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Articles - गॉंधीजी के प्रेरक पुरुष - हेनरी डेविड थोरो

हेनरी डेविड थोरो (१८१७-१८६२) एक अमेरिकी विचारक, कवि, प्रकृतिप्रेमी तथा व्यावहारिक दार्शनिक थे| दक्षिण अफ्रीका के अपने सत्याग्रह के दौरान १९०७ में गॉंधीजी थोरो की रचनाओं के सम्पर्क में आये| उनकी रचना ‘सिविल डिसओबिडिएन्स’ (सविनय अवज्ञा) ने गॉंधीजी पर विशेष प्रभाव डाला| भारत का स्वतन्त्रता के लिये गॉंधीजी द्वारा चलाया गया असहयोग आन्दोलन कहीं न कहीं थोरो के ‘सिविल डिसओबिडिएन्स’ से प्रेरित था| गॉंधीजी ने थोरो के सविनय अवज्ञा को अपनाया और उसमें संशोधन भी किया| ‘ऐन अपील टू अमेरिकन फ्रेंड्स’ में गॉंधीजी ने उन्हें अपना अध्यापक बताया और कहा कि दक्षिण अफ्रीका में मैं जो कुछ कार्य कर रहा था, थोरो ने उसे वैज्ञानिक व सैद्धान्तिक आधार देने में सहायता की| ़प्रस्तुत है पाठकों के समक्ष हेनरी डेविड थोरो के गॉंधीजी पर पड़े प्रभाव को दर्शाता यह लेख - सम्पादक

जीवन परिचय व प्रभाव स्त्रोत

हेनरी डेविड थोरो का जन्म १२ जुलाई १८१७ को मैसाचुसेट्स राज्य के कान्कॉर्ड नामक स्थान पर हुआ था| थोरो को कई विशेषणों से पुकारा जाता है| वे प्रकृतिप्रेमी, कवि, व्यावहारिक दार्शनिक, नव इंग्लैड अन्तर्प्रज्ञावाद के प्रसिद्ध व्यक्तित्व, अराजकतावादी व नागरिक स्वतन्त्रताओं के समर्थक के रूप में जाने जाते हैं| थोरो एक छोटे पेंसिल व्यापारी जॉन थोरो के लड़के थे, इनकी माता का नाम सिंथिया डन्बार थोरो था| थोरो को १८२८ में कान्कॉर्ड अकादमी में अध्ययन के लिए भेजा गया| १८३३ में वह आगे की पढ़ाई हेतु हार्वर्ड चले गए| यहॉं रहते हुए उन्होंने वड्र्सवर्थ, मिल्टन, कॉलरिज, कार्लाइल को पढ़ा, साथ ही सोफोक्लीज, यूरीपीड्स, होमर, होरेस, सेनेका तथा जुवेनल का भी रुचिपूर्ण अध्ययन किया| उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान था जिनमें अंग्रेजी, इटालियन, फ्रेंच, स्पेनिश प्रमुख थीं| १८३७ में हार्वर्ड से ग्रेजुएशन पूरा होने पर उन्हें कान्कॉर्ड में एक ग्रामर विद्यालय में नौकरी मिली लेकिन थोरो ने दो सप्ताह बाद ही इस्तीफा दे दिया| इसके बाद अपने पिता के पेंसिल व्यवसाय में हाथ बंटाया और आगे भी समय-समय पर इस कार्य को करते रहे| इसके बाद थोरो भू-सर्वेक्षणकर्त्ता के तौर पर कार्य करने लगे और इसमें भी सफलता पाई| थोरो के हार्वर्ड के अध्ययन के समय इमर्सन कान्कॉर्ड में रहने लगे थे| थोरो व इमर्सन में मित्रता भी खूब चली| आगे चलकर दोनों नव इंग्लैड अन्तर्प्रज्ञावाद के प्रमुख व्यक्तित्त्व बने| इमर्सन के जरिए ही थोरो ने प्राचीन भारतीय दर्शन की उस अतुलनीय वैचारिक-दार्शनिक सम्पदा को प्राप्त किया जो जीवनपर्यंत उनकी आधारभूमि बनी रही|

१८४५ में उन्होंने कान्कॉर्ड के पास वाल्डेन नामक सरोवर के निकट स्वनिर्मित झोंपड़ी में रह कर आत्मनिर्भरता के अपने सिद्धान्त को व्यावहारिक तौर पर जीने का प्रयास किया| वाल्टर हार्डिंग के अनुसार थोरो वाल्डेन सरोवर अधिक जीवन व्यतीत करने और स्वतन्त्र चिंतन लेखन के लिए गए थे| वहॉं थोरो ने अपने जीवन को सादा बनाने, खर्चों को कम करने में सफलता पाई और न केवल ‘ए वीक आन द कान्कॉर्ड एंड मैरीमेक रिवर्स’ लिखा अपितु वाल्डेन सरोवर के अपने अनुभवों को थोरो ने कलमबद्ध कर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘वाल्डेन’ या ‘लाइफ इन द वुड्स’ (१८५४) को भी पूरा किया|

‘ए वीक आन द कान्कॉर्ड एंड मैरीमेक रीवर्स’ (१८४९) में उन्होंने अपने भाई जॉन के साथ की गयी यात्रा का विवरण लिखा तो वाल्डेन के १८ वर्णनात्मक निबंधों में उन्होंने यह बताने का प्रयास किया कि अधिकांश लोग तनावपूर्ण जिंदगी जी रहे हैं और आर्थिक भ्रमजाल इसकी जड़ है| सरल जिंदगी प्राकृतिक साहचर्य में ही संभव है| वाल्डेन में

थोरो ने जो वर्णन किया, वह साहित्यिक उत्कृष्टता का बेहतरीन नमूना है साथ ही अन्तर्प्रज्ञावाद के दर्शन की आधारभूमि भी| थोरो ने अपने प्रसिद्ध निबन्ध ‘सिविल डिसओबिडिएन्स’ को एक व्याख्यान के तौर

पर लिखा था जो फरवरी, १८४८ में कान्कॉर्ड सभा भवन में दिया गया था| इस निबंध के प्रथम प्रकाशन का शीर्षक ‘रेसिस्टेंस टू सिविल गवर्नमेन्ट’ था जो ‘एस्थेटिक पेपर्स’ शीर्षक के अन्तर्गत एक निबन्धसंग्रह में छपा था| यह निबन्धसंग्रह १८४९ में बोस्टन से प्रकाशित हुआ|

थोरो के उच्चतर उद्देश्य का समर्थन व उसकी पूर्ति का प्रयास वाल्डेन व सविनय अवज्ञा में देखने को मिलता है| वाल्डेन में प्रकृति के प्रति एकात्मकता की जो अनुभूति थोरो व्यक्त करते हैं, सविनय अवज्ञा उसी एकात्मकता का सामाजिक जीवन में विस्तार है| थोरो पर भारतीय दर्शन का बहुत गहरा प्रभाव था| वे भारतीय दर्शन को समाहित करनेवाले विभिन्न ग्रंथों- वेंदों, उपनिषदों, पुराणों, मनुस्मृति, गीता के साथ-साथ हितोपदेश के संपर्क में आए| पर उनपर सर्वाधिक प्रभाव भगवद्गीता का पड़ा| प्रकृति के साथ एकात्म की अनुभूति का दार्शनिक आधार भी थोरो ने भारतीय दर्शन से प्राप्त किया|

प्राचीन भारतीय ग्रंथों ने थोरो पर दो प्रकार से प्रभाव डाला| एक तो इन ग्रंथों ने तत्कालीन समय की उपभोगवादी संस्कृति के समकक्ष त्याग, संयम, तपस्याशील संस्कृति की दार्शनिक विवेचना उपलब्ध कराई, दूसरे उपनिषदों व पुराणों के कल्पनात्मक व रचनात्मक आख्यानों ने थोरो की साहित्यिक रचनाओं को तीक्ष्णता व प्रभावशीलता प्रदान की|

थोरो से सम्बन्धित एक बहस आज भी जारी है कि थोरो अहिंसा के समर्थक थे या नहीं? उन्हें अहिंसक माना जाए या नहीं? समर्थन में सविनय अवज्ञा का सन्दर्भ दिया जाता है, विपक्ष में ‘ए प्ली फॉर कैप्टन जॉन ब्राउन’ का जिसमें दासता विरोधी कार्यवाही में ब्राउन ने हिंसक कार्यवाही की थी| हमें यह ध्यान रखना होगा की चाहे स्पष्ट तौर पर थोरो हिंसा, अहिंसा के बारे में कुछ न कहते हों मगर वह जिन मूल्यों का समर्थन करते हैं, देखना होगा कि वह मूल्य किसे पुष्ट करते हैं - हिंसा को या अहिंसा को| थोरो सत्य को बड़ी चीज मानते हैं, मानव अधिकारों के पक्ष में खड़े होते हैं तथा युद्ध को राज्य के कुछ लोगों का स्वार्थीपन बताते हैं| स्पष्ट है कि थोरो हिंसा अहिंसा के बीच हिंसा के मूल्य का चुनाव करते हैं|

प्रतिरोध की अवधारणा व स्वरूप

हेनरी डेविड थोरो अमेरिकी विचारक थे| तत्कालीन अमेरिकी सभ्यता जिस मार्ग पर उन्मुख थी, उससे थोरो की असहमति थी| तत्कालीन समय के पहले जो भी प्रतिरोध की परम्परा चली आ रही थी, उसे थोरो ने एक सैद्धान्तिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया| थोरो के राजनैतिक विचारों को अराजकतावाद की संज्ञा दी जाती है| इनका कहना था कि न्याय सत्ता से बढ़ कर है| अत: संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में तत्कालीन समय में प्रचलित दासप्रथा के घिनौने रूप को देख कर थोरो ने सरकार की कड़ी आलोचना की और अन्त में टैक्स देने से भी मना किया| उन्हें जेल में भी डाला गया| जेल में हुए अपने अनुभवों को उन्होंने ‘‘जप ींहश र्ऊीींू ेष उर्ळींळश्र ऊळीेलशवळशपलश’’ लेख में प्रस्तुत किया| यह उनके प्रतिरोध के आदर्श को सैद्धान्तिक आधार प्रदान करनेवाला प्रतिनिधि लेख है| वही सरकार सबसे अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है, ऐसा कहते हुए वे राज्य सत्ता को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं१| वे मानते हैं कि न्याय किसी भी प्रकार की सत्ता से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है, सत्ताशाली का हमेशा न्यायपूर्ण होना जरूरी नहीं है|२

थोरो राज्य को विवेकहीन संस्था मानते हैं क्योंकि यह व्यक्ति को अपने नैतिक विवेक से च्युत कर बहुमत के पक्ष में चलाती है जो जरूरी नहीं कि सत्य के पक्ष में हो| उनके अनुसार राज्य व्यवस्था कृत्रिम है, अत: व्यक्ति को सामाजिक प्राणी मानने के बजाय सार्वभौमिक प्राणी मानना चाहिये|

थोरो अपने प्रतिरोध स्वरूप में समूह की बजाय व्यक्ति पर बल देते हैं| वे व्यक्ति के वैयक्तिक अन्त:करण को जगाने की कोशिश करते हैं| वे मानते हैं कि हम पहले मनुष्य हैं, प्रजा बाद में| लेकिन राज्य के दृष्टिकोण से देखने पर हम पहले प्रजा हैं| थोरो का स्पष्ट मानना है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सचेत है तो समूह स्वत: ही सचेत हो जाएगा क्योंकि समूह व्यक्तियों का ही तो योग है| प्रतिरोध के स्वरूप के बारे में विचार करें तो पाते हैं कि थोरो असहयोग के माध्यम से नैतिक भावात्मक व्यक्तित्व को पुष्ट करते हैं| यह एक प्रकार से अपने सत्य के प्रति अधिक निष्ठावान होना है|

थोरो कहते हैं कि सभी को अविवेक पूर्ण यान्त्रिक व्यवस्था का विरोध करना चाहिये| एक विवेकशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह इस स्थित का विरोध करे क्योंकि वह सत्य के पक्ष में खड़ा है| ऐसी स्थिति का विरोध थोरो असहयोग से प्रतिपादित करने को कहते हैं| उनका सविनय अवज्ञा अन्यायपूर्ण सरकार के प्रति प्रतिरोध का घोषणा पत्र है| ६ मई १८६२ को ४४ वर्ष की उम्र में उनका देहान्त हो गया|

महात्मा गॉंधी पर थोरो का प्रभाव

दक्षिण अफ्रीका के अपने सत्याग्रह के दौरान गॉंधीजी थोरो की रचनाओं के सम्पर्क में आये| महात्मा गॉंधी के जीवन पर थोरो के निबन्ध ‘सिविल डिसओबिडियेन्स’ का गहरा प्रभाव पड़ा| गॉंधी यह स्वीकार करते हैं कि मेरे जीवन पर जिनका उत्तम प्रभाव पड़ा, हेनरी डेविड थोरो उनमें से एक थे| जब वह दक्षिण अफ्रीका में थे तो पहली बार उन्हें थोरो के निबन्ध ‘रेसिस्टेन्स टु सिविल गवर्नमेन्ट’ को पढ़ने का मौका मिला जो बाद में सिविल डिसओबिडियेन्स के नाम से प्रकाशित हुआ| १९०७ में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में जब गॉंधी एक नागरिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य कर रहे थे तो उन्होंने कहा था कि थोरो के विचारों को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध दक्षिण अफ्रीका औेर भारत में प्रयोग किया जा सकता है| गॉंधी ने थोरो के विषय में कहा था

थोरो एक महान लेखक, कवि, दार्शनिक तथा व्यावहारिक व्यक्ति थे| उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं बताया जो वह स्वयं अपने जीवन में लागू नहीं कर सकते थे| वे अमेरिका के कुछ महान तथा नैतिक व्यक्तियों में से एक थे| गुलामी उन्मूलन आन्दोलन के समय उन्होंने अपना प्रसिद्ध निबन्ध ‘आन दी ड्यूटी आफ सिविल डिसओबिडियेन्स’ (१९०७) लिखा| अपने सिद्धान्तों तथा पीड़ित मानवता के लिये वह जेल गये| उन्होंने जो भी लिखा सदा के लिये लिखा| उनके तीक्ष्ण तर्क लाजवाब हैं|

अक्सर यह माना जाता है कि गॉंधीजी ने सत्याग्रह की कल्पना थोरो से ली थी| परन्तु १० सितम्बर १९३५ को भारत सेवक समिति के श्री कोदड़ राव को लिखे अपने पत्र में गॉंधीजी ने इससे इनकार किया है| उन्होंने लिखा कि, ‘यह कथन कि मैंने सविनय अवज्ञा की कल्पना थोरो की पुस्तकों से प्राप्त की है, गलत है’| सविनय अवज्ञा पर थोरो का निबन्ध मेेरे हाथ में पड़ने से पहले द. अफ्रीका में सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध काफी आगे बढ़ गया था| लेकिन उस समय यह आन्दोलन निष्क्रिय प्रतिरोध के नाम से प्रसिद्ध था| चूंकि वह शब्द अपूर्ण था इसलिए गुजराती पाठकों के लिए मैंने ‘सत्याग्रह’ शब्द गढ़ा| मुझे लगा कि सविनय अवज्ञा से भी संघर्ष का पूरा अर्थ व्यक्त नहीं होता|’३

अत: गॉंधीजी ने थोरो के सविनय अवज्ञा को स्वीकार किया किन्तु इसमें संशोधन कर इसे ज्यादा व्यापक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया| ‘ऐन अपील टू अमेरिकन फ्रेंड्स’ में उन्होंने थोरो को अपना अध्यापक बताया और कहा कि दक्षिण अफ्रीका में मैं जो कुछ कार्य कर रहा था, थोरो ने उसे वैज्ञानिक व सैद्धान्तिक आधार देने में सहायता की| गॉंधीजी ने थोरो के बारे में लिखा कि अनैतिक, वैध कानूनों को शिष्ट रूप में भंग करना सविनय अवज्ञा है| सविनय अवज्ञा जहां तक मुझे मालूम है, थोरो ने, एक दास राज्य के कानूनों के प्रति अपने विरोध को व्यक्त करने के लिये गढ़ा था| उन्होंने सविनय अवज्ञा सम्बन्धी कर्तव्यों पर एक बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ की रचना की|४ एक प्रसिद्ध जीवनीकार और लेखक वाल्टर हार्डिंग जिसने थोरो के जीवन और उनकी रचनाओं का सम्यक् अध्ययन किया था, गॉंधीजी की टिप्प़णी पर लिखते हैं कि गॉंधी अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने थोरो के विचारों औेर सिद्धान्तों को इतनी अच्छी तरह समझा और राष्ट्रहित में लागू किया, जबकि थोरो ने स्वयं कभी भी किसी राजनीतिक आन्दोलन की अगुवाई नहीं की| गॉंधीजी का सत्याग्रह थोरो के सिविल डिसओबिडियेन्स या सविनय अवज्ञा की तुलना में कहीं आगे निकल गया|

सन्दर्भ -

१) उद्धृत लक्ष्मीमेनन, बी., रस्किन एण्ड गॉंधी, पृ. ४०; २) थोरो, टॉलस्टॉय और गॉंधी, शंभू जोशी, प०. १९; २) वही, पृ. १५२; ३) वही, पृ. ११६-११७.

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