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Articles - धर्मान्तरण और महात्मा गॉंधी

आज भारत में धर्मान्तरण का प्रश्‍न एक बार फिर बहुत तेजी से उठ खड़ा हुआ है| यह प्रश्‍न नया नहीें है, किन्तु जिस तरह से स्वयंभू धार्मिक नेताओं ने धर्मान्तरण के अर्थ को विद्रूपित करते हुये इसे नैतिकता का जामा पहनाने की कोशिश की है, वह चिन्ता का विषय है| धर्मान्तरण एक अभिशाप है जिसके विषय में यदि समय रहते नहीं चेता गया तो इसके दुष्परिणाम हमें भुगतने होंगे| हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध ये सभी धर्म एक भारतीय संस्कृति के गुलदस्ते में लगे भिन्न-भिन्न फूल हैं| ये सभी विभिन्नता में एकता के प्रतीक हैं किन्तु कुछ विदेशी धार्मिक संस्थायें धर्मान्तरण के माध्यम से हमारी संस्कृति की समरसता को तार-तार करने पर आमादा हैं| गॉंधीजी के समय भी धर्मान्तरण का प्रश्‍न खड़ा था, उस समय उन्होंने इस प्रश्‍न पर गम्भीर चिन्तन किया और लिखा| आइये जानते हैं धर्मान्तरण पर गॉंधीजी के विचार - सम्पादक

आज धर्मान्तरण का प्रश्‍न एक यक्ष प्रश्‍न बन कर उभरा है| आगरा में वेद नगर के बाद अब मलपुरा थाना क्षेत्र के गांव डावली में २०१४ में क्रिसमस की शाम एक मुस्लिम परिवार के विधिविधान से हिन्दू धर्म को अपनाने का मामला सामने आया है| गुजरात के वलसाड़ में १७० परिवारों के वापस हिन्दूू धर्म स्वीकार करने का मामला सामने आया है तब से हड़कम्प मचा हुआ है| न केवल आगरा परन्तु छत्तीसगढ़, झारखण्ड, रतलाम (म.प्र.) उड़ीसा आदि राज्यों में ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रलोभन देकर धर्मान्तरण का मामला सामने आया है|

यह धर्मान्तरण है क्या? धर्मान्तरण किसी नये धर्म को अपनाने का कार्य है जो धर्मान्तरित हो रहे व्यक्ति के पिछले धर्म से सर्वथा भिन्न हो| एक ही धर्म के किसी एक सम्प्रदाय से दूसरे में होनेवाले परिवर्तन को सामान्यतया धर्मान्तरण के बजाय पुनर्सम्बद्धता कहा जाता है| धर्मान्तरण अनेक कारणों से होता है जिनमें जातिवाद, ऊंच-नींच एक कारण है तथा भय, लालच तथा षड्यन्त्र दूसरा कारण है| इन धर्मान्तरणों में स्वेच्छा से होनेवाले सक्रिय धर्मान्तरण, मृत्यु शैय्या पर होनेवाला धर्मान्तरण, किसी लाभ के लिये किया जानेवाला तथा वैवाहिक धर्मान्तरण तथा बलपूर्वक किया जाने वाले धर्मान्तरण शामिल हैंं|

इतिहास के पन्नों में जायें तो हेलेनिस्टिक व रोमन काल में कुछ फैरिसी लोग उत्सुक नवदीक्षित थे और पूरे समाज में उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली| नवदीक्षित (झीेीशश्रूींश) शब्द यहूदी धर्म में धर्मान्तरित होनेवाले ठीक व्यक्ति का उल्लेख करने के लिये प्रयोग किया जाता है| ईसाई धर्म में होने वाला धर्मान्तरण किसी पूर्व गैर ईसाई व्यक्ति का ईसाइयत के रूप में होनेवाला धार्मिक परिवर्तन है| स्वाभाविक रूप से किसी का सच्चा धर्मान्तरण बल पूर्वक नहीं किया जा सकता| अधिकांश ईसाइयों का विश्‍वास है कि धर्म परिवर्तन जिसे ईसा मसीह के वचनों व कर्मों में धर्मोंपदेश को साझा करने के रूप में समझा जाता है, प्रत्येक ईसाई का उत्तरदायित्व है| ‘न्यू टेस्टामेन्ट’ के अनुसार ईसा ने अपने शिष्यों को सभी राष्ट्रों में जाने व शिष्य बनाने का आदेश दिया था|१ जिसे सामान्यत: ‘ग्रेट कमीशन’ के नाम से जाना जाता है| ईसाई धर्म में धर्मान्तरण की प्रक्रिया में ईसाई सम्प्रदायों के बीच कुछ अन्तर है| जैसे कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट में से अधिकांश प्रोटेस्टेन्ट मोक्ष प्राप्ति के लिये विश्‍वास के द्वारा धर्मान्तरण को मानते हैं| परन्तु ईसाई समुदाय का हर वर्ग ऐसा नहीं मानता|

इस्लाम की शिक्षा के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति जन्म से मुस्लिम होता है| क्योंकि जन्म लेनेवाले प्रत्येक शिशु का स्वाभाविक झुकाव अच्छाई की ओर और एक सच्चे ईश्‍वर की आराधना की ओर होता है लेकिन उसके अभिभावक और समाज उसे सीधे मार्ग से भटका सकते हैं| जब कोई व्यक्ति इस्लाम को स्वीकार करता है तो ऐसा माना जाता है कि वह अपनी मूल स्थिति में लौट आया है| हांलाकि इस्लाम की ओर धर्मान्तरण उसके सर्वाधिक समर्थित तत्त्वों में से एक है लेकिन इस्लाम से किसी अन्य धर्म में धर्मान्तरण को स्वधर्म त्याग का घोर पाप माना जाता है|

हिन्दुत्व धर्मान्तरण का समर्थन नहीं करता| यह स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है कि कोैन व्यक्ति हिन्दू कब बनता है क्योंकि हिन्दू धर्म ने कभी भी किसी धर्म को अपना प्रतिद्वन्द्वी नहीं माना| हिन्दुत्व की एक सामान्य अवधारणा है कि हिन्दू होने के लिये व्यक्ति को हिन्दू के रूप में जन्म लेना पड़ता है| यदि कोई व्यक्ति हिन्दू के रूप में जन्मा है तो वह सदा के लिये हिन्दू ही रहता है| हांलाकि भारतीय कानून किसी भी व्यक्ति को तभी हिन्दू के रूप में मान्यता प्रदान करता है जब वह स्वयं को हिन्दू घोषित करे| धर्मान्तरण की अवधारणा ही एक विरोधाभास है क्योंकि हिन्दू ग्रन्थ वेद और उपनिषद् सम्पूर्ण ़िवश्‍व को एक ही सत्य को देवता माननेवाला एक परिवार मानते हैं - ‘एकं सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति’२ अथवा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’|३ हिन्दू धर्म में सामूहिक धर्मान्तरण का कोई प्रमाण मौजूद नहीें है| हाल ही में हिन्दुत्व से धर्मान्तरित लोगों के पुन: धर्मान्तरण करने की अवधारणा का प्रचलन हुआ है| किन्तु यह धर्मान्तरण सदैव ही अन्य प्रमुख धर्मों के प्रचारीकरण (र्एींरपसशश्रळूरींळेप) धर्मान्तरण, धर्मपरिवर्तन तथा उन गतिविधियों के प्रतिक्रिया स्वरूप हुआ है| हिन्दू पुनर्जागरण आन्दोलनों के विकास के फलस्वरूप ऐसे लोगों के पुन: धर्मान्तरण के कार्य में गति आई है जो पहले हिन्दू थे या जिनके पूर्वज हिन्दू थे|

भारतीय संविधान भारत में सबको धार्मिक स्वतन्त्रता का मौलिक अधिकार देता है| धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद २५-२८ में दिया गया है| अनुच्छेद २५ सभी लोगों को विवेक की स्वतन्त्रता तथा अपनी पसन्द के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतन्त्रता की गारंटी देता है| यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा राज्य की सामाजिक कल्याण और सुधार के उपाय करने की शक्ति के अधीन होते हैं| किन्तु प्रचार के अधिकार में यह किसी अन्य व्यक्ति के धर्मान्तरण का अधिकार नहीं देता क्योंकि इससे उस व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन होता है| धारा २५ (१) में प्रचार को स्पष्ट करते हुये कहा गया है कि कोई भी धर्म अपने धर्म का प्रचार उसके सिद्धान्तों के आधार पर कर सकता है न कि धर्मान्तरण द्वारा| भारतीय संसद ने पहली बार १९५४ में धर्मान्तरण विधेयक का संज्ञान लिया| १९६० में फिर इसे लाया गया किन्तु अल्पसंख्यकों के भारी विरोध के कारण इसे पास नहीं कराया जा सका| १९६८ में मध्य प्रदेश में ‘मध्य प्रदेश धर्म स्वातन्त्र्य अधिनियम’ तथा उड़ीसा में ‘फ्रीडम ऑफ रिलिजन ऐक्ट’ लाया गया| इन कानूनों के तहत किसी को भी जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन करने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता| सिर्फ उसकी आस्था के बाद ही यह कदम वैध माना जायेगा|

आइये देखेंे मानवाधिकार इस बारे में क्या कहता है? मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के वैश्‍विक घोषणापत्र णपळींशव छरींळेपी णपर्ळींशीीरश्र ऊशलश्ररीरींळेप ेष र्कीारप ठळसहींी में धर्मान्तरण को एक मानवाधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है| प्रत्येक व्यक्ति के पास विचार, विवेक और धर्म की स्वतन्त्रता का अधिकार है| इस अधिकार में अपने धर्म या आस्था को बदलने की स्वतन्त्रता शामिल है (अनुच्छेद १८)| णपळींशव छरींळेपी णपर्ळींशीीरश्र ऊशलश्ररीरींळेप ेष र्कीारप ठळसहींी के अनुसार अपनी इच्छानुसार किसी धर्म या आस्था का पालन करने या उसे अपनाने की स्वतन्त्रता शामिल होगी (अनुच्छेद १८:१)| किसी भी व्यक्ति पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकेगा जिससे अपनी इच्छानुसार किसी धर्म या आस्था का पालन करने या उसे अपनाने की उसकी स्वतन्त्रता बाधित होती हो (अनुच्छेद १८.२)| अत: धर्मान्तरण यदि स्वेच्छा से हो तो उसमें किसी को कोई ऐतराज नहीं है| किन्तु वैसा होता नहीं, प्रलोभन देकर किये जानेवाले धर्मान्तरण को भी स्वेच्छा से हुआ धर्मान्तरण कहा जाता है|

धर्मान्तरण का सबसे अधिक लाभ यदि किसी को हुआ है तो वह मुसलमानों और ईसाइयों को हुआ है| यही कारण है कि जब १९७८ में लोकसभा में जनतादल के एक सांसद ओम प्रकाश पुरुषार्थी ने एक निजी विधेयक लाकर धर्मान्तरण के खिलाफ कानून बनाने की मांग की तो मुसलमान और ईसाई सड़कों पर उतर आये| राजधानी दिल्ली में इसके खिलाफ ईसाई संगठनों द्वारा जिस मार्च का आयोजन किया गया था, उसका नेतृत्व मदर टेरेसा ने किया था| मुसलमानों की तरफ से ज़माते उलेमा के अध्यक्ष असद मदनी भी मैदान में कूद पड़े थे| इनका तर्क था कि धर्मान्तरण पर पाबन्दी लगाना भारतीय संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा जिसकी धारा २५ के तहत प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है| हिन्दू धर्म का आधार धर्मान्तरण नहीं बल्कि जन्म है जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म में यह जरूरी नहीं कि जो बच्चा किसी मुसलमान या ईसाई परिवार में जन्म लिया हो उसे जन्म से ही उस धर्म का अनुगामी मान लिया जाय| ईसाई या मुसलमान बनने के लिये इन दोनों धर्मों के धर्माचार्य विशेष संस्कारों का आयोजन करते हैं|

इतिहास इस बात का साक्षी है कि हिन्दुओं ने कभी भी धर्मान्तरण का प्रयास नहीं किया जबकि अन्य धर्म धर्मान्तरण के सहारेे ही फैले हैं| बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन४ ने अपने एक लेख में स्पष्टत: कहा है कि गुर, प्रलोभन, बल एवं धमकी ये मुख्य कारण हैं जिनसे ईसाई एवं इस्लाम धर्म पूरे विश्‍व में फैल पाये| इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि इस देश में आज जो करोड़ों मुसलमान और ईसाई हैं, उनके पूर्वज कभी हिन्दू हुआ करते थे| जम्मू कश्मीर के नेशनल कान्फ्रेंस के प्रमुख नेता शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में यह स्वीकार किया हैे कि उनके दादा हिन्दू थे और उनका नाम प्रेमनाथ कौल था| उर्दू के प्रख्यात कवि और पाकिस्तान के प्रवर्तक शेख मुहम्मद इकबाल ने भी यह स्वीकार किया है कि उनके दादा का नाम रतनचन्द सप्रू था| यदि ऐसे लोग पुन: हिन्दू धर्म में वापसी चाहें तो किसी को ऐतराज क्यों?

हाल ही में आगरा में हुये धर्मान्तरण को कतिपय हिन्दू संगठन और सरकार घर वापसी की संज्ञा दे रहे हैं| यदि धर्मान्तरित हिन्दू अपने पुरुषों के धर्म में वापस आना चाहते हैं तो यह उनका पूर्ण और संवैधानिक अधिकार है| हिन्दू किसी पारसी, ईसाई या मुस्लिम का धर्मान्तरण नहीं कर रहे हैं बल्कि जो पहले हिन्दू थे और किन्हीं प्रलोभन या कारणों से किसी अन्य धर्म में दीक्षित हो गये थे और अब स्वेच्छा से अपनी गलती का एहसास होने पर अपने पुराने धर्म का वरण करना चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है? भारतीय संविधान हमें अन्त:करण की स्वतन्त्रता की गारंटी देता है, संविधान किसी भी धर्म को मानने और उसके प्रचार करने का अधिकार भी देता है| यदि धर्मान्तरण करने का प्रमुख लक्ष्य लेकर घूमनेवाले संसाधनों से लैस संगठित संगठनों को धर्मान्तरण की खुली छूट दी जाय तो आप घर वापसी जैसे अभियानों को कैसे रोक सकते हैं?

धर्मान्तरण पर गॉंधीजी के विचार

महात्मा गॉंधी के धर्मपरिवर्तन से सम्बन्धित विचार ‘हरिजन’ में २२ मार्च १९३५ के ‘डिप्लोरिंग कन्वर्जन’ नामक हेडिंग के अन्तर्गत विस्तार से दिये गये हैं| महात्मा गॉंधी के विचारों का मूल तत्त्व था भारतीयता के धागे में सभी देशवासियों को पिरोना| गॉंधीजी के शब्दों में उस भारत जिसे बनाने के लिये मैंने जीवन भर काम किया है, में सभी लोग चाहे वे किसी धर्म के हों, बराबर होंगे|५ मेरे लिये विभिन्न धर्म एक ही बगीचे के भिन्न-भिन्न सुन्दर फूल हैं अथवा एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखायें हैं|६ धर्म हर व्यक्ति का निजी मामला है, इसलिये धर्म को किसी दूसरे पर थोपा नहीं जाना चाहिये|

गॉंधीजी धर्मान्तरण के मुद्दे की गम्भीरता को भलीभांति समझते थे| चाहे वह ईसाइयों का नवदीक्षितीकरण (झीेीशश्रूींूूळपस) ही क्योंं न हो| धर्मान्तरण के विषय में गॉंधीजी ने कहा था कि ‘मैं विश्‍वास नहीं कर सकता कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का धर्मांतरण करे| दूसरे के धर्म को कम करके आंकना मेरा प्रयास कभी नहीं होना चाहिये| इसका अर्थ है सभी धर्मों के सच में विश्‍वास करना और उसका सम्मान करना| यही सच्ची विनम्रता हैै|’७ ‘जिस तरह से भारत और अन्य देशों में धर्मांतरण का कार्य चल रहा है मेरे लिये उससे सहमति रखना असम्भव है| यह विश्‍व में शान्ति की स्थापना में सबसे बड़ा अवरोध है| एक ईसाई क्यों किसी हिन्दू को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना चाहता है? वह उस हिन्दू से क्यों सन्तुष्ट नहीं है जो एक अच्छा इंसान या हिन्दूधर्मी हैै’|८ ‘व्यक्ति और उसके ईश्‍वर के बीच का सम्बन्ध नितान्त व्यक्तिगत है| मैं अपने पड़ोसी पर ऐसा कोई प्रभाव नहीं डाल सकता कि वह किस धर्म का सम्मान करता है, जब मैं स्वयं अपने धर्म का सम्मान करता हूं| विश्‍व के अनेक धार्मिक साहित्य को पढ़ने के बाद मुझे किसी ईसाई, मुसलमान, पारसी या ज्यू को यह कहने का कोई कारण नहीं दिखता कि तुम अपना धर्म परिवर्तित कर लो, अपेक्षा इसके कि मैं खुद अपने धर्म को परिवर्तित करने को सोचूं|’९ गॉंधी स्वीकार करते हैं कि किसी धर्म में जबरदस्ती धर्मांन्तरण का प्रावधान नहीं है|

दार्जिलिंग के स्कूल आफ लैंग्वेजेज में

इस कार्यक्रम में सी. एफ. एन्ड्रूज ने एक बार गॉंधीजी से पूछा था कि आप उस मनुष्य को क्या कहेंगे जो बहुत विचार और प्रार्थना के बाद यह कहे कि मुझे तो ईसाई बने बिना शान्ति और मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती? गॉंधीजी ने कहा कि ‘मैं कहूंगा कि यदि कोई गैर ईसाई या हिन्दू किसी ईसाई के पास आये और यह कहे तो ईसाई को कहना चाहिये कि धर्म बदलने में कल्याण खोजने की अपेक्षा वह एक अच्छा हिन्दू बनने का प्रयास करे’१०|

सी. एफ. एन्ड्रूज जो यह विचार पहले ही त्याग चुके थे कि ईसाई बने बिना व्यक्ति का उद्धार नहीं हो सकता, गॉंधीजी से पुन: पूछते हैं कि यदि आक्सफोर्ड ग्रुप मूवमेन्ट वाले आपके पुत्र का जीवन बदल दें और उसकी इच्छा धर्म परिवर्तन की हो जाय तो आप क्या कहेंगे? गॉंधीजी ने कहा कि मैं तो आक्सफोर्ड ग्रुप मूवमेन्ट वालों से यही कहूंगा कि वे लोग जितना चाहें उतने लोगों का जीवन बदल दें किन्तु उनका धर्म न बदलें| वे उन्हें अपने धर्मों की उत्तम बातों की तरफ उनका ध्यान दिला सकते हैं और उनके अनुसार जीवन बिताने का अनुरोध करके उनके जीवन में परिवर्तन कर सकते हैं|

एन्ड्रूज: मैं यह जरूर कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति को सचमुच धर्म-परिवर्तन की आवश्यकता हो तो मुझे उसके रास्ते में बाधक नहीं बनना चाहिये|

गॉंधीजी: परन्तु आप यह नहीं देखते कि आप तो उसे मौका ही नहीं देते? आप उससे जिरह तक नहीं करते| मान लीजिये की कोई ईसाई मेरे पास आता है और कहता है कि भागवत पढ़कर वह मुग्ध हो गया है और इसलिये अपने को हिन्दू घोषित करना चाहता है, तो मुझे उससे कहना चाहिये, नहीं! जो चीज भागवत देती है वह बाईबिल भी देती है| तुमने अभी तक उसका पता लगाने की कोशिश नहीं की है| कोशिश करो और अच्छे ईसाई बनो|

एन्ड्रूज: अगर कोई आग्रहपूर्वक कहता है कि वह अच्छा ईसाई बनेगा तो मैं उससे कहूँगा कि तुम्हें बनना हो तो बनो यद्यपि आप जानते हैं कि मैंने स्वयं अपने जीवन में मेरे पास आनेवाले उत्कट उत्साहियों को जोर देकर रोका है|

गॉंधीजी: अगर कोई आदमी बाईबिल में विश्‍वास रखना चाहता है तो वह ऐसा कहे, परन्तु उसे स्वयं अपना धर्म क्यों छोड़ देना चाहिये? इस धर्म परिवर्तन कराने की प्रवृत्ति से शान्ति नहीं होगी| धर्म अत्यन्त व्यक्तिगत वस्तु है|

गॉंधीजी ने अपना कथन जारी रखते हुए कहा, विचार कीजिये कि आप-परस्पर सहिष्णुता की स्थिति स्वीकार करने जा रहे हैं या सब धर्मों की समानता की| मेरी स्थिती यह है कि मूल में सब बड़े-बड़े धर्म समान हैं| हमको अपने धर्म की तरह दूसरे धर्म के लिए भी जन्मजात आदर होना चाहिये| ध्यान रहे कि मैं परस्पर सहिष्णुता नहीं, परन्तु सब धर्मों के लिये समान आदर चाहता हूँ|११

अन्त:करण सबके लिए एक ही वस्तु नहीं है| यद्यपि व्यक्तिगत आचरण के निर्णय के लिए वह अच्छा मार्गदर्शक है, लेकिन सब पर वही आचरण लादना सबके अन्त:करण की स्वतंत्रता में असह्य हस्तक्षेप करना होगा|१२

इस प्रकार हम देखते हैं कि गॉंधीजी किसी भी रूप में धर्मान्तरण के समर्थक नहीं थे| किन्तु आज कल जिसे तथाकथित घरवापसी की संज्ञा दी जा रही है, उसे उन्होंने गलत नहीं माना|

गॉंधीजी लिखते हैं कि ‘एक पत्र-लेखक ने धर्मान्तरण से सम्बन्धित मुझसे चार प्रश्‍न किये हैं, जो निम्न प्रकार हैं:

जिन हिन्दुओं ने किन्हीं कारणों से स्व धर्म का त्याग करके इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, वे अब हृदय से पछताते हैं और पुन: हिन्दू धर्म में आना चाहते हैं| हमें उन्हें वापस हिन्दू-धर्म में लेना चाहिए या नहीं? आप अपने लड़के हरिलाल का ही उदाहरण लें|१३

आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में दलित-वर्गों के लोग सामूहिक रूप से ईसाई धर्म में शामिल हो गये हैं| त्रावणकोर दरबार की घोषणा१४ के बाद से हरिजन-आन्दोलन वहॉं और लोकप्रिय हुआ तब से कुछ लोग अपने पूर्वजों के धर्म को फिर से स्वीकार कर लेना चाहते हैं| उनके बारे में आप क्या सलाह देंगे?

एक हिन्दू को अमुक लोभ देकर दूसरे धर्म में शामिल कर लिया जाता है| कुछ दिनों बाद उसकी आँखे खुल जाती हैं, और वह यहॉं आकर हमारा दरवाजा खटखटाता है| उसका हम स्वागत करेंगे या नहीं?

छोटे-छोटे हिन्दू बालक-बालिकाओं को अक्सर ये पादरी लोग हथिया लेते हैं और उनका धर्म-परिवर्तन कर देते हैं| कभी-कभी मुसलमान भी अपने यतीमखानों का उपयोग इस काम के लिए करते हैं| ऐसे लड़के और लड़कियां, अकेले या अपने अभिभावकों के साथ, ‘अगर हमारे पास आकर अपनी शुद्धि कराना चाहें, तो उस वक्त हमें क्या करना चाहिए?’

गॉंधीजी ने कहा कि ‘मेरी राय में ये सच्चे हृदय-परिवर्तन के उदाहरण नहीं हैं| अगर कोई आदमी डर से, जोर जबरदस्ती से, भूख से या कुछ रुपये-पैसे के लालच में आकर दूसरे धर्म में चला जाता है, तो उसे हृदय परिवर्तन का नाम नहीं दिया जा सकता है| हम सामूहिक धर्म-परिवर्तन के जिन प्रसंगों के विषय में इधर दो वर्ष से सुनते आ रहे हैं, उनमें से अधिकतर तो मेरे विचार में खोटे सिक्के हैं| सच्चा मत-परिवर्तन हृदय से होता है; किसी अजनबी आदमी की प्रेरणा से नहीं, बल्कि ईश्‍वर की प्रेरणा से होता है| कौन-सी आवाज मनुष्य की है और कौन-सी ईश्‍वर की, इसे तो हम हमेशा पहचान सकते हैं| पत्र-लेखक ने जो काल्पनिक दृष्टान्त दिये हैं, मैं मानता हूँ, वे सच्चे मत-परिवर्तन के दृष्टान्त नहीं हैं| इसलिए ऐेसे पश्‍चाताप करनेवालों को मैं बगैर किसी शोर-गुल के और निश्‍चय ही शुद्धि के बिना हिन्दू धर्म में दाखिल कर लूंगा| ऐसे लोगों को शुद्धि की जरूरत ही नहीं है| और चूँकि मेरी यह मान्यता है कि इस जगत् के सभी महान धर्म समान हैं, इसलिए यदि कोई आदमी जिस डाल पर बैठा हो उसे छोड़कर उसी वृक्ष की दूसरी डाल पर बैठ जाता है तो इससेे वह अपवित्र अथवा दूषित हो जाता है, सो मैं नहीं मानता| वह अगर अपनी मूल डाल पर फिर से बैठना चाहता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए| यह कहना उचित नहीं कि जिस कुटुम्ब में वह पहले था उसे छोड़कर वह चला गया, इसलिए उसने कोई पाप किया| और जब वह सच्चे हृदय से अपनी भूल का प्रायश्‍चित्त करता है और अपने धर्म में वापस आ जाता है तो जिस हदतक उसने भूल की थी उस हदतक वह उसका परिष्कार भी कर लेता है| इस तरह प्रायश्‍चित्त करके वह शुद्ध हो जाता है|’१५

सन्दर्भ -

१) मैथ्यू २८:१९, २) ॠग्वेद १:१६४:४६, ३) महा उपनिषद् अध्याय ६, पद्य ७२,

४) ढीळलज्ञी | ढीशरींी, उेशीलळेप, ढहीशरींी, ारपहरपवश्रळपस रपव शुींशीाळपरींळेप रीश ींहश ाशींहेवी लू ुहळलह उहीळीींळरपळींू रपव खीश्ररा ीिीशरव ींर्हीेीसर्हेीीं ींहश ुेीश्रव. खष ींहशीश ींुे ींेेश्री हरी पेीं लशशप रवेिींशव, पशळींहशी ेष ींहश ींुे ीशश्रळसळेपी र्ुेीश्रव हर्रींश लीेीीशव ींहश ींशीीळींेीळरश्र र्लेीपवरीळशी ेष थशीीं ईळर. ऋळपरपलळरश्र उहीेपळलश्रश २१ीीं ऊशलशालशी २०१४, ५) गॉंधी एण्ड कम्युनल हार्मोनी,१९४४ पृ. २७६, ६) हरिजन ६४:३२६, ७) यंग इंडिया, २३ अप्रैल १९२३, ८) हरिजन, ३० जनवरी, १९३७, ९) हरिजन, ३० सितम्बर, १९३५,

१०) वही, ११) हरिजन २८-११-३६, पृ. ३३०, १२-अ) यंग इंडिया, २३-९-२६, पृ. ३३४, १२-ब) मेरा धर्म, महात्मा गॉंधी, सम्पा. भारतन् कुमारप्पा, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,अहमदाबाद,१९६०, पृ. ३६३८, १३) देखिए खण्ड ६२, पृ. २३५ और ४९७ खण्ड ६३, पृ. ६-८ भी|, १४) देखिए खण्ड ६४, पृ. ५४-५५, १५) सम्पूर्ण गॉंधी वाङ्मय, खण्ड ६६, १ अगस्त १९३४ ३१ मार्च १९३८, पृ. १८१८२.

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