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Articles - गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष - जॉन रस्किन

जॉन रस्किन (१८१९-१९००) उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन के सबसे चर्चित कला और स्थापत्यकार तथा कला समालोचक थे| गॉंधीजी ने उन्हें तब जाना जब रस्किन स्वयं यूरोप के एक प्रसिद्ध मध्ययुगीन कला-आलोचक के रूप में तथा परिवर्तित हो रहे आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक तथा नैतिक मूल्यों पर अपनी कृतियों के माध्यम से विश्‍व स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुके थे| रस्किन के ‘अन टू दिस लास्ट’ पुस्तक का गॉंधीजी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा| इस पुस्तक के विषय में महात्मा गॉंधी ने लिखा है कि जिस पुस्तक ने मेरे जीवन में तत्काल महत्त्व का रचनात्मक परिवर्तन कराया, वह तो रस्किन की ‘अन टू दिस लास्ट’ ही थी| गॉंधीजी यह दावा करते हैं कि इस पुस्तक से उनके जीवन में तात्कालिक और व्यावहारिक परिवर्तन हुए| अपनी आत्मकथा में गॉंधी ने एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव नाम से एक पूरा अध्याय जान रस्किन के नाम से दिया है| प्रस्तुत है पाठकों के समक्ष जान रस्किन के गॉंधीजी पर पड़े प्रभाव को दर्शाता यह लेख - सम्पादक

जीवन परिचय व प्रभाव स्त्रोत

जॉन रस्किन उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन के सबसे चर्चित ब्रिटिश लेखक, कला और स्थापत्यकार तथा कला-समालोचक थे| उनका जन्म ८ फरवरी १८१९ को बर्नस्विक स्क्वायर लन्दन में हुआ था| उनके पिता कला, साहित्य, यात्रा, चित्रकला, वास्तु तथा प्रकृति के प्रेमी थे| पिता की यह विरासत रस्किन को मिली| सात वर्ष की छोटी सी उम्र में उन्होंने छ: कवितायें लिखी थीं| अपनी कविता के लिये उन्हें १८३९ में न्यूदिगेट पुरस्कार से नवाजा गया था| १८४३ में उन्हें एम.ए. डिग्री प्राप्त हुई और उस समय तक यूरोप के उन्नीसवीं शताब्दी के कवियों में उनकी रुचि का विस्तार हो चुका था| अपनी कला और विशेषतया मध्ययुगीन पुनर्जागरण युग के कवि के रूप में यूरोप की कई बार की गयी यात्रा में उन्होंने खूब आनन्द उठाया| जॉन रस्किन की अपनी कृतियों में मॉडर्न पेन्टर्स (पांच खण्डों में १८४-३६०) कला के क्षेत्र में काफी सराही गयी| उसी प्रकार

‘दि सेवेन लैम्प्स ऑफ आर्किटेक्चर’ (१८४९) औेर ‘दी स्टोन्स ऑफ वेनिस’ (खण्ड १,२,३) (१८५१) को वास्तुशास्त्र पर मौलिक पुस्तक के रूप में माना गया| कला समालोचक से लेखक बने जान रस्किन ने ‘अन टू दिस लास्ट’ नामक एक ऐसी पुस्तक का प्रणयन किया जिसे उनके जीवन का केन्द्रीय कार्य कहा जा सकता है| जॉन रस्किन के लिये मानवीय मूल्यों का क्षरण, प्राचीन कला और वास्तु का तेजी से समाप्त होना चिन्ता के विषय थे| उनके अनुसार कला, वास्तु और सामाजिक न्याय के बीच एक महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध है और शायद यही वजह थी कि वे बाद में एक सच्चे समाज-सुधारक के रूप में प्रसिद्ध हो गये| उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, औद्योगीकरण, गरीबों की दुर्दशा का अनुभव किया और समाज सेवा के क्षेत्र में अपने पिता द्वारा अर्जित पूरी सम्पत्ति को लगा दिया| वे १८६९ में आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रथम स्लेड प्रोेफेसर हुये| १८७१ में उन्हें क्रिस्टी कार्पस के लिये फेलो नियुक्त किया गया| १८७४ में उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य खराब हुआ| १८७५ में ‘ए सिरीज ऑफ ट्रैवलर’ के रूप में उन्होंने अनेक यात्रायें कीं| १८८० में उन्होंने फिक्सन, फेयर ऐण्ड फाउल नामक नयी सिरीज का प्रकाशन प्रारम्भ किया| २० जनवरी १९०० को उनकी मृत्यु ब्रान्टउड में हुई|

१८४६ से १८५३ के बीच विशेषकर जब वे माडर्न पेन्टर्स (खण्ड दो), सेवेन लैम्प ऑफ आर्किटेक्चर तथा स्टोन्स ऑफ वेनिस (खण्ड एक-तीन) पर कार्य कर रहे थे, रस्किन के विचारों में अभूतपूर्व परिवर्तन हुये| वे लोगों से पूछने लगे कि जो पर्वतों और प्रकृति के मनोरम स्थानों में रहते हैं, वे इतने गरीब औेर हतोत्साहित क्यों हैं? इसका उत्तर था कि इसका कारण प्राकृतिक वातावरण नहीं बल्कि सामाजिक वर्ग औेर सिद्धान्त हैं जो अपने अन्यायपूर्ण नियमों तथा व्यवहार के कारण समाज में असमानता तथा गरीबों के शोषण के लिये जिम्मेेदार हैं| रस्किन ने इन्हीं चिन्ताओं को अपनी पुस्तक ‘अन टू दिस लास्ट’ (१८६०) में व्यक्त किया है| यह पुस्तक जॉन रस्किन द्वारा अर्थशास्त्र पर लिखे गये कुछ निबन्धों का संग्रह हैै| पहली बार इसके चार निबन्ध एक मासिक पत्रिका कार्नहिल१ में छपे किन्तु लेखकों के प्रतिरोध के बाद इनके प्रकाशन को बन्द करना पड़ा| उसके बाद उन निबन्धों को पुस्तक के रूप में १८६२ में प्रकाशित किया गया| इस पुस्तक में रस्किन ने श्रम विभाजन को अमानवीय बताते हुये कहा है कि ‘‘राजनैतिक अर्थशास्त्र का नियम बिल्कुल फेल है क्योंकि वह उन सामाजिक बन्धनों की परवाह नहीं करता जो समाज को एक सूत्र में बांधते हैं| लेन देन के नियमों के आधार पर हम कोई अर्थशास्त्र लागू नहीं कर सकते| आत्मा का बल अर्थशास्त्रियों के सभी नियमों को उलटा देता है| मनुष्यरूपी यन्त्र में पैसे रूपी कोयले डालने से ज्यादा से ज्यादा काम नहीं लिया जा सकता| वह बढ़िया काम तो तभी करेगा जब उसकी भावना को जागृत किया जाय| सेठ नौकर के बीच गांठ पैसे की नहीं प्रीति की होनी चाहिये|२’’

महात्मा गॉंधी पर रस्किन का प्रभाव

जोहान्सबर्ग के एक शाकाहारी रेस्टूरेन्ट में गॉंधीजी अपने दो घनिष्ठ मित्रों अल्बर्ट वेस्ट तथा हेनरी पोलाक से मिले| गॉंधी के अनुरोध पर वेस्ट ने ‘इंडियन ओपीनियन’ का कार्य अपने हाथों में लिया जो उस समय काफी घाटे में चल रहा था| वेस्ट ने गॉंधीजी को बताया कि ‘इंडियन ओपीनियन’ इस समय आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है| गॉंधीजी ने अपनी आत्मकथा३ (एक पुस्तक का चमत्कारी प्रभाव) मेंे लिखा है कि ‘इण्डियन ओपीनियन’ के बढ़ते खर्च को लेकर वेस्ट की रिपोर्ट मुझे चौंकानेवाली थी| वेस्ट का पत्र मिलने के बाद १ अक्टूबर १९०४ को जोहान्सबर्ग से डरबन (नेटाल) के लिये रवाना हुए| पोलाक अब तक मेरी सब बातें जानने लगे थे| वे मुझे स्टेशन तक छोड़ने आये और यह कहकर कि यह पुस्तक रास्ते में पढ़ने योग्य है, आप इसे पढ़ जाइये, आपको पसन्द आयेगी, उन्होंने जॉन रस्किन की ‘अन टू दिस लास्ट’ पुस्तक मेरे हाथ में रख दी| उसे हाथ में लेने के बाद मैं छोड़ ही न सका| उसने मुझे पकड़ लिया| जोहान्सबर्ग से नेटाल का रास्ता लगभग चौबीस घन्टों का था| डरबन पहुंचने के बाद मुझे सारी रात नीद नहीं आई| मैंने पुस्तक में सूचित विचारों को तुरन्त अमल में लाने का इरादा किया|’’

रस्किन के ‘अन टू दिस लास्ट’ का गॉंधीजी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा| इस पुस्तक के विषय में महात्मा गॉंधी ने लिखा है कि ‘‘इसके पहले जॉन रस्किन की एक भी पुस्तक मैंने नहीं पढ़ी थी| कुछ पुस्तकें जिन्हें मैं पढ़ा था, उनमें से जिसने मेरे जीवन में तत्काल महत्त्व के रचनात्मक परिवर्तन कराये, वह ‘अन टू दिस लास्ट’ ही कही जा सकती है| बाद में मैंने उसका गुजराती अनुवाद किया और वह सर्वोदय के नाम से छपा| मेरा विश्‍वास है कि जो चीज मेरे अन्दर गहराई में छिपी पड़ी थीं, रस्किन के ग्रन्थरत्न में मैंने उसका स्पष्ट प्रतिविम्ब देखा और इस कारण उसने मुझ पर अपना साम्राज्य जमाया और मुझसे उसमें दिये गये विचारों पर अमल करवाया| जो मनुष्य हममें सोई हुई उत्तम भावनाओं को जाग्रत करने की शक्ति रखता है, वह कवि है| सब कवियों का सब लोगों पर समान प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि सबके अन्दर सारी सद्भावनायें समान रूप से नहीं होतीं| मैं जॉन रस्किन के सर्वोदय के सिद्धान्तों को इस प्रकार समझा हूं|

सबकी भलाई में हमारी भलाई निहित है|

एक वकील और नाई दोनों के काम की कीमत एक सी होनी चाहिये क्योंकि आजीविका का अधिकार सबको समान है| सादा मेहनत-मजदूरी का एक किसान का जीवन ही सच्चा जीवन है| पहली चीज मैं जानता था| दूसरी को मैं धुंधले रूप में देखता था| तीसरी पर मैंने कभी विचार ही नहीं किया था| सर्वोदय ने मुझे दीये की तरह दिखा दिया कि पहली चीज में दूसरी दोनों चीजें समाई हुई हैं| सवेरा हुआ और मैं इन सिद्धान्तों पर अमल करने के प्रयत्न में लग गया|’’४

थामस वेबर ने अपनी पुस्तक ‘गॉंधी ऐज डिसाइपुल एण्ड मेन्टर’ (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस २००७) में लिखा है कि ‘‘१९४२ में जब गॉंधीजी ७० वर्ष के थे तो उस समय ‘अन टू दिस लास्ट’ के विषय में कहा था कि उस पुस्तक ने मुझे एक वकील और शहरी से डरबन से बाहर एक फार्म में रहनेवाले ग्रामीण के रूप में परिवर्तित कर दिया|’’५ कुछ विद्वान गॉंधी पर रस्किन के प्रभाव को केवल उनके आर्थिक दर्शन में देखते हैं| गॉंधीजी ने इसका संकेत ‘अन टू दिस लास्ट’ के गुजराती अनुवाद की प्रस्तावना में दिया है कि ‘‘पश्‍चिम में लोगों का ध्यान नैतिकता और ईश्‍वरीय कानून से अलग शारीरिक और आर्थिक समृद्धि में ज्यादा है| किन्तु उनमें जॉन रस्किन अलग हैं और वह मानते हैं कि नीति के नियम का पालन करने में ही जनता की बेहतरी है| रस्किन गॉंधीजी के आर्थिक विचारों के स्रोत थे|६ यहां यह स्पष्ट करना उचित होगा कि रस्किन के राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विचारों को, न कि उसके अधिकारवाद को, गॉंधीजी ने अपने निजी चिंतन में समाविष्ट किया| रस्किन ने गॉंधीजी को ऐसे विचार प्रदान किया जिसने सम्पूर्ण गॉंधी-प्रगति में आश्रम संगठन के आर्थिक सिद्धान्तोंें को मजबूत बनाया और बढ़ाया| ‘अन टू दिस लास्ट’ का तात्कालिक अमल फीनिक्स आश्रम के रूप में सामने आया जो

सर्वोदय के विचारों का व्यवहार में प्रयोग करने का अवसर था|

एन्थोनी पारेल जो ‘हिन्द स्वराज एण्ड अदर राइटिंग्स’ के लेखक हैं, गॉंधी पर पश्‍चिमी लेखकों के प्रभाव की समीक्षा करते हुये लिखते हैं कि १९०९ अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ को लिखने के पहले गॉंधीजी ने रस्किन की पुस्तक ‘ए ज्वाय फार इवर एण्ड इट्स प्राइस इन दी मार्केट’ को पढ़ा था| इस पुस्तक में रस्किन ने औद्योगिक सभ्यता की आलोचना करते हुये समाज की हरेक इकाई को विलासिता पूर्ण जीवन नहीं अपितु उसकी निम्नतम आवश्यकताओं - भोजन, वस्त्र और आश्रय आदि की व्यवस्था के लिये तर्क दिया है|

यह आश्‍चर्यजनक है कि रस्किन के विचारों को पश्‍चिम के स्थापित अर्थशास्त्रियों ने गम्भीरता से नहीं लिया| अर्थ के इतिहासकार भी उनके योगदान का कहीं भी उल्लेख नहीं करते| किन्तु बहुत से लेखकों ने रस्किन के विचारों को गॉंधी के आर्थिक विचारों का विश्‍लेषण करते समय एक संचित कोश के रूप में माना है| अजित के. दासगुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘गॉंधीज इकोनामिक थाट’ में कहते हैं कि गॉंधीजी यह मानते थे कि भौतिक समृद्धि एक सीमा के बाद न केवल अर्थहीन हो जाती है बल्कि नैतिक प्रतिमानों ओर नीतिक विकास को नुकसान भी पहुंचाती है|

दासगुप्ता ने कतिपय ऐसे सन्दर्भों का भी उल्लेख किया है जहां रस्किन के विचार गॉंधी के विचारों से मेल नहीं खाते थे| रस्किन यह मानते थे कि समाज में असमानता का जाति और वंश परम्परा प्रमुख कारण है| ऊंच और नीच, कमजोर और बलवान, धनी और अमीर जैसे भेदों का कारण वंश परम्परा ही है| यह प्रकृति के अनुसार भी सुसंगत है क्योंकि यह ईश्‍वर की योजना थी| दूसरे शब्दों मे रस्किन आदेशित पदानुक्रम में विश्‍वास करते थे| इसलिये उनके अनुसार समाज के कुछ वर्गों की उपेक्षा और शोषण तो हमेशा ही होता रहा है और होता रहेगा और राज्य का उत्तरदायित्व होगा उन्हें पर्याप्त भोजन, वस्त्र और घर मुहैय्या करानेे का| इसलिये रस्किन ने अन्तत: एक संरक्षण राज्य के अस्तित्व को माना| उनके अनुसार इसलिये नैतिक आदर्श और मूल्य समाज/राज्य के दायरे में आते हैं न कि वह व्यक्ति का उत्तरदायित्व है| गॉंधीजी के अनुसार व्यक्ति पर ही मुख्य रूप से विचार केन्द्रित होना चाहिये क्योंकि ईश्‍वररूपी एक ही सत्ता के प्रतिरूप होने से सभी व्यक्ति समान हैं| इसलिये व्यक्ति की समानता को स्वीकार करना, आदर करना मूल नैतिक मूल्य है औेर साथ ही उसका अनुरक्षण करना सबकी जिम्मेदारी है| गॉंधीजी के अनुसार इसमें सरकार या राज्य की जिम्मेदारी कम से कम है| उन्होंने आर्थिक और नैतिक कारणों से गैर राज्य उद्यम को काफी पसन्द किया|

अत: यह स्पष्ट है कि व्यक्ति और राज्य के रोल पर गॉंधी और रस्किन के विचारों में अन्तर था| फिर भी गॉंधीजी ने अपने को रस्किन का शिष्य क्यों कहा, यह एक दिलचस्प प्रश्‍न है| इसके दो कारण हैं-पहला तो यह कि गॉंधीजी ने जिससे भी कुछ सीखा अपनी विनम्रता के कारण उसका श्रेय उसे दिया, दूसरे जैसा कि उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि उनका अध्ययन अपेक्षाकृत कम था| यह कहना सर्वथा युक्तियुक्त होगा कि गॉंधी की बौेद्धिक वृद्धि, विचार और कार्यों में उनके गुरु और उपदेशकों से कहीं अधिक थी|

सन्दर्भ -

१) ॠरपवहळ’ी ढशरलहशीी, गेहप र्ठीीज्ञळप, डरींळीह डहरीार, झ. १४; २) सर्वोदय, महात्मा गॉंधी, पृ. ६; ३) आत्मकथा, पृ. २५८; ४) वही, पृ. २५८; ५) ॠरपवहळ री ऊळीलळश्रिश रपव चशपींेी, ढहेारी थशलशी, झ. ३७; ६) वही, पृ. ३७

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