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Articles - जल-अन्न सुरक्षा पर राष्ट्रीय परिषद्

जैन हिल्स, जलगांव, दिनांक १९२० दिसम्बर २०१४ को गॉंधी रिसर्च उण्डेशन तथा तरुण भारत संघ एवं जल बिरादरी के संयुक्त तत्त्वावधान में जल-अन्न सुरक्षा पर एक द्विदिवसीय राष्ट्रीय परिषद् का आयोजन किया गया| यह सम्पूर्ण उपक्रम जैन इरिगेशन सिस्टम्स द्वारा प्रायोजित था| उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन के संस्थापक न्यासी तथा जैन इरिगेशन सिस्टम्स के अध्यक्ष डॉ. भवरलाल जी जैन ने की| भारतीय जल संस्कृति मण्डल के अध्यक्ष माधवराव चितले ने इस परिषद् का उद्घाटन किया| उद्घाटन सत्र के अन्य प्रमुख अतिथि थे तरुण भारत संघ के अध्यक्ष, जलपुरुष श्री राजेन्द्र सिंह राना; प्रख्यात गॉंधीवादी एवं नेशनल यूथ प्रोेजेक्ट के संस्थापक, एस. एन.सुब्बाराव; जैन इरिगेशन सिस्टम्स के प्रबन्धनिदेशक श्री अनिल जैन तथा गॉंधी शान्ति प्रतिष्ठान, दिल्ली की अध्यक्षा राधा बहन भट्ट| इस सम्मेलन में पूरे देश के कोनेकोने से लगभग २२० प्रतिनिधियों ने भाग लिया|

उद्घाटन सत्र में विषयप्रस्थापना करते हुये श्री माधव राव चितले ने जीवन में जल के महत्त्व को रेखांकित करते हुये जल के क्रिएशन, स्टोरेज, ट्रीटमेन्ट, डिस्ट्रीब्यूशन अथवा एप्लिकेशन, इन चार आयामोंें में सावधानी रखने की जरूरत को बताया| आपने बताया कि विकास को पांच धारायें प्रतिफलित करती हैंसरकार या शासन, शिक्षाव्यवस्था, विज्ञान की धारा, निजी क्षेत्र की भागीदारी तथा लोक समुदाय| जिस विषय पर हमनें ध्यान नहीं दिया हैवह है लोक सहभागिता या जल समुदाय| जल समुदाय जब तक नहीं खड़ा होता तब तक व्यावहारिक रूप से हम जल सुरक्षा नहीं कर पायेंगे| इसके लिये कार्यकर्ताओं को चार अवस्थाओं से गुजरना होगाप्रबोधन, संगठनकुशलता, कार्यवाही उपक्रम तथा क्रियाशीलता| आज आवश्यकता है कि इस परिषद् में हम एक एक्शन प्लान तैयार करें जो हमारा मार्गदर्शन कर सके कि शान्ति और विकास दोनों को एक साथ लेकर कैसे चला जा सकता है|

अपने उद्बोधन में श्री राजेन्द्र सिंह ने बताया कि जैन हिल्स देखकर आपको विश्‍वास हो गया कि जैन इरिगेशन उद्योग और उसके सहकारियों की सोच धरती और प्रकृति के विषय में अलग तरह की है| शायद उसी का प्रतिफल है विनाश के बिना यह सुन्दर संपोष्य विकास| आज हमारे सामनें दो तरह के लोग हैंएक वे जो विकास की बात करते हैं और दूसरे वे जो संरक्षण की बात करते हैं| भवरलालजी की सोच में दोनों का अभूतपूर्व सामंजस्य है| श्री राजेन्द्र सिंह ने आज की तीन प्रमुख चुनौतियां को हमारे सामने रखा संरक्षण के कानून अनुपयोगी हो जाने से जलसुरक्षा पर नये कानून बनाने की चुनौती, ३०४० वर्षों से बादल से गिरती एकएक बूंदों को पकड़कर समृद्ध की गयी जल सम्पदा को रीएप्लिकेट करने की चुनौती तथा हिमालय, अरावली, सत्पुड़ा पहाड़ जैसे नदियों के स्रोत को नंगा होने से बचाने तथा मृतप्राय दो तिहाई नदियों के पुनर्जीवन की चुनौती| आपने बताया कि हमारे तालाब अतिक्रमण के शिकार हो चुके हैं| गंगा पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करने पर भी गंगा जहां की तहां है| हमें सोचना है कि गंगा जैसी नदियों को स्वच्छ रखने तथा उन्हें पुनर्जीवित करने का कौन सा सही तरीका हो सकता है|

श्रीमती राधा बहन भट्ट ने अपने उद्बोधन में बताया कि आज नयी तकनीकि आ जाने के बाद भी हम पानी का सदुपयोग उस बुद्धिमत्ता से नहीं कर पा रहे हैं, जो हमारे पूर्वज करते थे| भूगर्भजल के दोहन में हमनें सारी हदें पार कर दी हैं, हमें अब उसके भावी दुष्परिणामों को चेत कर हमारी उपभोक्तावादी सोच को बदलना होगा| उन्होंने बताया कि नदी का अपना एक व्यक्तित्व है, यदि प्रकृति ने उसे नहीं जोड़ा तो सरकार को उन्हें जोड़ने का अधिकार कहां है? जल, जंगल और जमीन का प्रबन्धन जनता के हाथ में होना चाहिये न कि सरकार के|

प्रख्यात गॉंधीवादी श्री एस. एन. सुब्बाराव जी ने अपना उद्बोधन ‘एक जगत् की धरती माता सब उसकी सन्तान’ नामक एक गीत से प्रारम्भ किया जिसे सबने मुक्तकंठ से गाया और सराहा| उन्होंने कहा कि हम सब संवेदनशील बनें, सभी व्यक्ति को खाना मिले, सभी पेंड़पोधों को पानी मिले, यही हमारी मंगल कामना है|

सत्र के अध्यक्ष डॉ. भवरलाल जैन ने अपने उद्बोधन में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्‍न की तरफ परिषद् का ध्यान आकृष्ट किया कि क्या विकास और संरक्षण साथसाथ सम्भव है? उन्होंने बताया कि आज मुख्य समस्या पानी के प्रबन्धन की है| खेती में पूरे खेत में पानी न देकर यदि केवल पौधों की जड़ों में पानी दिया जाय तो बहुत अधिक पानी की बचत की जा सकती है और उत्पादन भी ब़ढ़ाया जा सकता है| इसके लिये शिक्षा और तकनीकि दोनों का उपयोग होना चाहिये| उन्होंने कहा कि संरक्षण और विकास में कोई विरोध नहीं है| जल, जंगल, जन, जमीन ये सभी एक साथ जुड़े हैं| आवश्यकता है जल संरक्षण तथा उसके सदुपयोग के प्रति चेतना जागृत करने की| डॉ. जैन ने कहा कि हमें शाकाहार को अपनाना चाहिये| आज पूरे विश्‍व में लोग बड़ी संख्या में शाकाहार को अपना रहे हैं| दोनों में यदि पानी के खर्च का अनुपात देखें तो एक मांसाहारी, शाकाहारी से २९ गुना अधिक पानी खर्च करता है| प्रकृति और पर्यावरण का अंग है आदमी, अत: हमेंे इन्हें बिना नुकसान पहुंचाये जीने की आदत डालनी चाहिये| विकास और संरक्षण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, आवश्यकता है मात्र संवेदनशील बनने की|

परिषद् का संचालन श्री विनोद रापतवार तथा धन्यवाद ज्ञापन जैन इरिगेशन सिस्टम्स के प्रबन्धनिदेशक श्री अनिल जैन ने किया| परिषद् के सफल आयोजन में जिन व्यक्तियों का महत्त्वपूर्ण अवदान रहा, उनमें तरुण भारत संघ के श्री राजेन्द्र सिंह राना, जैन इरिगेशन सिस्टम्स के उपाध्यक्ष तथा गॉंधी रिसर्च फाउण्डेशन के न्यासी श्री अशोक जैन, संयुक्त प्रबन्धनिदेशक श्री अजित जैन एवं संचालक श्री अतुल जैन, डॉ. सन्तोष के. देशमुख, श्री मौलिक सिसोदिया तथा संजय सिंह प्रमुख थे| इस परिषद् में जिन अन्य संस्थाओं ने अपना सक्रिय सहभाग दिया उनमें मानवलोक; वनराइ; दिलासा; भारतीय जल संस्कृति मण्डल; गंगाजल बिरादरी; महाराष्ट्र सिंचन सहयोग; परमार्थ सेवा संस्थान (उ.प्र); ग्रामीण विकास नवयुवक मण्डल, राजस्थान; घोघर्डिया प्रखण्ड स्वराज्य विकास संघ, बिहार; बिहार प्रदेश किसान संगठन; राष्ट्रीय नदीपुनर्जीवन अभियान; एसपीडब्ल्यूडी, झारखण्ड तथा ग्रामीण विकास मण्डल, जालना प्रमुख थे| उद्घाटन सत्र के बाद दो दिनों में कुल चार और सत्र चले जिनमें थीम आधारित प्रस्तुतियां की गयीं तथा विचारों का आदानप्रदान किया गया| इस अवसर श्री अनिल जैन ने द्विदिवसीय परिषद् का निचोड़ प्रस्तुत करते हुये सर्वसम्मति से पारित ‘जलगांव जलअन्न सुरक्षा घोषणा’ के प्रमुख बिन्दुओं को पढ़कर सुनाया जो निम्नानुसार हैं

१) सबके लिए पानी की सुरक्षा के लिए लोगों का सहभाग तथा आन्दोलन की पृष्ठभूमि

मानव तथा पृथ्वी के सभी जीवों तथा आने वाली उनकी पीढ़ियों के लिए पानी की सुरक्षा सुनिश्चित की जाय; स्थानीय स्तर पर पानी संचय के लिए छोटेछोटे ढॉंचे बनाने में निर्माणशील कार्यों में लोगों के सहभाग का संयोजन किया जाय; पानी का समान विनिमय तथा गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक/सामुदायिक नियंत्रण प्रणाली का विकास करना; टिकाऊ तथा परिणाम केन्द्रित सहभागिता के लिए सरकार/छॠज पर निर्भर रहने की मानसिकता का उन्मूलन; सभी जलाशयों का परिशीलन, पहचान, अनुरेखन, पंजीकरण तथा पानी समस्या पर तरुण वर्ग पर केंद्रित/अनुलक्षित अभियान प्रारम्भ करना|

२) पाणलोट व्यवस्थापन (वॉटर-शेड मैनेजमेंट) की सफलता और असफलता

एक खिड़की/प्राधिकरण के अन्दर वन, महसूल, कृषि, छोटे सिंचन तथा भूजल, ऐसे पांच शासकीय विभागों का संस्थारूप समन्वयन; वॉटरशेड विकास तथा व्यवस्थापन कार्यक्रमों के एकत्रित नियोजन तथा कार्यान्वयन के लिए एक सुनियोजित कार्यवाहक व्यवस्था का गठन करना; हर एक गॉंव पानी के लिये आत्मनिर्भर हों, इसके लिए छोटे-छोटे सामुदायिक जलाशयों जैसे सूक्ष्म स्तरीय वॉटरशेड विकास कार्यक्रमों का परियोजन करना; पाईप्ड नेटवर्क (पाइपों का जाल) तथा सूक्ष्म सिंचन प्रणाली का नियोजन अन्तर्भूत करने वाले अधुनिकीकरण का प्रसार तथा प्रचार करना|

३) बड़े सिंचन प्रकल्पों तथा नदियों को जोड़ने के प्रकल्पों का दीर्घ काल तक टिकने वाला पुनुरुज्जीवन

इस कार्य में जनभागीदारी से पहले पर्यावरणीय/जैवविविधता प्रभावों तथा प्रकल्पों का मूल्यांकन; नदियों को एक दूसरे से जोड़ने से पहले उनका वैज्ञानिक मूल्यांकन तथा पारदर्शिता के साथ उनकी पूरी जानकारी जनता को उपलब्ध कराना; पुनर्वास तथा पुनर्व्यवस्थापन के मुद्दों पर समानरूप से चर्चा करना; वॉटरशेड/पाणलोट विकास हस्तक्षेप, जल उपयोग दक्षता, पुन:उपयोग के वैकल्पिक समाधान तथा उनके फायदों के साथसाथ नदियों के जोड़ का मूल्यांकन करना; काम को हाथ में लेने से पहले, आंतर्राज्यीय सहमति तथा आंतर्राष्ट्रीय करारों को सुनिश्चित करना|

४) पानी से सम्बन्धित कानून और उनकी प्रासंगिकता

नदियों तथा जलाशयों के संरक्षण के लिए नदी-कानून (नदी नीति) बनाने की आवश्यकता तथा पहले से अस्त्तिव में रहे कानूनों की विवेक पूर्वक समीक्षा करना; प्रत्येक स्थानीय स्तर से लेकर राज्य सरकार के स्तर तक जलाशयों का परिरेखन तथा अनुसूचीकरण करके उसे आम जनता के लिये कानूनी रूप से उपलब्ध कराना; केंद्र सरकार जो पानी प्रकल्पों की निधियों में सबसे ज़्यादा आर्थिक अनुदान देता है, उन सिंचन परियोजनाओं का सख्ती से लेखा-परीक्षा करवाना; लोगों के सहभाग वाले प्रकल्पों का क्रियान्वयन इस तरह से करना कि उन जलाशयों का स्वामित्व लोगों में न्यासी के रूप में दिया जा सके|

५) मॉंग के अनुसार सम्पोष्य जलप्रबन्धन तथा अपशिष्ट जल का उपचार कर उपयोग

जहॉं तक हो सके, खुली नाली नेटवर्कों को पाइप्ड नेटवर्क में रूपान्तरित करना तथा नयी परियोजनाओं में यथा सम्भव सरकार द्वारा इस प्रक्रिया को बढ़ावा देना; संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग कर उत्पादन क्षमता तथा गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नहरसिंचित क्षेत्रों में सभी प्रकार की ङ्गसलों के लिए सूक्ष्म सिंचन को बढ़ावा देना; चावल की खेती हेतु नहरसिंचित क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचन प्रणाली का उपयोग करना तथा सुयोग्य चक्रीय ङ्गसलों की सम्भावना पर शोध करना; पानी के स्त्रोतों का विकास, पानी वितरण, सूक्ष्म सिंचन द्वारा मॉंग के अनुसार पानी की आपूर्ति, ऊर्जा आपूर्ति, मशीनें, किसानों की कार्यक्षमता संवर्धन और प्रशिक्षण, परियोजनाओं का संचालन तथा रखरखाव आदिे घटकों को समाविष्ट किया जा सके|

६) पानी-ऊर्जा-अन्न, इन परस्पर सम्बन्धित कड़ियों को ध्यान में रखकर खेती के लिए स्थाई जलप्रबन्धन

देहातों तथा शहरी क्षेत्रों के जलाशयों का सर्वेक्षण, सीमांकन, मापन तथा अवशिष्ट स़ङ्गाई का कार्य शहरीे एवं ग्रामीण क्षेत्र में प्रारम्भ करना; बेहतर जल-वितरण के सम्बन्ध में लिफ्ट इरिगेशन के साथ माइक्रो इरिगेशन (सूक्ष्म सिंचन) का नियोजन तथा सूक्ष्म सिंचन प्रणाली की सोलर पैनल के साथ उपयोगिता की सम्भावना तथा व्यवहार्यता को बढ़ावा देना| विविध राज्यों में अलगअलग जगहों पर माइक्रो इरिगेशन सिस्टम तथा हाइटेक प्रात्यक्षिकों के प्रयोगों के लिए क्षेत्र तैयार करना; छोटे तथा गरीब किसानों के लिए माइक्रो ङ्गाइनेन्स (सूक्ष्म अर्थ सहाय्य) को बढ़ावा देना; राष्ट्रीय स्तर पर किसानों के लिए, जानकारी, प्रशिक्षण देने वाले तथा क्षमतावर्धक कार्यक्रम आयोजित करना|

अन्तिम सत्र में परिषद् ने दृढ़ निश्‍चय किया कि हम १२० करोड़ की आबादी वाले अपने देश में जल और अन्न सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विधायक रूप से कार्य करेंगे| परिषद् सबके लिये नये रोज़गार सृजन करने और उनसे आनेवाली खुशहाली और संपन्नता की कामना करता है| परिषद् में इस बात पर मतैक्य रहा कि हमारी आनेवाली चार पीढ़ियों तक सम्पूर्ण जैविक प्रणाली के साथ-साथ हमें जल तथा नदियों की प्रणाली का संरक्षण करना है| हमारे देश के हर नागरिक के लिए जल और अन्न सुरक्षा का प्रबन्ध सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हर एक वस्तु भारत में उपलब्ध है| उसका समुचित प्रबन्धन कर जन-सहभाग से सनातन भविष्य के लिए टिकाऊ समाज निर्माण का हमारा लक्ष्य है|

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