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Articles - गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष - लोकमान्य तिलक

महात्मा गॉंधी और लोकमान्य तिलक समकालीन रहे| भारतीय इतिहास में दोनों का योगदान अतुलनिय रहा| दोनों के रास्ते भिन्न थे, किन्तु मंजिल एक ‘स्वराज’| लोकमान्य के प्रति अपना आदऱभाव प्रकट करते हुए ‘यंग इन्डिया’ में गॉंधीजी ने दर्शाया कि मैं अपने करोडों दूसरे देशवासियों की भांति, लोकमान्य की अदम्य इच्छाशक्ति, उनकी अपार विद्वत्ता, उनके देशप्रेम और सबसे अधिक उनके व्यक्तिगत जीवनी की पवित्रता और उनके महान त्याग के कारण उनका प्रशंसक हूँ|... मैं पूरी नम्रता के साथ यह दावा भी करता हूँ कि मैं उनके सन्देश को जनता तक पहुँचाने के लिए उतनी ही सच्चाई से काम करता हूँ जितना उनका अच्छे से अच्छा शिष्य कर सकता है| उक्त कथन यह दर्शाता है कि गॉंधीजी के ऊपर लोकमान्य का प्रभाव था| ‘गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष’ श्रृंखला में पाठकों के समक्ष प्रस्तृत है महात्मा गॉंधी और लोकमान्य तिलक पर यह लेख|- सम्पादक

बाल गंगाधर तिलक का जन्म २३ जुलाई, सन् १८५६ ई. को भारत के रत्नागिरी नामक स्थान पर एक सुसंस्कृत, मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था| बाल गंगाधर तिलक अपने पिता की मृत्यु के बाद १६ वर्ष की उम्र में अनाथ हो गए| उन्होंने तब भी बिना किसी व्यवधान के अपनी शिक्षा जारी रखी और अपने पिता की मृत्यु के चार महीने के अंदर मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली| वे ‘डेक्कन कॉलेज’ में भर्ती हो गए फिर उन्होंने सन् १८७६ ई. में बी. ए. आनर्स की परीक्षा वहीं से पास की सन् १८७९ ई. में उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से एल.एल.बी. की परीक्षा पास की| उनका सार्वजनिक जीवन १८८० में एक शिक्षक और शिक्षा संस्था के संस्थापक के रूप में आरम्भ हुआ| इसके बाद केसरी और मराठा उनकी आवाज के पर्याय बन गए|

दो साप्ताहिक समाचार पत्रों, मराठी में ‘केसरी’ और अंग्रेजी में ‘द मराठा’, के माध्यम से लोगों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम शुरू किया| इन समाचार पत्रों के ज़रिये ब्रिटिश शासन तथा उदार राष्ट्रवादियों की, जो पश्चिमी तर्ज़ पर सामाजिक सुधारों एवं संवैधानिक तरीक़े से राजनीतिक सुधारों का पक्ष लेते थे, कटु आलोचना के लिए वह विख्यात हो गए| उनका मानना था कि सामाजिक सुधार में जनशक्ति खर्च करने से वह स्वाधीनता के राजनीतिक संघर्ष में पूरी तरह नहीं लग पाएगी|

भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार उग्र थे| नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधि मंडल भेजने में विश्वास रखते थे| तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे-मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया| इस मामले पर १९०७ ई. में कॉंग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ|

साप्ताहिक समाचारपत्र ‘केसरी’ में छपे अपने चर्चित लेख के कारण सन् १९०८ में सरकार ने उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया| ६ वर्ष कैद की सजा सुनाई| तिलक को सजा काटने के लिए मंडाले बर्मा में निर्वासित कर दिया| ‘मंडाले जेल’ में तिलक ने अपनी महान कृति ‘भगवद्गीता - रहस्य’ का लेखन शुरू किया, जो हिन्दुओं की सबसे पवित्र पुस्तक की मूल टीका है| तिलक ने भगवद्गीता के इस रूढ़िवादी सार को ख़ारिज कर दिया कि यह पुस्तक संन्यास की शिक्षा देती है; उनके अनुसार, इससे मानवता के प्रति नि:स्वार्थ सेवा का संदेश मिलता है| तिलक ऐसे प्रथम नेता थे जिन्होंने स्वराज्य की बात कही और लोगों को गुलामी से घृणा करना सिखाया| उन्होंने देश की आजादी के लिए लोगों को संगठित होना सिखाया और जनता को उनकी शक्ति का अहसास करवाया| उन्होंने स्वराज्य पर बल देते हुए कहा कि ‘‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं उसे लेकर ही रहूँगा|’’ यह मात्र विचार ही नहीं था इसके लिए उन्होंने संघर्ष भी किया और जनता में स्वराज्य की अलख जगाई|

गॉंधीजी जब १८९६ में दक्षिण अफ्रीका से पहली बार भारत आये, तब उनका मक्सद यह रहा की दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों की स्थिति के बारे में अपने देश से कोई ठोस कदम उठे| इसी उद्देश्य से उन्होंने भारत के प्रमुख शहरों में सभायें आयोजित करने का निश्चय किया| यह कार्य के लिए गॉंधीजी को प्रमुख दल के नेताओं से भी भेंट करनी थी और उनसे हो सके उतनी मदद प्राप्त करनी थी| ‘‘सब पक्षों की मदद लेने का आपका विचार बिलकुल ठीक है| आपके मामले में कोई मतभेद हो ही नहीं सकता|... मैं आपकी पूरी मदद करना चाहता हूँ| आप प्रो. गोखले से तो मिलेंगे ही| मेरे पास आप जब आना चाहें, निःसंकोच आइये|’’१ यह गॉंधीजी और लोकमान्यजी की पहली मुलाकात थी| गॉंधीजी लिखते हैं कि ‘लोकमान्य का यह मेरा प्रथम दर्शन था|’ दर्शन शब्द पवित्रता का सूचक है, व्यक्ति के प्रति आदरभाव को दर्शाता है|

तिलक का राष्ट्रवाद उग्र, तेजस्वी एवं राजनीतिक या राष्ट्रीयता का अग्रदूत माना जाता है| तिलक ने भारतीय राष्ट्रवाद को धार्मिक आधार प्रदान किया| धर्म को राष्ट्रीयता का एक तत्त्व मानते हुए उसे राष्ट्रीय एकीकरण का आधार माना| गॉंधीजी का राष्ट्रवाद उदार एवं विश्वमैत्री को बढ़ावा देने वाला है| गॉंधीजी ने राजनीति का आध्यात्मीकरण किया यानी राजनीति में श्रेष्ठ मूल्यों का अवतरण हो एवं राजनीति मनुष्य की प्रगति का माध्यम बने, ऐसा उनका विचार था|

कर्मक्षेत्र पर तिलकजी का प्रभुत्व रहा, वैसा ही गॉंधीजी का आध्यात्मिक शक्ति के क्षेत्र में रहा| लोकमान्य तिलक राजनीतिज्ञ भी थे, वे साफ-साफ कहते थे ‘राजनीति साधुओं के लिए नहीं है|’ लोकमान्य ने तो यहॉं तक कहा था कि ज़रूरत पड़ने पर वे स्वाधीनता के लिए सत्य की भी बलि दे सकते हैं| उनमें निर्विवाद न्यायपरायणता थी और उनका जीवन निष्कलंक तथा पवित्र था| उन्होंने यह कहने में संकोच नहीं किया कि राजनीति में सब कुछ उचित है| लेकिन इसके बारे में गॉंधीजी की विचारधारा नितांत अपरिवर्तनीय थी| एक दूसरे के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हुए भी गॉंधीजी और तिलकजी ने जब कभी अपने विचारों के संबंध में चर्चा की, उससे उनकी विभिन्न प्रणालियों का विरोध ही प्रमाणित हुआ है| इसी से तिलक के सामने गॉंधीजी के लिए भी यह कहने के सिवा दूसरा उपाय न था कि जरूरत पड़ने पर वे सत्य की रक्षा के लिए स्वतन्त्रता की भी बलि दे सकते हैं|२ लोकमान्य तिलक, गॉंधीजी की तरह साधनों की पवित्रता एवं नैतिकता को साध्य की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं मानते थे| वे साधनों की नैतिकता की अपेक्षा, उनकी प्रभावशीलता को अधिक बल देते थे| महात्मा गॉंधी ने साध्य को जितना महत्त्व दिया उतना ही साधन को भी दिया| उनके दर्शन में इनको अलग नहीं किया जा सकता| हमारे साधन जितने शुद्ध होंगे ठीक उसी अनुपात में साध्य या ध्येय की और हमारी प्रगति होगी|

३१ मई १९१९ बम्बई कि सभा में गॉंधीजी ने कहा कि ‘सभी जानते हैं कि मेरे तरीकों का श्री तिलक के तरीकों से मेल नहीं है| फिर भी देश के प्रति उनकी महान सेवाओं, उनके आत्मत्याग तथा विद्वत्ता की प्रशंसा के अवसर प्राप्त होने पर मैं हर्षपूर्वक उसमें भाग लेना चाहूंगा|’३ गॉंधीजी कहते हैं कि मेरा उनके साथ हमेशा मतभेद रहा करता, पर वे सब मीठे थे| उन्होंने मुझे सदा यह मानने दिया था कि हमारे बीच निकट का सम्बन्ध है|४

महात्मा गॉंधी और लोकमान्य तिलक के बिच बहुत कुछ साम्यतायें रहीं, राष्ट्रभाषा, स्वेदशी, शिक्षा प्रणाली आदि, वे स्वदेशी चीजों को अपनाने का आग्रह करके, भारत में अंग्रेजी शासन के आर्थिक आधार पर प्रहार करना चाहते थे| तिलक स्वयं स्वदेशी का पालन करते थे, इसके बारे में टी.वी. पार्वते ने लिखा है कि, तिलक स्वयं अपने हाथ से काते हुए सूत से अपने ही घर में स्वदेशी करघे से बने हुए वस्त्रों का उपयोग करते थे|५ यह बहिष्कार आन्दोलन गॉंधीजी के असहयोग आन्दोलन की पूर्व सूचना थी|

तिलक के बीमार होने की खबर पर गॉंधीजी ने अपनी व्यथा प्रगट करते हुए नवजीवन में एक लेख प्रकाशित किया| ‘लोकमान्य तिलक की बीमारी ने गम्भीर रूप धारण कर लिया है, यह समाचार सुनकर लाखों भारतीयों के हृदय कांप उठे हैं| जन-जागृति में उन्होंने जो भाग लिया है, उन्होंने जिस स्वतन्त्र प्रवृत्ति का परिचय दिया है, जो बलिदान किये हैं, उनके कारण जनता उन्हें पूजती है| लाखों के लिए उनके वचन आदेश ही हैं| देश का स्वराज्य उनके जीवन का परम उद्देश्य है| आज जनता उनका वियोग सहन करने को तैयार नहीं है| जनता स्वयं इस समय गम्भीर रोग से पीड़ित है| उस रोग का निदान तथा उपचार करने में लोकमान्य ने प्रमुखता से भाग लिया है| इस समय जनता समस्त नेताओं की सेवाओं तथा सलाह की भूखी है| नेताओं में लोकमान्य उच्चतम स्थान पर प्रतिष्ठित हैं| उन्हें अपनी जिन्दगी में ही स्वराज्य मिल जाने की उम्मीद है, ऐसा भव्य है लोकमान्य का आशावाद| भगवान उन्हें व्याधिमुक्त करे, दीर्घायु दे तथा स्वराज्य के दर्शन कराये|’६

इलाहाबाद में तिलक विद्यालय, जबकि वह पहले राष्ट्रीय विद्यालय का नाम दिया जाने वाला था, के उद्घाटन समारोह में अपने भाषण में गॉंधीजी ने कहा कि स्वराज्य के लिए जितना आत्मत्याग श्री तिलक ने किया है उतना किसी दूसरे व्यक्ति ने नहीं किया| इसलिए उस महान देशभक्त के नाम पर इस विद्यालय का नाम रखा जाना उचित ही है|७ अगस्त १, १९१८ के दिन सूरत में हुए अपने भाषण में गॉंधीजी ने कहा की ‘श्री तिलक आपके लिए जितने पूज्य हैं उससे कहीं अधिक मैं उनको पूज्य मानता हूँ| उनको जितना आदर-सम्मान दिया जाये उतना कम है|’८ तिलक का व्यक्तित्व और चरित्र दृढ़ था और विचार उत्कृष्ट, जिसके कारण उदारवादी नेता उनसे वैचारिक मतभेद रखते हुए भी उनके प्रति गम्भीर व्यक्तिगत सम्मान रखते थे|

१ अगस्त १९२० ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का क्षणभंगुर देह पात हो गया, लेकिन उनके विचार आज भी लोगो को प्रेरित करते रहे हैं| लोकमान्य को श्रद्धांजलि देते हुए गॉंधीजी ने कहा कि लोकमान्य तिलक अब संसार में नहीं है| यह विश्वास करना कठिन मालूम होता है कि वह संसार से उठ गये| हम लोगों के समय में ऐसा दूसरा कोई नहीं जिसका जनता पर लोकमान्य के जैसा प्रभाव हो| हजारों देशवासियों की उन पर जो भक्ति और श्रद्धा थी वह अपूर्व थी| यह अक्षरशः सत्य है कि वह जनता के आराध्यदेव थे, प्रतिमा थे, पुरुषों में पुरुषसिंह संसार से उठ गया| केसरी की घोर गर्जना विलीन हो गई|९ भारत की भावी संतति के हृदय में भी यही भाव बना रहेगा कि लोकमान्य नवीन भारत को बनानेवाले थे| वह तिलक महाराज का स्मरण यह कहकर करेंगे कि एक पुरुष था जो हमारे लिए ही जन्मा और हमारे लिए ही मरा| ऐसे महापुरुष को मरना कहना ईश्वर की निन्दा करना है|१०

‘लोकमान्य तो एक ही थे| लोगों ने तिलक महाराज को जो पदवी, जो उच्च स्थान दिया था वह राजाओं के दिये किताबों से लाख गुना कीमती था|... इस जमाने में किसी भी लोकमान्य को ऐसी मृत्यु का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था| दादाभाई गये, फिरोजशाह गये, गोखले भी चले गये| सबके साथ हजारों लोग स्मशान तक गये थे, पर तिलक महाराज ने तो हद कर दी| उनके पीछे तो सारी दुनियां गई|... जिसे हम पूजनीय मानते हैं उसकी सच्ची पूजा तो उसके सद्गुणों का अनुकरण करना ही है| लोकमान्य अत्यन्त सादगी के साथ रहते थे| उनके स्मरण के लिए हमें भी अपना जीवन सादा बनाना चाहिए|’११ श्री तिलक देश के लिए जिये| उनके जीवन का उद्देश्य देश की स्वतन्त्रता, जिसे वे स्वराज्य कहते थे, प्राप्त करना था और जब वे मृत्यु-शय्या पर पड़े हुए थे, तब भी उन्हें इसी स्वतन्त्रता की धुन लगी हुई थी| अपने देशभाइयों पर उनके इतने जबरदस्त प्रभाव का यही कारण था, अपने इसी देश प्रेम के कारण उन्हें समाज के कुछ गिने-चुने उच्चवर्गीय लोगों का ही नहीं, बल्कि अपने लाखों-करोड़ों देशभाइयों का प्रेम प्राप्त था| उनका जीवन सत्य आत्मबलिदान की एक दीर्घ गाथा ही है| अतएव लोकमान्य तिलक मरकर भी हमें जीवन का मंत्र सिखा गये हैं|

कॉंग्रेस कमेटी ने तिलक मेमोरियल फंड इकट्ठा करने के सम्बन्ध में निर्णय किया, तब गॉंधीजी ने कहा मेरा ध्येय अब तिलक स्वराज्य कोष से है| तिलक स्वराज्य कोष के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया और एक करोड़ रुपया इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा, ताकि भव्य तिलक स्मारक बनाया जाय एवं स्वराज्य प्राप्त करने कि दिशा में उनका उपयोग हो| तिलक स्मारक के संदर्भ में गॉंधीजी का खयाल रहा कि ‘यह एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति का समुचित और भव्य सम्मान होगा, जिसने स्वराज्य-प्राप्ति के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया|’१२ किसी व्यक्ति की स्मृति का सच्चा आदर इसी में है कि उसके जीवन के उद्देश्य को पूरा किया जाये| जिन्हें लोकमान्य कहने में भारत को पहले भी बड़ी खुशी होती थी और अब भी बड़ा हर्ष होता है, उन बाल गंगाधर तिलक की स्मृति का सच्चा आदर इसी में होगा कि स्वराज्य की स्थापना करके उनकी स्मृति को अमर बना दिया जाये|१३

महात्मा गॉंधी एवं लोकमान्य तिलक भारत के उन महापुरुषों में एक थे जो चिन्तन एवं कर्मक्षेत्रे दोनों में समान रूप से सक्रिय थे| उनके माध्यम से भारतीय संदर्भ को एक नई दिशा प्राप्त हुई है|

सन्दर्भ -

१) आत्मकथा, मो. क. गॉंधी, पृ. १६१; २) महात्मा गॉंधी जीवन और दर्शन रोमां रोलां, पृ १६-१७; ३) सम्पूर्ण गॉंधी वाड़्मय, खंड १५, पृ. ३४५; ४) आत्मकथा पृ. ४५०; ५) बालगंगाधर तिलक, टी.वी.पार्वते, पृ. ३११-३१२; ६) नवजीवन, १-८-१९२०; ७) सम्पूर्ण गॉंधी वाड़्मय, खंड, १९, पृ. ५९; ८) सम्पूर्ण गॉंधी वाड़्मय, खंड १५, पृ ३; ९) यंग इंडिया, ४-८-१९२०; १०) यंग इंडिया, ४-८-१९२०; ११) हिन्दी नवजीवन, ६-८-१९२२; १२) यंग इंडिया, १६-३-१९२१; १३) यंग इंडिया, २२-६-१९२१

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