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Articles - गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष - गोपाल कृष्ण गोखले

गोपाल कृष्ण गोखले (१८६६-१९१५) एक महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, समाजसेवी, विचारक एवं सुधारक थे| वे अपने समय के अद्वितीय सांसद तथा राष्ट्रसेवी थे| वित्तीय मामलों की अद्वितीय समझ और उस पर अधिकार पूर्वक बहस की क्षमता के कारण उन्हें भारत का ग्लेडस्टोन कहा जाता था| उनका मानना था कि वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा भारत की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है| जननेता कहे जाने वाले गोखले नरमपंथी सुधारवादी थे| गॉंधीजी उन्हें अपना राजनीतिक गुरु मानते थे| गोपाल कृष्ण गोखले अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिसे गॉंधीजी ने अपना गुरु घोषित किया| यह दर्जा उनके अलावा अन्य किसी को नहीं दिया| आपके परामर्श पर ही उन्होंने सक्रिय राजनीति में भाग लेने से पूर्व एक वर्ष तक देश में घूमकर स्थिति का अध्ययन करने का निश्‍चय किया| अहिंसा के जरिये स्वतन्त्रता संग्राम की लड़ाई तथा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ आन्दोलन की प्रेरणा गॉंधीजी को श्री गोखले से ही मिली थी| अत: गॉंधीजी पर गोखलेजी का गहन प्रभाव था| इन्हीं प्रभावों को दर्शाता प्रस्तुत है यह लेख- सम्पादक

जीवन परिचय व प्रभाव स्त्रोत

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म सन १८६६ में कोल्हापूर के एक गरीब महाराष्ट्रियन ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उनके पिता श्री कृष्णराव श्रीधर गोखले एक स्वाभिमानी ब्राह्मण थे| पिता के असामयिक निधन ने गोखले को सहिष्णु और कर्मठ बना दिया था| प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय स्तर पर पूरी कर वे मुम्बई के एलफिनस्टन कॉलेज से १८८४ में बी. ए. किया| डेक्कन एज्यूकेशऩ सोसायटी द्वारा संचालित फरग्यूसन कॉलेज में वे अर्थशास्त्र और इतिहास के प्राध्यापक बने और २० वर्ष तक कुशल शिक्षक का दायित्व निभाया| लगभग उसी समय वे महाराष्ट्र के सुकरात कहे जानेवाले श्री महादेव गोविन्द रानाडे के सम्पर्क में आये जो उनके चरित्रिक विकास के प्रथम किरदार थे| १८८७ में क्वाटर्ली जर्नल ‘केशरी’ तथा बाद में सुधारक के वे सम्पादक बने| वे श्री रानाडे के साथ ‘सार्वजनिक’ त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक रहे| गोखलेजी मुम्बई की प्राविंसिएल कान्फरेन्स के ४ वर्ष तक मन्त्री रहे| गोखले का पहली बार राजनीति में प्रवेश १८८८ में इलाहाबाद में हुये कांग्रेस अधिवेशन से हुआ| १८९५ में पूना में हुई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में स्वागत् समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए| १९०२ में फारग्यूसन कॉलेज से प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वे इम्पीरियल लेजिस्लेटिव एसेम्बली के सदस्य चुने गए| उसी अर्से में केन्द्रीय धारासभा के बम्बई के प्रतिनिधि सर फिरोज शाह मेहता के अस्वस्थ होने के कारण उनके स्थान पर गोखले चुने गये| उन दिनों देश की राजनीति में दो प्रकार की विचारधारओं का प्राधान्य था- एक ओर लोकमान्य तिलक और लाला लजपत राय जैसे नेता गरम दल के थे तो दूसरी ओर संवैधानिक रीति से देश को स्वशासन की ओर ले जाने में विश्‍वास करने वाले गोपाल कृष्ण गोखले नरम दल के नेता थेे| आपका क्रान्ति में नहीं अपितु सुधारों में विश्‍वास था| १२ जून, १९०५ को उन्होंने भारत सेवक समाज की स्थापना की| इस संस्था का उद्देश्य देश सेवा के लिये लोगों को प्रशिक्षित करना था| इसी समय में मुम्बई की जनता ने उन्हें एक प्रतिनिधि के रूप में विलायत की जनता को हिन्दुस्तान की राजनीतिक परिस्थिति से परिचित कराने के लिए भेजा| इंग्लैण्ड रवाना होने से पहले बनारस कांग्रेस में अध्यक्षपद से उनका दिया गया भाषण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण था| १९०५ में श्री गोखले को कांग्रेस ने इंग्लैण्ड में ब्रिटिश नेताओं को भारत की संवैधानिक मांग के विषय में जागरूक करने के लिये भेजा| उन्होंने राजकीय तथा सार्वजनिक कार्यों के लिये सात बार इंग्लैण्ड की यात्रा की| भारत सेवक समाज की स्थापना गोखले द्वारा किया गया महत्त्वपूर्ण कार्य था| १९१२-१५ तक वे भारतीय लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष रहे| खराब स्वास्थ्य के कारण १९ फरवरी १९१५ को उनका निधन हो गया| ऐसे उदात्त जीवन का संदेश था- (१) सत्य के प्रति अडिगता, (२) अपनी भूल की सहज स्वीकृति, (३) लक्ष्य के प्रति निष्ठा तथा (४) नैतिक आदर्शों के प्रति आदरभाव| अपने अवसान के समय भारत सेवक समाज के सदस्यों बुलाकर कहा था मेरा जीवन चरित्र लिखने में तुम मत लगना, मेरी मूर्तियां खड़ी करने में समय न बिताना; यदि तुम भारत के सच्चे सेवक हो तो हमारे उद्देश्यों की पूर्ति में अर्थात् भारत की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर देना|१

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