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Articles - महात्मा गॉंधी पर गोखले का प्रभाव

गॉंधीजी ने गोपाल कृष्ण गोखले में भारत के आदर्श सेवक के दर्शन किए, यहॉं तक कि उन्हें अपना राजनीतिक गुरु माना और उनके जीवन तथा मिशन के अनुसार भारत के राजनीतिक क्षेत्र में अपने जीवन और कार्य को ढालने का प्रयत्न किया| गॉंधीजी ने गोखले को महात्मा की उपाधि प्रदान की है| गॉंधीजी स्वयं उस समय तक महात्मा नहीं बने थे और भारतीय जगत् गोखले का उल्लेख माननीय गोखले के नाम से करता था| परन्तु गॉंधीजी ने अपने हृदय में उन्हें आदर्श महात्मा के रूप में स्थान दिया और उनकी स्थापना की, उस पद के साथ तादात्म्य सिद्ध करने का आदर्श अपने सामने रखा और उन्होंने जो भी गुण अपने गुरु में देखे, उन सबको अधिक मात्रा में अपने में प्रकट कर दिखाया| जैसी धन्यता यम को नचिकेता जैसा शिष्य प्राप्त करने से अनुभव हुई थी, वैसी ही धन्यता गोखले को गॉंधी, शास्त्री तथा ठक्कर जैसे शिष्यों से प्राप्त हुई थी|

गॉंधीजी से गोखले की प्रथम मुलाकात पूना के फरग्यूसन कॉलेज में हुई| सर फिरोज शाह मेहता की सलाह पर वे बम्बई से पूना गये| वहॉं वे लोकमान्य तिलक से भी मिले और इन दोनों नेताओं से बहुत प्रभावित हुए| गॉंधीजी लिखते हैं कि, फिरोजशाह मेहता तो मुझे हिमालय जैसे लगे, लोकमान्य समुद्र के समान तो गोखले गंगा से जान पड़े| उसमें मैं नहा सकता हूँ, हिमालय पर चढ़ा नहीं जा सकता, समुद्र में डूबने का डर रहता है, पर गंगा की गोद में तो क्रीड़ा की जा सकती है|२ गॉंधीजी कलकत्ता में गोखलेजी के साथ एक माह तक रहे| वहॉं गोखले ने उन्हें डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र राय जैसे लोकहित में सर्वस्व निछावर कर देने वाले व्यक्तित्व से मिलवाया| गॉंधीजी लिखते हैं कि गोखले की काम करने की रीति से मुझे जितना आनन्द हुआ उतनी ही शिक्षा भी मिली| वे अपना एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देते थे| मैंने अनुभव किया कि उनके सारे सम्बन्ध देशकार्य निमित्त थे| सारी चर्चायें भी देशकार्य के खातिर ही होती थीं| उनकी बातों में मुझे मलिनता, दम्भ अथवा झूठ के दर्शन नहीं हुये| हिन्दुस्तान की गरीबी और गुला़मी उन्हें प्रतिक्षण चुभती थी|३ गोखले की छत्रछाया में बंगाल में मेरा कार्य आसान हो गया| उसी समय गोखलेजी की सलाह पर गॉंधीजी ने हिन्दुस्तान की एक छोटी यात्रा की थी| इस यात्रा में उन्हें काफी समर्थन मिला था|

मैंने गोखलेजी से प्रार्थना की आप द. अफ्रीका आयें और वहॉं भारतीयों की स्थिति देखें| १९११ में गोखले विलायत में थे| उन्होंने

द. अफ्रीका के संग्राम का अध्ययन तो किया ही था, बड़ी कौंसिल में बहस भी की थी और गिरमिटियों के नेटाल भेजना बंद कर देने का प्रस्ताव भी पेश किया था (२५ फरवरी १९१०) जो पास हुआ था| गॉंधीजी लिखते हैं कि ‘हमारी सत्याग्रह की लड़ाई का उनपर इतना गहरा असर हुआ कि हमारे आमन्त्रण पर गोखलेजी तबियत खराब होने पर भी २२ अक्टूबर १९१२ में द.अफ्रीका पहुँचे| हमनें उनका वहॉं भव्य स्वागत किया| उनका स्वास्थ्य नाजुक था परन्तु वहॉं कई सम्मेलनों में उन्होंने भाग लिया| केपटाउन में उनकी पहली बड़ी सभा हुई| जोहान्सबर्ग में दिया गया उनका भाषण बहुत प्रभावशाली रहा| फिर वे जोहान्सबर्ग तथा ट्रान्सवाल गये जो युद्ध का कुरुक्षेत्र था| इसके बाद उनसे मुलाकात टॉलस्टॉय फार्म तथा प्रिटोरिया में हुई| प्रिटारिया में उन्हें यूनियन सरकार की ओर से निमन्त्रण था| वहां वे जनरल बोथा, जनरल स्मट्स तथा केलनबैक से मिले| ट्रान्सवाल से वे डरबन, मेरित्सबर्ग आदि स्थानों पर गए तथा १७ नवम्बर १९१२ को वापस हिन्दुस्तान लौट गए| उनकी द. अफ्रीका

की यात्रा ने अपने निश्‍चय में हमें अधिक दृढ़ किया| उनकी यात्रा का ही प्रभाव था कि १८१५ से दिये जा रहे तीन पौंड के कर को सत्याग्रह के जरिए हटवाने में मदद मिली| हिन्दुस्तान से मि. एण्ड्रूज तथा मि. पियर्सन यदि भारत से द.अफ्रीका गये तो यह गोखले का ही प्रभाव था|४ दक्षिण अफ्रीका में वहॉं के नेता मि. मेरीमन ने गोखले से कहा था कि

साहब, आपके जैसे पुरुष जब हमारी भूमि पर आते हैं, तब हमारा वातावरण पवित्र बनता है|

महात्मा गोखले की गिरमिट प्रथा संबन्धी प्रवृत्ति उनकी तन्मयता का जैसा बोध कराती है, वैसी दूसरी एक भी प्रवृत्ति नहीं कराती| उनका

द. अफ्रीका प्रवास और उसके बाद भारत में चलाया गया आन्दोलन अपने कार्य में तन्मय हो जाने की उनकी शक्ति का हमें सुन्दर दर्शन कराते हैं| १९१४ में सत्याग्रह की लड़ाई का अन्त हो जाने पर मुझे गोखलेजी का लन्दन लौट आने का आदेश मिला| जुलाई में मैं कस्तूरबा और केलनबैक के साथ इंग्लैड रवाना हो गया| मैं वहॉं पसली का वर्म होने से अस्वस्थ हो गया और भारत आ गया| इसके बाद मैं गोखलेजी से पूना में मिला| वहॉं भारत सेवक समाज के सदस्यों से मिला| वहीं उन्होंने गुजरात में आश्रम खोलने के लिये धन की कमी न होने देने का भरोसा मुझे दिलाया|

पूना में हमारी पहली मुलाकात के समय हम दोनों के बीच प्रेम की जो गॉंठ बंधी, वह दूसरे किसी नेता और मेरे बीच नहीं बंधी| महात्मा गोखले के विषय में मैंने जो कुछ सुना था, उसका मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया, लेकिन उनके मुखबिन्दु की कोमलता ने मेरे मन पर जो असर किया, उसे मैं आज भी नहीं भूल सका हूं|५ १८९६ के समागम के बाद गोखले का राजनीतिक जीवन मेरे लिए आदर्श बन गया| उनमें निर्भयता का बहुत बड़ा गुण था| धर्मनिष्ठा में इस गुण का प्रथम स्थान है| उन्होंने धर्म का दिखावा कभी नहीं किया, पर उनका जीवन धर्ममय था| गोखले ने अपने भारत सेवक समाज और जनता के समक्ष यह भव्य उदाहरण पेश किया कि इस प्रवृत्ति को धर्म का स्वरूप दिया जाय तो राजनीतिक प्रवृत्ति मोक्ष का रास्ता दिखलानेवाली भी होगी| उन्होंने दृढ़ता पूर्वक कहा कि राजनीति प्रवृत्ति में जब तक धर्म प्रवृत्ति का प्रवेश नहीं होगा, तब तक वह शुष्क ही रहेगी|

शिष्यत्व निराली वस्तु है| १८८८ में दादाभाई के चरणों में भी बैठा| लेकिन वे अपने से दूर मालूम हुए| किन्तु गोखले की बात निराली है| उन्होंने मेरे हृदय में मेरे राजनीतिक गुरुजी की तरह निवास किया|

उनसे मिलने से पहले मेरे मन में भय था किन्तु उनकी प्रेमभरी मुखमुद्रा ने एक क्षण में मेरे मन का सारा भय दूर कर दिया| मेरे बारे में और

द. अफ्रीका के मेरे काम के बारे में उन्होंने बारीक से बारीक विगत पूछी| उन्होंने मेरा हृदय मन्दिर तत्काल जीत लिया और जब मैंने उनसे विदा ली, उस समय मेरे मन में एक ही ध्वनि उठी - यही है मेरा गुरु|६

शिष्य का गुरु के विषय में लिखना एक तरह से अशुद्धता ही होगी| सच्चा शिष्य तो गुरु में समा जाता है| इसलिये वह टीकाकार तो हो ही नहीं सकता| गोखले मेरे राजनीतिक गुरु थे, ऐसा मैंने कई बार कहा है| इसलिये उनके विषय में लिखने में मैं अपने को असमर्थ मानता हूं|७

किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं थे| १९०१ में हमारे बीच सामाजिक सुधारों के सम्बन्ध - उदाहरण के लिये विधवा विवाह के सम्बन्ध में मतभेद था| मेरे अहिंसा सम्बन्धी कठिन आदर्श से भी उनका स्पष्ट मतभेद था| लेकिन ऐसे मतभेद हममें से किसी के मार्ग में बाधक नहीं हुये| आज वे जीवित होते तो क्या करते, इस प्रश्‍न को लेकर कल्पना की तरंगें दौड़ाना मैंे पाप और नास्तिकता समझता हूं| मैं तो इतना जानता हूं कि आज भी उनकी ही छत्रछाया में मैं काम कर रहा होता|८ उन्होंने मेरे जीवन को प्रेरणा दी और आज भी दे रहे हैं| उनके अनुसार मैं अपने आपको पवित्र और धर्ममय बनाना चाहता हूं| मैेंनै इस आदर्श के लियेे अपने आपको अर्पण कर दिया है| सम्भव है इसे सिद्ध करने में मैं असफल रहूं, परन्तु जिस हद तक असफल रहूंगा, उसी हद तक अपने को मेरे गुरु का अयोग्य शिष्य मानूंगा|९

सन्दर्भ -

१) गोखले मेरे राजनीतिक गुरु पृ ३५; २) आत्मकथा, पृ. २२४-२५; ३) आत्मकथा, पृ. २०१; ४) दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह, पृ.३३९-४३; ५) गोखले मेरे राजनीतिक गुरु पृ. ३६; ६) वही पृ. ५३; ७) गोखले मेरे राजनतिक गुरु, पृ.४४-४५; ८) वही, पृ. ५३; ९) स्पीचेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गॉंधी, पृ. १०९-१०.

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