री टाटा ने दिया है| यह कोई मामूली दान नहीं है| ...श्री टाटा भलीभॉंति जानते हैं कि यह संघर्ष स्वार्थमूलक नहीं है, बल्कि समूचे भारत की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है|’६

श्री टाटा यहॉं से नहीं रुके उन्होंने दक्षिण अफ्रीका की लड़त को तीसरी बार २५,००० रुपये का दान दिया, तब इंडियन ओपिनियन में गॉंधीजी ने ‘श्री टाटा की उदारता’ शीर्षक के साथ दर्शाया कि ‘श्री टाटा ने दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह-कोष में तीसरी बार २५,००० रु. का दान दिया है| यह अपने आपमें एक खासी बड़ी निधि है| ...श्री टाटा की उदारता से उनके हृदय की विशालता प्रकट होती ही है, यह भी पता लगता है कि वह इस संघर्ष के कितने प्रशंसक हैं|७ श्रीमान् टाटा ने सत्याग्रह की लड़त में कुल मिलाकर ७५,००० रुपये की यथासमय उदारतापूर्ण सहायता दी|

श्रीमान् पोलक ने मुंबई के श्रीमान् जहांगीर पिटीट को एक पत्र लिखा जिसमें सत्याग्रह की लड़त को आर्थिक सहायता देने के लिए लोगों को बिनती की| मि. पिटीट और गोखले की बिनती से जगह-जगह पर लोगों ने दान दिया, इसमें मुख्यतः डॉ. प्राणजीवनदास मेहता के प्रयत्न से करीब बीस हजार रुपये आये| उस वक्त सरकसवाले प्रो. राममूर्ति ने एक खेल आयोजित करके रु. तेरह सो फंड में दिया| बंगाल के डॉ. राशबिहारी घोष ने एक हजार दिये, लखनऊ के राजा पृथ्वीपालसिंह ने पंद्रह सो रुपया दिया, नामदार आगाखॉं ने चार हजार रुपया दिये, नामदार निझाम ने रू. पच्चीस सो अर्पण किये, गोंडल के ठाकोर साहेब, कासीम बजार के महाराजा, श्रीमान् पलीत और श्रीमान् पी. डी. नारायणसिंग सभी ने एक-एक हजार प्रस्तुत किया| इसके अलावा दूसरे छोटे-बड़े दान तो बहुत मात्रा में आये| पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन श्रीमती विजयालक्ष्मी पंडित के ससुर बेरिस्टर श्रीमान् सीताराम नारायण पंडित ने सो रुपया देकर लड़त में सहयोग किया|८

दिसम्बर १९०९ के अन्त में हिंदी राष्ट्रीय महासभा का अधिवेशन लाहोर में आयोजित हुआ था, उस वक्त सुरेन्द्रनाथ बेनरजी ने लड़त में सहयोग करने के लिए उपस्थित लोगों को अपील की| इस अपील का प्रत्युत्तर देते हुए श्रीमती सरलादेवी चौधराणी ने अपने हाथ में पहनी सोने के कंगन उसी वक्त निकालकर दी, और सभा में उपस्थित लोगों ने करीब एक घन्टे तक मुद्रा, धन और आभूषण की बारिश की|

इस फंड में एकत्रित हुए रुपये की व्यवस्था एवं अधिक रुपैया एकत्रित करने के लिए मुंबई में एक समिति का गठन किया गया, उसके प्रमुख स्थान पर सम्मानीय आगाखॉं, श्रीमान् आर. जे. टाटा उपप्रमुख और श्रीमान् जहांगीर पिटीट मंत्री थे|

इस प्रकार से एक ओर से योगदान इकट्ठा होने लगा और दूसरी ओर से ट्रान्सवाल में खर्च कम करने के उपाय अजमाये जाने लगे|

लड़त का मुखपत्र इंडियन ओपीनियन था, यह लड़त के प्रचार-प्रसार में बहुत खर्च हुआ इस वजह से कर्ज का बोझ बढ़ गया था| इंडियन ओपिनियन का खर्च कम करने के लिए १९१० से आकार कम कर दिया गया, और स्वरूप बदल कर मुखपृष्ठ बंद कर दिया गया| इंडियन ओपिनियन कभी व्यापार की दृष्टि से नहीं चलाया गया| मतलब उसमें मुनाफा तो होता ही नहीं था|

दूसरे चरण के लिए भारतीय मण्डल ने सत्याग्रहियों की जमानत के लिए जाना बंद कर दिया था| अब तक ऐसा था की जब किसी सत्याग्रही को जमानत पर रिहा करने की आवश्यकता होती थी तब हिंदी मण्डल उनका इन्तजाम करता था| किन्तु अब इस व्यवस्था को बन्द कर दिया, अगर किसी को अपने कार्य व व्यवसाय के संबन्ध में छूटना रहा तो वो स्वयं ही व्यवस्था करते थे|

तीसरे चरण के लिए, जेल में कैदियों को कम खुराक पर तनहाई की सजा मिलती थी| इस वजह से जेल में बंद सत्याग्रही बाहर से

खाना मंगवाते थे, पर खर्च कम करने के लिए बाहर से खाना मंगवाने को मना कर दिया गया| इसके अलावा, इस समय में सत्याग्रहियों को तृतीय श्रेणी में रेल यात्रा करने का निर्णय लिया गया| ऐसे प्रयासों से खर्च में कटौती की गई|

हिंद में एकत्रित हुआ फंड गॉंधीजी को ही भेजने में आता था, इसलिए उनके लेखांकन सम्बन्धी दायित्व गॉंधीजी को ही दर्शाना था| फंड के उपयोग की संपूर्ण सत्ता गॉंधीजी को दे दी गई थी फिर भी खर्च करने के लिए वो हिंदी मण्डल के प्रमुख श्रीमान् काचलिया की अनुमति अवश्य प्राप्त करते थे|

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है की सभी पैसों का उचित उपयोग एवं पारदर्शक व्यवहार लोगों के सामने प्रस्तुत करना यह भी अत्यंत आवश्यक है| गॉंधीजी के द्वारा यह दोनों मामले में विशेष रूप से देखभाल रखा गया| केवल पैसा एकट्ठे करने का हेतु न था| आवश्यकता से अधिक पैसा न रखने का तत्त्व भी वह समझ चुके थे|

दक्षिण अफ्रीका गॉंधीजी के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ| यहॉं उन्हें अलग-अलग तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा| परिणामतः इन अनुभवों ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया| दक्षिण अफ्रीका की लड़ाई ही निरक्षरों की थी और उसके योद्धा भी निरक्षर थे| वह गरीबों की लड़ाई थी और गरीब ही उसमें जूझे थे| महात्मा गॉंधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में बिताया हुआ समय अपनी कहानी चिरकाल तक कहता रहेगा|

सन्दर्भ -

१) मा.सां.कन्नमवार (१९५९) भारताचा थोर भिक्षेकरी गॉंधी; (मराठी);

२) पत्रः पारसी रुस्तमजी को, सं. गां. वा. खण्ड ३, २६८; ३) सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा (२०१२), मो. क. गॉंधी, पृ. २००; ४) सत्याग्रहनी लड़त - चंदुलाल भगुभाई दलाल; ५) टाटा का दान, इंडियन ओपिनियन, ११-१२-१९०९;

६) श्री टाटा और सत्याग्रही, सं. गां. वा. खण्ड १०; ७) श्री टाटा की उदारता, सं. गां. वा. खण्ड ११; ८) सत्याग्रहनी लड़त - चंदुलाल भगुभाई दलाल

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